बंगाल में ‘ओवैसी’ बनने की जंग, 30% मुस्लिम वोटों पर कब्जे की लड़ाई

पश्चिम बंगाल की राजनीति में 30% मुस्लिम वोटबैंक वो 'किंगमेकर' है, जो तय करता है कि नबन्ना (सचिवालय) की कुर्सी पर कौन बैठेगा. फिलहाल ममता बनर्जी इस किले की निर्विवाद कोतवाल हैं, लेकिन अब इस किले में सेंधमारी की कोशिशें तेज हो गई हैं.

Advertisement
हुमायूं कबीर, ओवैसी और अब्बास सिद्दीकी... बंगाल में ममता बनर्जी के मुस्लिम वोटरबैंक में सेंध लगाने की तैयारी. हुमायूं कबीर, ओवैसी और अब्बास सिद्दीकी... बंगाल में ममता बनर्जी के मुस्लिम वोटरबैंक में सेंध लगाने की तैयारी.

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 23 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:08 PM IST

‘मोदी सऊदी अरब जाकर वहां के नेताओं से हाथ मिलाते हैं. जब वापस आते हैं तो हिंदू-मुस्लिम करते हैं. SIR की आड़ में वोटरों के नाम कटवाते हैं. घुसपैठिया का लेबल लगाते हैं. सबसे बड़े घुसपैठिया तो आप हैं.’ -ममता बनर्जी (ईद के दिन संबोधित करते हुए)

पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस वक्त सबसे दिलचस्प लड़ाई चल रही है मुस्लिम वोटबैंक पर पकड़ बनाने बनाम कायम रखने की. करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाला राज्य. जहां कई सीटों पर मुसलमान निर्णायक भूमिका हैं. और इसी वजह से हर चुनाव में यह वोट ‘गेम चेंजर’ बन जाता है.

Advertisement

तेलंगाना के अलावा यूपी, बिहार और महाराष्ट्र में ‘ओवैसी’ उस राजनीतिक हस्तक्षेप का नाम है, जो सेकुलर पार्टियों की मुस्लिम वोटबैंक पॉलिटिक्स का खेल बिगाड़ देता है. पश्चिम बंगाल चुनाव में इसी ‘ओवैसी फैक्टर’ को साधते हुए ममता बनर्जी के सामने तीन धड़े खड़े हैं. बंगाल में मुस्लिम वोटरों की तादाद ठीक-ठाक है. करीब 30 फीसदी. ऐसे में इस बात की गुंजाइश पूरी है कि कोई पार्टी मुसलमानों का नाम लेकर सिर्फ मुसलमान नेता के सहारे आगे बढ़े.

अब तक इस वोटबैंक पर सबसे मजबूत पकड़ ममता बनर्जी की रही है. लेकिन इस बार कुछ नए और पुराने चेहरे इस पकड़ को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं. सवाल वही है कि क्या बंगाल में कोई ‘ओवैसी’ बन पाएगा? उसी तरह जैसे यूपी, बिहार, महाराष्ट्र में ओवैसी मुस्लिम बहुत सीटों पर अपना प्रभाव बढ़ा रहे हैं. इस दौड़ में तीन नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं- हुमायूं कबीर, अब्बास सिद्दीकी और असदुद्दीन ओवैसी खुद. लेकिन तस्वीर इतनी सीधी नहीं है.

