बीजेपी को बिहार की राजनीति में पांव जमाने में बीस साल से ज्यादा लग गए. नीतीश कुमार को आगे करके दो दशक तक पीछे पीछे चलना पड़ा. नीतीश कुमार के दो-दो बार साथ छोड़ देने के बावजूद मजबूरन साथ लेना पड़ा. लेकिन दूसरी बार साथ लिया, तो नीतीश कुमार को गलती मानने के लिए मजबूर कर दिया. नीतीश कुमार अक्सर कहने लगे, अब कहीं नहीं जाएंगे.
नीतीश कुमार को बिहार से हटाकर राज्यसभा के जरिए दिल्ली शिफ्ट करने में बीजेपी को बहुत मेहनत करनी पड़ी है. साम-दाम-दंड-भेद वाली राजनीति करनी पड़ी है. नीतीश कुमार को साथ रखते हुए उनके कमजोर पड़ने का इंतजार करना पड़ा है - और अब भी ऐसी सूरत नहीं बन सकी है कि बीजेपी नीतीश कुमार को साथ लिए बगैर बिहार में कोई राजनीतिक कदम बढ़ा सके.
2025 के बिहार चुनाव से पहले ही प्रशांत किशोर जैसे लोग जेडीयू और नीतीश कुमार को लेकर तमाम दावे कर रहे थे. वे दावे पूरी तरह तो नहीं, लेकिन धीरे धीरे बहुत हद तक सच होते दिखाई पड़ रहे हैं - और नीतीश कुमार के बिहार छोड़ने की घोषणा के बाद जेडीयू के भविष्य पर भी सवाल खड़ा होने लगा है.
गठबंधन धर्म और मजबूरियों से मुक्ति की ओर
2024 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले नीतीश कुमार पाला बदल कर एनडीए में फिर से शामिल हो गए थे. बार बार दोहराते रहे, अब कहीं नहीं जाएंगे. चले गए थे. गलती हो गई थी - और आखिर में एक दिन पलटी मारने का ठीकरा साथी जेडीयू नेता ललन सिंह के सिर पर फोड़ दिया.
ये तो नीतीश कुमार के हथियार डाल देने का मन बना लेने के संकेत थे, सबूत तो तब मिला जब नई सरकार बनी. नीतीश कुमार बीजेपी के लिए गृह मंत्रालय छोड़ने को तैयार हो गए. डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी गृह विभाग के मंत्री बन गए. थोड़ा पीछे लौटकर देखें तो बिहार विधानसभा चुनाव बीजेपी के बराबर सीटों पर लड़ने के लिए तैयार होना भी एक मजबूत संकेत ही था. क्योंकि जेडीयू शुरू से ही बीजेपी के मुकाबले बड़ी हिस्सेदार के तौर पर पेश आती रही थी.
1. वाजपेयी-आडवाणी के दौर में बीजेपी की बिहार में भी एनडीए के गठबंधन धर्म को शिद्दत से निभाने में यकीन रखती थी, लेकिन मोदी-शाह युग के शुरू होने के साथ ही सब कुछ बदलने लगा. पुरानी बीजेपी को कांग्रेस और सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों से मुकाबले के लिए बीजेपी को पिछड़ी जातियों को साथ लाने के लिए सहयोगी की सख्त जरूरत थी. ऐसी सूरत में बीजेपी बराबरी का रिश्ता संभव न होने पर जूनियर पार्टनर का रोल भी स्वीकार कर लेती थी.
2. मोदी-शाह युग में हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के एजेंडे के साथ वेलफेयर स्कीम, मजबूत नेतृत्व और डबल इंजन सरकार जैसे स्लोगन के साथ बीजेपी तेजी से कदम बढ़ाने लगी. और, ऐसे नजारे बिहार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और हरियाणा जैसे राज्यों में भी देखने को मिले, जिसमें बीजेपी सहयोगी दलों पर दबदबा बनाने लगी. चिराग पासवान की भूमिका 2020 और 2025 दोनों चुनावों में बीजेपी के लिए मददगार रही. 2020 के चुनाव में चिराग पासवान की रणनीति से नीतीश कुमार को सीटों का नुकसान हुआ, 2025 में सीट शेयरिंग में बड़ी हिस्सेदारी लेकर नीतीश कुमार को बराबरी पर रोक दिया था - महाराष्ट्र के बाद बिहार की ही बारी थी, ऐसा तो बहुत पहले से ही लगने लगा था.
