मिडिल ईस्ट में 90 लाख कामगारों का भविष्य भारत की सबसे बड़ी चिंता

खाड़ी के देशों का युद्ध के संकट में फँसना भारत के लिए दोहरे चिंता का विषय हो जाता है. तेल की क़ीमतें बढ़ने के साथ भारत को वहां काम कर रहे करीब 90 लाख भारतीय कामगारों के जीवन और उनकी आजीविका के बारे में भी सोचना पड़ता है. क्योंकि उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा देश की तरक्की के काम आता है.

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मिडिल ईस्ट की उड़ाने रद्द होने के कारण दिल्ली में परेशान यात्री. (Photo: PTI) मिडिल ईस्ट की उड़ाने रद्द होने के कारण दिल्ली में परेशान यात्री. (Photo: PTI)

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 03 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 9:03 AM IST

मिडिल ईस्ट में चल रहा युद्ध अमेरिका-इज़राइल और ईरान के अलग-अलग मायने रखता है. अमेरिका के लिए यह अपनी सैन्य श्रेष्ठता और मध्य पूर्व में प्रभाव बनाए रखने का मामला है, जबकि ईरान के लिए यह अस्तित्व और क्षेत्रीय प्रतिरोध की लड़ाई है. लेकिन भारत के लिए यह संकट की घड़ी है, क्योंकि यहां की अर्थव्यवस्था और लाखों परिवारों की जिंदगी सीधे दांव पर लगी हुई है.वर्तमान में खाड़ी देशों (GCC: UAE, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन) में करीब 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय प्रवासी रहते हैं. ये आंकड़े भारत सरकार के विदेश मंत्रालय और हालिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं. इनमें से अधिकांश लोग मजदूर वर्ग से हैं. ये खाड़ी देशों में निर्माण, सफाई, ड्राइविंग, अस्पतालों में सहायक जैसे छोटे-मोटे काम करते हैं.

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इन मजदूरों में बहुत से ऐसे लोग हैं जो खाड़ी देशों में  रोजगार करने के लिए अपने परिवार की सारी जमा-पूंजी लगा कर पहुंचे हैं. किसी ने इसके लिए खेत बेच दिए हैं, तो कितने लोग अपनी पत्नी और मां के गहने गिरवी रखकर खाड़ी देश पहुंचे हैं. ये लोग हजारों किलोमीटर दूर ऐसे ही नहीं पहुंचे हैं. इसमें हर किसी का सपना एक जैसा ही होता है. कोई अपने बच्चों की पढ़ाई तो कोई अपने परिवार के लिए घर का निर्माण का सपना लेकर यहां तक पहुंचे हैं. लेकिन अब मिसाइलों की आवाजें, एयरस्पेस बंद होना, फ्लाइट्स कैंसल होना और युद्ध की आशंका उनके सपनों पर काला बादल बनकर मंडरा रहे हैं. 
इन प्रवासियों का योगदान भारत की अर्थव्यवस्था के लिए अनमोल है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की 2025 की रेमिटेंस सर्वे के अनुसार, कुल रेमिटेंस में GCC देशों का हिस्सा अभी भी करीब 38-40 प्रतिशत है. भले ही अमेरिका अब सबसे बड़ा स्रोत (27.7%) बन गया हो पर कुल रेमिटेंस 2023-24 में 118.7 बिलियन डॉलर थीं, जो FY25 में बढ़कर 135-136 बिलियन डॉलर तक पहुंच गई हैं. इसमें UAE अकेले 19.2 प्रतिशत योगदान देता है जबकि सऊदी अरब की हिस्सेदारी 6.7 प्रतिशत की है. ये रेमिटेंस भारत के ट्रेड डेफिसिट का बड़ा हिस्सा कवर करती हैं, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करती हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देती हैं. 