Advertisement

हुमायूं कबीर की दस्तकः लेकिन जकात में नहीं मिलते वोट

सबसे पहले बात हुमायूं कबीर की. कभी TMC में थे. अब बागी हैं. अपनी पार्टी बना ली है- आम जनता उन्नयन पार्टी. उनका सबसे बड़ा आधार मुर्शिदाबाद है. यह इलाका मुस्लिम बहुल है. यहां उनकी पकड़ मानी जाती है. हाल के दिनों में बाबरी मस्जिद को लेकर उनकी सक्रियता ने उन्हें चर्चा में ला दिया. इससे एक वर्ग में उनकी पहचान मजबूत हुई. खासकर उन मतदाताओं में जो धार्मिक मुद्दों से जुड़ाव रखते हैं. लेकिन राजनीति सिर्फ पहचान से नहीं चलती. संगठन चाहिए. नेटवर्क चाहिए. यहीं पर हुमायूं कबीर कमजोर पड़ते हैं. उनका प्रभाव मुर्शिदाबाद तक सीमित है. मालदा और उत्तर दिनाजपुर के कुछ हिस्सों में हल्की पकड़ है. लेकिन राज्यव्यापी असर नहीं है. मुसलमान मस्जिद के नाम पर उन्हें हर तरह की मदद तो दे सकते हैं, लेकिन वोट जकात में नहीं मिलते.

उनकी रणनीति भी साफ दिखती है. ज्यादा सीटों पर नहीं. चुनिंदा सीटों पर लड़ना. स्थानीय चेहरों को उतारना. यानी ‘कम लेकिन टारगेटेड’ राजनीति. मुसलमानों के  वोट का ध्रुवीकरण करने के लिए उन्होंने AIMIM से एक रणनीतिक गठबंधन किया है. ताजा खबर ये है कि वे 294 में से 182 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और ओवैसी की पार्टी 8 सीटों पर. लेकिन असली सवाल जीत का है. क्या वे सीट निकाल पाएंगे? या सिर्फ TMC का वोट काटेंगे? फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि उनका रोल ‘स्पॉइलर’ का ज्यादा हो सकता है. ऐसा क्यों? इसे आगे समझेंगे.

Advertisement

ओवैसी का है बड़ा नामः लेकिन बंगाल कोई बिहार नहीं

अब आते हैं असदुद्दीन ओवैसी पर. राष्ट्रीय चेहरा. मुस्लिम राजनीति की आक्रामक आवाज. बिहार में सफलता के बाद उनकी नजर यूपी पर ज्यादा है. क्योंकि, 2021 के पिछले बंगाल चुनाव में AIMIM ने करीब 7 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन एक भी सीट नहीं मिली. यह नतीजा साफ संदेश था कि बंगाल बिहार नहीं है. बिहार में सीमांचल में उन्होंने जो किया, वैसा बंगाल में नहीं कर पाए. वजह साफ है. यहां पहले से TMC का मजबूत आधार है. मुस्लिम वोट बंटने को तैयार नहीं है. इस बार उन्होंने अपनी कोशिश में हुमायूं कबीर का नाम जोड़ा है. और उनके साथ मिलकर भी वे 8 सीट  पर ही लड़ेंगे.

AIMIM का असर मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर के कुछ इलाकों में माना जाता है. लेकिन यह असर सतही है. गहराई नहीं है. अभी पार्टी का राज्यस्तरीय नेतृत्व कुछ अफवाहों से जूझ रहा है. खबर उड़ा दी गई है कि कुछ लोगों को टिकट मिल गए हैं. जबकि प्रदेश अध्यक्ष इमरान मलिक सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं कि अधिकृत उम्मीदवार ओवैसी या वे खुद घोषित करेंगे. इस बार AIMIM की रणनीति अभी खुलकर सामने नहीं आई है. उनकी सबसे बड़ी दिक्कत वही है- टैक्टिकल वोटिंग. बंगाल का मुस्लिम वोटर भावनाओं से ज्यादा गणित देखता है. वह उसी को वोट देता है जो बीजेपी को हरा सके. इस गणित में अभी भी TMC सबसे आगे है.

Advertisement

फुरफुरा शरीफ का रसूखः लेकिन सिद्दीकी एक सीट के बादशाह

अब बात अब्बास सिद्दीकी की. फुरफुरा शरीफ से जुड़े हैं. धार्मिक पहचान मजबूत है. 2021 में उन्होंने इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के बैनर तले चुनाव लड़ा. तब उन्होंने लेफ्ट और कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था. करीब 30 से ज्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारे. लेकिन जीत सिर्फ भांगर की एक सीट पर मिली. यह जीत छोटी जरूर थी, लेकिन संकेत बड़ा था. कि उनका एक कोर वोटबेस है.