'धीरे धीरे रे मना...'
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कबीर का एक दोहा बार बार नीतीश कुमार के मुंह से सुनने को मिला था, "धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय... माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय."
तब नीतीश कुमार शायद समझ नहीं पाए कि वह तो सिर्फ एक चुनाव पर फोकस थे, लेकिन उनकी ही रणनीति पर आगे बढ़ते हुए बीजेपी बिहार में सत्ता की राजनीति पर धीरे धीरे काबिज होने के मकसद से काम कर रही थी - बड़े नतीजे सामने आने में देर तो लगती ही है.
1. नीतीश कुमार की राजनीतिक ताकत और विजन के सहारे बीजेपी ने पहली बार गंभीर होकर बिहार का रुख किया. लेकिन सत्ता हासिल करने के लिए पांच साल इंतजार करना पड़ा. 2005 में जेडीयू और बीजेपी की गठबंधन सरकार बनी. जेडीयू ने 88 सीटें जीतीं, और बीजेपी को 55 मिलीं. 2010 में जेडीयू का नंबर 115 आया, और बीजेपी को भी 91 नंबर मिले. बिहार विधानसभा में गठबंधन को 243 में से 206 सीटें मिल गईं - ताजा आंकड़ा अभी उस रिकॉर्ड को नहीं छू सका है, 4 सीटें कम ही हैं.
2. 2014 के आम चुनाव से पहले मोदी-शाह युग दस्तक दे चुका था. एनडीए में नीतीश कुमार खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानकर चल रहे थे, लेकिन तभी बीजेपी ने नरेंद्र मोदी के नाम की सार्वजनिक घोषणा कर दी. बीजेपी का साथ छोड़कर नीतीश कुमार सीपीआई के साथ चुनाव लड़े, और महज दो सीटें मिलीं.
2014 के चुनाव में एनडीए को नीतीश कुमार के अलग होने के बावजूद 31 लोकसभा सीटें मिलीं, जिनमें बीजेपी ने अकेले 22 सीटों पर जीत दर्ज की थी. बीजेपी के लिए यह बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव में मोदी-शाह का करिश्मा नहीं दिखा, और नीतीश कुमार फिर भारी पड़े.
बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने लालू यादव के साथ हाथ मिलाया और महागठबंधन बना. चुनाव में एनडीए को शिकस्त मिली. हालांकि, वोट शेयर के मामले में बीजेपी आगे रही. बीजेपी को 24.4 फीसदी वोटों के साथ 53 सीटें मिलीं. आरजेडी का वोट शेयर 18.4 फीसदी, जबकि जेडीयू का 16.8 फीसदी रहा.
3. हालात ऐसे बने कि 2017 में नीतीश कुमार को लौटकर बीजेपी के साथ आना पड़ा. मोदी-शाह की बीजेपी तब तक गठबंधन धर्म निभाने के सिद्धांतों से काफी आगे निकल चुकी थी. जैसे कम सीटें होने का बावजूद नीतीश कुमार महागठबंधन में मुख्यमंत्री की कुर्सी अपने पास रखने में कामयाब रहे, बीजेपी के साथ भी वैसा ही होता रहा.
2020 का विधानसभा चुनाव आने तक बिहार की राजनीति में बीजेपी को अपना पांव मजबूत करने, और नीतीश कुमार को कमजोर करने रणनीति काम करने लगी थी. एनडीए से अलग होकर चिराग पासवान की रणनीति भी बीजेपी के लिए मददगार साबित हुई. चुनाव नतीजे आए तो मालूम हुआ बीजेपी का वोट शेयर 19.46 फीसदी, और जेडीयू का 15.39 फीसदी आया - बीजेपी को 74 सीटें मिलीं, जबकि जेडीयू 43 पर सिमट गई.
बीजेपी को झटका देते हुए नीतीश कुमार ने 2022 में फिर पाला बदल लिया. विपक्ष को एकजुट करने में लग गए, और बिहार की धरती पर ही INDIA ब्लॉक की नींव पड़ी. बहुत हाथ पैर मारने के बाद भी जब मनमाफिक चीजें नहीं हो रही थीं, तो नीतीश कुमार फिर से एनडीए में लौट आए.
