असम विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल से इस बार जो तस्वीर उभरकर सामने आ रही है, वो सिर्फ एक चुनावी जीत की कहानी नहीं है, बल्कि एक लंबे राजनीतिक ट्रांजिशन का नतीजा है. भारतीय जनता पार्टी की लगातार तीसरी जीत-यानी हैट्रिक-को अगर सिर्फ एंटी-इनकंबेंसी न होने या विपक्ष की कमजोरी से समझने की कोशिश करेंगे, तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी. असल में ये जीत कई लेयर्स में बनी है. नेतृत्व, संगठन, सामाजिक समीकरण, और माइक्रो-मैनेजमेंट- सब कुछ मिलकर.
लेकिन इस पूरी कहानी के केंद्र में एक नाम है- हिमंता बिस्वा सरमा. और दिलचस्प बात ये है कि वे परंपरागत बीजेपी या आरएसएस बैकग्राउंड से आने वाले नेता नहीं हैं. कांग्रेस से निकलकर बीजेपी में आए सरमा आज न सिर्फ पार्टी के सबसे प्रभावी चेहरों में हैं, बल्कि हिंदुत्व की राजनीति के एक फायरब्रांड नेता के तौर पर भी स्थापित हो चुके हैं. कई राजनीतिक विचारक हिमंता और योगी आदित्यनाथ में समानता देखते हैं. क्योंकि, दोनों बीजेपी की परंपरागत पाठशाला आरएसएस से नहीं आते हैं. लेकिन, योगी तो फिर भी हिंदुत्व की पहचान रहे हैं, लेकिन हिमंता ने उनसे दोगुनी रफ्तार से हिंदू हृदय सम्राट बनने का काम किया है. असम में बीजेपी की जिस जीत का आंकलन किया जा रहा है, उसे समझना है तो उनके हिमंता के ट्रांसफॉर्मेशन को समझना जरूरी है.
कांग्रेस से बीजेपी: सरमा का ट्रांसफॉर्मेशन
हिमंता बिस्वा सरमा कभी कांग्रेस के सबसे ताकतवर रणनीतिकारों में गिने जाते थे. असम में कांग्रेस की कई जीतों के पीछे उनका दिमाग माना जाता था. लेकिन नेतृत्व से टकराव के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ी और बीजेपी का दामन थाम लिया.
यहीं से उनकी दूसरी पारी शुरू हुई-और यही पारी उन्हें एक नए अवतार में ले गई. बीजेपी में आने के बाद सरमा ने सिर्फ संगठन में फिट होने की कोशिश नहीं की, बल्कि उन्होंने खुद को पार्टी के वैचारिक फ्रेम-यानी हिंदुत्व-के साथ पूरी तरह खुद को एडजस्ट कर लिया.
फायर ब्रांड नेताः आज वे ऐसे नेता हैं जो खुलकर पहचान, अवैध घुसपैठ, और सांस्कृतिक अस्मिता जैसे मुद्दों पर बोलते हैं. यही वजह है कि वे धीरे-धीरे ‘फायरब्रांड’ इमेज में ढलते गए-जो सिर्फ असम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी उनकी पहचान बन गई.
‘सुलभ मुख्यमंत्री’: इस चुनाव में बीजेपी ने राष्ट्रीय मुद्दों को पीछे रखकर स्थानीय मुद्दों पर ध्यान दिया. बाढ़ प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को कैंपेन के सेंटर में रखा गया. हिमंता बिस्वा सरमा ने खुद को ‘सुलभ मुख्यमंत्री’ के तौर पर पेश किया-जो दिल्ली नहीं, गुवाहाटी और जिलों में दिखता है. उनकी यही दोहरी छवि-एक तरफ प्रशासनिक दक्षता, दूसरी तरफ वैचारिक आक्रामकता-उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है. हिमंता वे सभी चौखाने टिक कर रहे थे, जिनमें से किसी एक भी खाली रहने से एंटी-इनकंबेंसी पनपती है.
जीरो एंटी-इनकंबेंसीः आमतौर पर तीन कार्यकाल के बाद किसी भी सरकार के खिलाफ नाराजगी या थकान दिखती है, लेकिन असम में ऐसा नहीं हुआ. बल्कि इसके उलट हिमंता के प्रति अपार समर्थन दिखा. इसके पीछे तीन बड़े कारण हैं. पहला, योजनाओं का सीधा असर. दूसरा, नेतृत्व की मजबूत और निर्णायक छवि. और तीसरा, विपक्ष का कमजोर विकल्प.
दो ध्रुवों की लड़ाई, तीसरे की जगह खत्म
इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि मुकाबला लगभग बाइनरी हो गया-एक तरफ नंबर वन बीजेपी, दूसरी तरफ नंबर टू कांग्रेस. बाकी क्षेत्रीय या छोटे खिलाड़ी इस बार नैरेटिव सेट करने में नाकाम रहे. सबसे बड़ा बदलाव रहा बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF का सिमटता दिखना. कांग्रेस से इस पार्टी का समझौता नहीं हुआ. ऐसे में जब मुस्लिम वोटरों के सामने मौका आया कि उन्हें AIUDF और कांग्रेस में एक को चुनना था, तो उन्होंने कांग्रेस को चुना. क्योंकि माना गया कि वही बीजेपी की असली प्रतिद्वंदी है. मतलब, असम के वोटरों के सामने साफ विकल्प बन गया- ‘कौन जीतेगा’ नहीं, बल्कि ‘किसे रोकना है’ या ‘किसे मजबूत करना है’. जिसके सेंटर में थे हिमंता बिस्वा सरमा.
