अक्षय कुमार की फिल्म मिशन मंगल में एक सीन है. जिसमें वो एक जांच कमेटी के सामने बैठे हैं. एक वैज्ञानिक नासा से आता है. अक्षय कहते हैं कि जेंटलमैन वी आर साइंटिस्ट. देअर इज नो साइंस विदाउट एक्सपेरिमेंट. मतलब करके देखो. उससे सीखो. एक्सपेरिमेंट नहीं करेंगे तो हमें अपने आप को साइंटिस्ट कहने का कोई अधिकार नहीं है. नासा ने भी विफलताओं से सीखा. तब इतने सफल हुए.
अब बात करते है इसरो (ISRO) की. भारत की स्पेस एजेंसी दुनिया के उन चुनिंदा स्पेस संगठनों में से एक है, जो असफलता को अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत मानता है. हाल ही में PSLV-C61 (मई 2025) और PSLV-C62 (जनवरी 2026) दोनों मिशनों की असफलता ने सवाल उठाए हैं, लेकिन इसरो का इतिहास बताता है कि यह हर झटके से सीखकर और मजबूत होकर लौटता है.
इसरो की रेजिलिएंस इसलिए अनोखी है क्योंकि सीमित बजट (~$1.6 बिलियन सालाना, NASA से 1/10th) में भी उच्च सफलता दर है. यह 'फेल फास्ट, लर्न फास्ट' कल्चर से आता है. असफलताएं कम हैं (PSLV में ~6-8%, GSLV में ज्यादा लेकिन सुधार तेज). C62 के बाद भी इसरो मजबूत होकर लौटेगा-जैसे चंद्रयान-2 से चंद्रयान-3 तक हुआ. असफलता अंत नहीं, नई शुरुआत है.
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हाल की असफलताएं: PSLV-C61 और C62 में क्या हुआ?
PSLV-C61 (18 मई 2025): EOS-09 सैटेलाइट मिशन. तीसरे स्टेज (PS3) में चैंबर प्रेशर अचानक गिरा. थ्रस्ट कम हुआ. सैटेलाइट सही ऑर्बिट में नहीं पहुंचा. ISRO चेयरमैन वी. नारायणन ने इसे छोटी समस्या कहा. फेलियर एनालिसिस कमिटी (FAC) ने जांच पूरी की. रिपोर्ट PMO को सौंपी, लेकिन सार्वजनिक नहीं हुई.
PSLV-C62 (12 जनवरी 2026): EOS-N1 (अन्वेषा) सहित 16 सैटेलाइट्स खो गए. तीसरे स्टेज के अंत में रोल रेट डिस्टर्बेंस और फ्लाइट पाथ गड़बड़ हुआ. ISRO ने कहा कि डेटा विश्लेषण चल रहा है.
दोनों में समस्या तीसरे स्टेज (सॉलिड फ्यूल मोटर) से जुड़ी थी. C61 के बाद सुधार किए गए थे (जैसे नोजल/प्रोपेलेंट चेक), लेकिन C62 में समस्या वापस आई. संभावित कारण हो सकता है कि फ्लेक्स नोजल एरोजन, मटेरियल की कमजोरी या क्वालिटी कंट्रोल में कमी.
C61 के बाद क्या सुधार किए गए थे?
C61 असफलता के बाद ISRO ने थर्ड स्टेज के सॉलिड मोटर का विस्तृत रिव्यू किया. प्रोपेलेंट कास्टिंग, केसिंग इंस्पेक्शन और नोजल टेस्टिंग बढ़ाई. ग्राउंड टेस्ट्स में अतिरिक्त सिमुलेशन किए. फिर भी C62 में समस्या आई, जिससे लगता है कि सुधार पूरी तरह प्रभावी नहीं रहे या नई कमजोरी उभरी. रिपोर्ट सार्वजनिक न होने से पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं.
इसरो का PSLV रिकॉर्ड: आंकड़े बताते हैं मजबूती
यह रिकॉर्ड दिखाता है कि दो या चार असफलताएं इसरो की विश्वसनीयता को खत्म नहीं करतीं.
इसरो की प्रमुख असफलताओं के बाद कैसे सुधार हुआ?
इसरो ने हमेशा असफलता से सीखा है...
SLV-3 (1979): पहली फ्लाइट फेल. रोहिणी टेक्नोलॉजी पेलोड नहीं पहुंचा. डिजाइन और टेस्टिंग मजबूत की गई. 1980 में SLV-3 सफल लॉन्च – भारत स्पेस क्लब में शामिल.
ASLV (1987-1994): पहले तीन लॉन्च फेल हुए. कंट्रोल सिस्टम, स्टेज सेपरेशन और टेस्टिंग में बदलाव किया गया. 1994 में ASLV-D4 सफल हुआ. यहीं PSLV रॉकेट की नींव बनी.
PSLV-D1 (1993): पहली फ्लाइट फेल (सॉफ्टवेयर बग). सॉफ्टवेयर वैलिडेशन और इंटीग्रेशन प्रोसेस अपग्रेड किया गया. उसके बाद 24 साल तक कोई बड़ा फेलियर नहीं हुआ.
PSLV-C39 (2017): हीट शील्ड फेलियर से IRNSS-1H खो गया. पायरो सेपरेशन और हीट शील्ड मैकेनिज्म बदला गया. उसके बाद कई सफल मल्टी-सैटेलाइट लॉन्च.
GSLV-F10 (2021): क्रायोजेनिक इग्निशन फेल हुआ. इग्निशन सिस्टम और वॉल्व टेस्टिंग मजबूत की गई. बाद में GSLV-F12 से सफल NVS-01 लॉन्च हुआ.
Chandrayaan-2 (2019): विक्रम लैंडर क्रैश हुआ. लैंडर सॉफ्टवेयर, सेंसर्स, वेलोसिटी रिडक्शन और सिमुलेशन में बड़े बदलाव किए गए. Chandrayaan-3 (2023) – विश्व में पहली बार चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग की गई.
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इसरो की रेजिलिएंस की असली वजहें
C62 झटका अस्थायी है
PSLV-C61 और C62 की असफलताएं चिंताजनक हैं. खासकर कॉमर्शियल और रक्षा मिशनों के लिए. लेकिन इसरो का इतिहास साफ है- यह संगठन हर बार मजबूत होकर लौटता है. जांच पूरी होने पर थर्ड स्टेज में नए सुधार होंगे. नए मटेरियल होंगे. बेहतर क्वालिटी चेक और अतिरिक्त टेस्टिंग की जाएगी.
PSLV जल्द ही अपनी पुरानी विश्वसनीयता वापस पा लेगा. इसरो की कहानी सिर्फ सफलताओं की नहीं, बल्कि असफलताओं से उठने की है. यह भारत की वैज्ञानिक भावना का प्रतीक है- जो गिरता है, लेकिन फिर आसमान छूता है.
ऋचीक मिश्रा