2025 का बिहार विधानसभा चुनाव गठबंधन में बड़े भाई का रोल तय करने के लिए निर्णायक साबित हुआ. एनडीए को 202 सीटें हासिल हुईं, जिनमें बीजेपी को 89 और जेडीयू के हिस्से में 85 आईं. मुख्यमंत्री तो नीतीश कुमार ही बने, लेकिन गृह विभाग अपने पास लेकर बीजेपी ने अपना इरादा पूरी तरह साफ कर दिया - और नीतीश कुमार को बिहार छोड़ देने की बीजेपी की बात माननी ही पड़ी.
4. बीजेपी को लगा है कि नीतीश कुमार का जितना फायदा मिल सकता था, मिल चुका. अब नीतीश कुमार के खिलाफ भी सत्ता विरोधी लहर काम करने लगी थी. लेकिन, चुनाव से पहले संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की रणनीति अपनाई गई. केंद्रीय मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी ने गांवों तक लोगों के बीच पहुंच बनाई, केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं ने भी मदद की. नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना ने भी चमत्कार दिखाया - और आरजेडी जैसे क्षेत्रीय दलों के लिए मुकाबला करना मुश्किल हो गया.
सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए बीजेपी ने सम्राट चौधरी और नित्यनंद राय जैसे नेताओं को आजमाया, चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं को फिर से साथ ले लिया. इंतजाम इतना कर लिया कि नीतीश जरूरी भले रहें, लेकिन मजबूरी नहीं.
5. सारी कवायद के बावजूद बीजेपी अभी तक बिहार में एक भी ऐसा नेता नहीं खड़ा कर सकी है, जिसे सभी जातियों का समर्थन हासिल हो. जो नीतीश कुमार का विकल्प बन सके. यही वजह है कि बीजेपी को निशांत कुमार को साथ लेना पड़ा है - संगठन में तो आ ही चुके हैं, गठबंधन की सरकार में उनको डिप्टी सीएम बनाए जाने की बात चल रही है.
अब जेडीयू का क्या होगा?
बीजेपी ने नीतीश कुमार बिहार छोड़ने के लिए राजी कर लिया है, लेकिन अब वह अपनी सबसे बड़ी मुसीबत से निजात पाना चाहेगी. व्यक्ति के बदल जाने से परिस्थितियां नहीं बदल जातीं. नीतीश कुमार के हटने के बाद क्या गारंटी है कि उनकी 'पलटूराम' पॉलिटिक्स भी खत्म हो जाएगी ही. क्या मालूम कल निशांत कुमार और जेडीयू चला रहे नेताओं ने फिर से लालू परिवार से हाथ मिला लिया?
ऐसी आशंका और समस्या का स्थाई समाधान एक ही है, जेडीयू का बीजेपी में विलय. मतलब, हमेशा के लिए झंझट ही खत्म. विलय के बाद बीजेपी के पास अपने साथ साथ जेडीयू का वोट शेयर भी आ जाएगा. सवर्णों के सपोर्ट से लेकर लव-कुश समीकरण और ईबीसी वोटर तक. करीब करीब विपक्ष-मुक्त बिहार - बीजेपी की कोशिश तो ऐसी ही होगी.
हर तस्वीर का दूसरा पहलू भी होता है. फायदेमंद भी, और नुकसानदेह भी. बीजेपी को पसंद नहीं करने वाले भी जेडीयू की वजह से एनडीए का साथ देते हैं. संभव है, जेडीयू के बीजेपी में विलय के बाद ऐसा वोटर बीजेपी को बर्दाश्त न कर पाए. नीतीश कुमार का फॉर्मूला अपनाते हुए पलटी मार ले - और विपक्ष की तरफ चला जाए.
बीजेपी नेतृत्व के मन में भी ऐसी आशंकाएं हैं, लिहाजा वह हड़बड़ी में नहीं है. नीतीश कुमार को साथ रखने और उनकी विरासत पर काबिज होने के लिए कबीर के बताए रास्ते पर चलना ही मुफीद है, जो नीतीश कुमार को भी पसंद है - 'धीरे धीरे रे मना...'
मृगांक शेखर