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खास बात यह है कि खाड़ी में काम करने वाले मजदूर अपनी कमाई का 70-90 प्रतिशत घर भेजते हैं. यह प्रतिशत अमेरिका-यूरोप या ऑस्ट्रेलिया में बसे उच्च-कुशल भारतीयों से कहीं ज्यादा है. वहां के प्रोफेशनल्स (आईटी, डॉक्टर, इंजीनियर) अच्छी सैलरी कमाते हैं, लेकिन वे घर, कार और छुट्टियों पर ज्यादा खर्च करते हैं.ये या तो अपने घर कुछ भेजते ही नहीं हैं या भेजते भी हैं तो उनकी कमाई का बहुत कम हिस्सा होता है. वहीं खाड़ी के मजदूर न्यूनतम खर्च पर जीते हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य परिवार को सहारा देना होता है. इसलिए, संख्या में कम होने के बावजूद (कुल डायस्पोरा का करीब एक-चौथाई) लोग कुल रेमिटेंस का लगभग 40 प्रतिशत भेजते हैं. 

यह योगदान सिर्फ आंकड़ों का नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की जीविका का है जो उत्तर प्रदेश, बिहार, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में रहते हैं. इसलिए युद्ध लंबा खिंचने से भारत के लाखों परिवारों के सामने संकट की स्थिति आ सकती है. सबसे पहले, सुरक्षा का सवाल है. हालिया घटनाक्रम में ईरान के जवाबी हमलों से UAE और अन्य GCC देश प्रभावित हुए हैं. एयरस्पेस बंद, फ्लाइट्स रद्द, हवाई अड्डे बंद होने के चलते हजारों भारतीय फंसे हुए हैं. कई मजदूर बंकर ढूंढ रहे हैं, काम पर जाने से डर रहे हैं. अगर संघर्ष बढ़ा तो निर्माण साइटें बंद हो सकती हैं, नौकरियां जा सकती हैं. इससे रेमिटेंस में गिरावट आएगी, जो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए झटका होगा. इसके साथ कोढ़ में खाज यह होगा कि तेल की कीमतें बढ़ेंगी (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने की आशंका), जिससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा और महंगाई चरम पर पहुंच सकती है. इस तरह  भारत पर दोहरी मार पड़ने वाली है.

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 भारत को एक तरफ, इन 90 लाख लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है. इसके लिए एंबेसी सक्रिय हैं, हेल्पलाइन जारी की गईं हैं इसके साथ ही इमरजेंसी इवेक्यूएशन प्लान तैयार है. सरकार ने पहले भी (कोविड के दौरान) लाखों भारतीय को को विदेशों से वापस लाया था. भारत एक बार फिर इस तरह की कोई योजना बना सकता है. दूसरी तरफ, भारत किसी पक्ष में शामिल नहीं होना चाहता. उसकी नीति अभी तक संतुलित रही है. अब तक भारत का इज़राइल से रक्षा साझेदारी, ईरान से ऊर्जा और चाबहार पोर्ट का रिश्ता, GCC से व्यापार और रेमिटेंस का रिश्ता रहा है. भारत चाहता है कि युद्ध जल्द खत्म हो, क्योंकि लंबा संघर्ष इन प्रवासियों के लिए तबाही और अर्थव्यवस्था के लिए संकट लाएगा.यह संकट हमें याद दिलाता है कि भारत की असली ताकत उसके लोग हैं. चाहे वे सिलिकॉन वैली में हों या दुबई की निर्माण साइटों पर हों. 

खाड़ी के मजदूर 'सफेद कॉलर' एनआरआई से कम चर्चित हैं, लेकिन उनकी मेहनत से भेजा हर रुपया देश की रीढ़ मजबूत करता है. सरकार को चाहिए कि न सिर्फ इमरजेंसी में, बल्कि लंबे समय में इनकी सुरक्षा, बेहतर वेतन, श्रम अधिकार और सुरक्षित वापसी के लिए मजबूत नीतियां बनाए. क्योंकि इनकी सुरक्षा भारत की आर्थिक सुरक्षा है. युद्ध कभी भी समाप्त हो सकता है, लेकिन इन परिवारों की चिंता और योगदान स्थायी है.

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