एग्जिट पोल और शुरुआती रुझान बताते हैं कि कांग्रेस का वोट शेयर बढ़ा जरूर है, लेकिन बीजेपी ने उससे कहीं ज्यादा आक्रामक तरीके से नए वोटर जोड़े हैं. यानी कांग्रेस ने जो हासिल किया, बीजेपी ने उससे कहीं ज्यादा विस्तार कर लिया.
असम की राजनीति को समझने के लिए पिछले 15 साल के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है:
2011: बीजेपी 5 सीट (11.47%), कांग्रेस 78 सीट (39.39%)
2016: बीजेपी 60 सीट (29.51%), कांग्रेस 26 सीट (30.96%)
2021: बीजेपी 75 सीट (33.21%), कांग्रेस 29 सीट (29.67%)
2026 (exit poll): बीजेपी 92 सीट (48%), कांग्रेस 30 सीट (38%)
ये सिर्फ सीटों का अंतर नहीं है, ये नैरेटिव शिफ्ट है. यानी, 2011 में जो बीजेपी पांच सीट लेकर हाशिए पर थी, वही 2026 में प्रमुख ताकत बन गई.
‘मियां’ मुद्दा: कंट्रोवर्सी से ध्रुवीकरण तक
इस चुनाव में हिमंता बिस्वा सरमा द्वारा इस्तेमाल किए गए ‘मियां’ शब्द को लेकर काफी विवाद हुआ. विपक्ष ने इसे ध्रुवीकरण का मुद्दा बताया, लेकिन जमीन पर इसका असर अलग दिखा. हिमंता ने इसे सिर्फ पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ‘अवैध घुसपैठ’ और ‘रिसोर्स के बंटवारे’ जैसे मुद्दों से जोड़ा.
नतीजा ये हुआ कि असमिया पहचान को लेकर जो भावना थी, वो एकजुट होकर बीजेपी के पक्ष में चली गई. जहां विपक्ष इसे बांटने वाला मुद्दा बताता रहा, वहीं बीजेपी ने इसे सांस्कृतिक-सुरक्षा के नैरेटिव में बदल दिया.
महिला वोटर: गेमचेंजर फैक्टर
बीजेपी की जीत का सबसे कम चर्चा में लेकिन सबसे ताकतवर कारण है- महिलाएं. ओरुणोदयी योजना के तहत करीब 40 लाख महिलाओं के खातों में सीधे पैसे पहुंचे. चुनाव से पहले एकमुश्त 9 हजार रुपये की मदद ने एक मजबूत भावनात्मक और आर्थिक जुड़ाव बनाया.
ये सिर्फ एक योजना नहीं थी, ये टारगेटेड पॉलिटिकल इन्वेस्टमेंट था. गांव-गांव में महिलाएं इस योजना की लाभार्थी हैं, और उन्होंने वोट के जरिए इसका जवाब दिया. हिमंता की हर सभा में महिलाएं दिखाई दे रही थीं. वे जहां-जहां जा रहे थे, महिलाओं का सत्कार चुनाव नतीजों के इशारे कर रहा था.
कांग्रेस की कमजोरी: सुस्त रफ्तार
अगर बीजेपी की जीत को समझना है, तो कांग्रेस की हार को भी देखना होगा.
राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का प्रचार में सीमित हिस्सा लेना सवाल खड़े करता है. वैसे सवाल तो उसी दिन से उठने लगे थे जिस दिन प्रियंका गांधी को असम का इंचार्ज बनाया गया था. पूछा गया कि वे केरल से सांसद हैं, लेकिन वहां के चुनाव से दूर उन्हें असम क्यों भेजा जा रहा है? पार्टी की ओर से स्पष्ट जवाब नहीं आया. और फिर उसके बाद कांग्रेस के बड़े नेता टूटने लगे. सबसे पहले कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा ने पार्टी से किनारा किया. फिर कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने भाजपा का दामन थाम लिया. इन दोनों नेताओं के बीजेपी में चले जाने से कांग्रेस की अपने लोगों पर कमजोर पकड़ एजेंडा बन गई. कहा गया कि जब पार्टी अपने नेताओं को ही नहीं संभाल पा रही है, तो बीजेपी और प्रदेश को क्या संभालेगी. कांग्रेस का कमजोर कॉन्फिडेंस पूरे कैंपेन में नजर आया. जहां बीजेपी के नेता लगातार जमीन पर सक्रिय रहे, वहीं कांग्रेस का अभियान बिखरा हुआ नजर आया.
अंत में, फिर से बात सरमा मॉडल और बीजेपी की पकड़ की
असम में बीजेपी की हैट्रिक सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं होगी, ये एक राजनीतिक मॉडल की सफलता है- जिसके केंद्र में हिमंता बिस्वा सरमा जैसे नेता हैं.
एक ऐसा नेता, जो नॉन-आरएसएस बैकग्राउंड से आता है, कांग्रेस से निकलकर बीजेपी में जगह बनाता है, और फिर उसी पार्टी में हिंदुत्व का फायरब्रांड चेहरा बन जाता है. ये अपने आप में एक दिलचस्प राजनीतिक कहानी है.
कांग्रेस के लिए ये सिर्फ हार नहीं, बल्कि चेतावनी है. और बीजेपी के लिए ये संकेत है कि अगर नेतृत्व स्पष्ट हो, रणनीति मल्टीपल लेवल पर हो, और जमीन पर काम दिखे- तो जीत को लगातार दोहराया ही नहीं, तिहराया जा सकता है.
असम की ये कहानी बताती है कि आज की राजनीति में जीत सिर्फ रैलियों और नारों से नहीं मिलती, बल्कि डेटा, डिलीवरी और डिस्कोर्स- तीनों के कॉम्बिनेशन से बनती है.
धीरेंद्र राय