उनका प्रभाव दक्षिण 24 परगना के भांगर इलाके में सबसे ज्यादा है. इसके अलावा हुगली, हावड़ा और आसपास के कुछ इलाकों में असर दिखता है. यह असर पूरी तरह राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक नेटवर्क से आता है. अब सवाल है इस बार का. क्या वे फिर गठबंधन करेंगे? अभी तस्वीर साफ नहीं है. लेफ्ट के साथ रिश्ते ठंडे हैं. कांग्रेस से दूरी है. ऐसे में संभावना है कि वे अकेले लड़ें या छोटे स्तर का गठबंधन करें. जैसे पिछली बार किया था. अगर वे अकेले लड़ते हैं, तो असर सीमित रहेगा. अगर मजबूत गठबंधन बनता है, तो कुछ सीटों पर चुनौती बन सकते हैं. लेकिन राज्य स्तर पर बड़ी ताकत बनने के लिए अभी लंबा रास्ता है.

सबसे अहम है ममता बनर्जी की पकड़

Advertisement

2011 में सत्ता में आने के बाद से ममता ने लगातार मुस्लिम वोटबैंक को साधे रखा है. यह सिर्फ नारों से नहीं हुआ. इसके पीछे ठोस रणनीति है.

पहला- सरकारी योजनाएं. इमाम भत्ता, मदरसों को सहायता, छात्रवृत्ति. इन योजनाओं का सीधा असर पड़ा है. लोगों को महसूस हुआ कि सरकार उनके साथ है.

दूसरा- राजनीतिक मैसेज. ममता खुद को ‘सेक्युलर ढाल’ के रूप में पेश करती हैं. उनका संदेश साफ रहता है कि बीजेपी को रोकना है तो TMC ही विकल्प है.

तीसरा- बीजेपी फैक्टर. बंगाल में बीजेपी के उभार ने मुस्लिम वोट को और ज्यादा एकजुट किया. डर और रणनीति दोनों ने काम किया.

चौथा- संगठन. TMC का बूथ लेवल नेटवर्क बहुत मजबूत है. चुनाव के दिन यही सबसे बड़ा हथियार बनता है.

पांचवां- प्रतीकात्मक राजनीति. ईद में भागीदारी. मुस्लिम नेताओं को आगे बढ़ाना. यह सब विश्वास बनाए रखता है.

बड़ा सवाल- क्या मुस्लिम वोटर विकल्प चाहता है?

जवाब आसान तो नहीं है, क्योंकि असंतोष हर जगह होता है. बंगाल में भी है. लेकिन वोटिंग के वक्त तस्वीर बदल जाती है. मुस्लिम वोटर बंटना नहीं चाहता. वह ‘विनिंग साइड’ के साथ जाना चाहता है. उसे डर है कि अगर वोट बंटा, तो फायदा बीजेपी को होगा. इसी वजह से छोटे दलों की सबसे बड़ी समस्या है ‘विश्वास’. लोग उन्हें पसंद कर सकते हैं. लेकिन वोट देने से पहले सोचते हैं कि क्या ये जीत सकते हैं? और यही जगह है जहां ममता आगे निकल जाती हैं.

Advertisement

बंगाल में ‘ओवैसी बनने’ की जंग जरूर चल रही है. हुमायूं कबीर अपनी जगह लड़ रहे हैं. अब्बास सिद्दीकी अपनी जमीन बचा और बढ़ा रहे हैं. असदुद्दीन ओवैसी मौके की तलाश में हैं. लेकिन तीनों की सीमा साफ है. इनका असर लोकल है. संगठन सीमित है. और सबसे बड़ी बात कि मुस्लिम वोटर अभी रिस्क लेने के मूड में नहीं है. इसके उलट, ममता बनर्जी के पास भरोसा है. नेटवर्क है. और जीत का ट्रैक रिकॉर्ड है. आने वाला चुनाव बताएगा कि यह लड़ाई सिर्फ शोर है या सच में कोई नया चेहरा उभरने वाला है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement