ईरान से चलते हैं... NATO के भीतर एक ‘कोल्ड वॉर’ उबाल पर है

ईरान युद्ध से किनारा करने वाले यूरोपीय देशों पर डोनाल्ड ट्रंप का कोप दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है. चेतावनी, धमकी, और निजी हमले. उनके बयानों और भाषणों में यूरोप को कतई बख्शा नहीं जा रहा है. ट्रंप ने नाटो से हमले की बात कहकर एक ऐसी कॉल्ड वॉर को जन्म दे दिया है, जिसकी दुनिया ने कल्पना नहीं की थी.

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ईरान जंग अभी खत्म भी नहीं हुई है, ट्रंप ने नाटो और यूरोपीय नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. (फोटोः AI generated) ईरान जंग अभी खत्म भी नहीं हुई है, ट्रंप ने नाटो और यूरोपीय नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. (फोटोः AI generated)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 03 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:52 PM IST

ईरान युद्ध अभी चल रहा है. लेकिन एक दूसरी जंग शुरू हो चुकी है. बस, बम-बारूद की ही कमी है. लेकिन असर उससे भी गहरा है. यह जंग अटलांटिक के दोनों किनारों के बीच छिड़ी है. नए ‘कोल्ड वॉर’ के रूप में. एक तरफ अमेरिका. दूसरी तरफ यूरोप. ये इसलिए खास है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से हर दुख-सुख में साथ रहा इनका NATO अलायंस अब दरकने की कगार पर है.

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इस पूरे संकट के केंद्र में हैं डोनाल्ड ट्रंप. उनका गुस्सा अब किसी से छिपा नहीं है. वह खुलकर बोल रहे हैं. बार-बार बोल रहे हैं. उनका आरोप साफ है कि यूरोप ने धोखा दिया है. खासकर ईरान युद्ध में. ट्रंप का कहना है कि जब अमेरिका ने सख्ती दिखाई, तब यूरोप पीछे हट गया. जब अमेरिका ने मोर्चा लिया, तब यूरोप ने बातचीत की बात की. यह फर्क सिर्फ रणनीति का नहीं है. यह भरोसे का टूटना है.

NATO, जो दशकों से पश्चिमी ताकतों की रीढ़ रहा है, अब उसी के भीतर दरार दिख रही है. ट्रंप पहले भी NATO को लेकर सख्त रहे हैं. उन्होंने कहा था “अमेरिका के बिना NATO कुछ भी नहीं.” उन्होंने इसे ‘पेपर टाइगर’ तक कह दिया. अब ईरान युद्ध ने उस बयान को जमीन दे दी है.

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यूरोप की सोच अलग है. यूरोपीय संघ के बड़े देश जर्मनी और फ्रांस शुरू से ही ईरान के साथ बातचीत के पक्ष में रहे. उनका मानना है कि युद्ध से हालात बिगड़ेंगे. तेल बाजार हिलेगा. शरणार्थी संकट बढ़ेगा. सबसे बड़ी बात कि मिडिल ईस्ट और अस्थिर होगा.

फ्रांस के राष्ट्रपति इमेनुएल मेक्रों ने साफ कहा कि “डायलॉग ही रास्ता है.” जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज ने चेतावनी दी कि “एक और युद्ध यूरोप के लिए भारी पड़ेगा.” ये बयान सिर्फ शांति की अपील नहीं हैं. ये अमेरिका की लाइन से दूरी भी दिखाते हैं.

ब्रिटेन की स्थिति सबसे दिलचस्प है. यूनाइटेड किंग्डम परंपरागत रूप से अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी रहा है. लेकिन ये पहली बार था जब किसी युद्ध में उसने अमेरिका के विपरीत लाइन ली. ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने अपने ताजा बयान में साफ-साफ कह दिया “ईरान की जंग हमारी जंग नहीं है. हम वही बात करेंगे, जो यूके के हित में होगी.” इससे पहले ट्रंप कह चुके हैं कि यूके ने उन्हें अपने सैन्य अड्डे देने में आनाकानी की. ये ब्रिटेन चर्चिल वाला ब्रिटेन नहीं रहा.

यह वही अमेरिका और ब्रिटेन हैं, जिनकी जोड़ी को कभी ‘स्पेशल रिलेशनशिप’ का प्रतीक कहा जाता था. आज वही रिश्ता भी दबाव में है. 

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ट्रंप इस दूरी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. उनके बयान अब और तीखे हो गए हैं. उन्होंने कहा कि यूरोप सिर्फ बातें करता है, काम नहीं. उन्होंने यह भी कहा “अमेरिका को अब अपने हित पहले देखने होंगे, चाहे NATO को नुकसान ही क्यों न हो.” यह सिर्फ गुस्सा नहीं है. यह संकेत है. आने वाले टकराव का.

सालभर से चली आ रही है खुन्नस...

ट्रंप का ट्रैक रिकॉर्ड देखें, तो यह टकराव नया नहीं है. ईरान युद्ध ने सिर्फ इसे तेज किया है. इससे पहले भी वे यूरोप से भिड़ चुके हैं.

टैरिफ वॉर: ट्रंप ने यूरोप से आने वाले स्टील और एल्युमिनियम पर भारी टैक्स लगाया. जवाब में यूरोप ने अमेरिकी सामान पर ड्यूटी बढ़ाई. यह आर्थिक जंग थी. दोनों तरफ से चोट की गई. और दोनों तरफ से जवाब आया. सिर्फ टैरिफ ही नहीं, NATO में यूरोपीय देशों की आर्थिक हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए भी उन्होंने खूब दबाव बनाया.

ग्रीनलैंड विवाद: इस कंट्रोवर्सी ने रिश्ते में और जहर घोला. ग्रीनलैंड को खरीदने का ट्रंप का प्रस्ताव पहले किसी मजाक की तरह लगा. लेकिन जब डेनमार्क ने इसे खारिज किया, तो ट्रंप नाराज हो गए. उन्होंने डेनमार्क सहित यूरोप को यह चेतावनी दी कि वे ग्रीनलैंड की डील के बारे में सोचें, वरना वे उस पर कब्जा कर लेंगे. यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं था. यह ताकत दिखाने का तरीका था.

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इंसल्ट पर इंसल्टः ट्रंप कई बार यूरोपीय नेताओं पर निजी टिप्पणी कर चुके हैं. गुरुवार वाले भाषण में ही उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति मेक्रों को लेकर कहा कि उनकी तो पत्नी भी उनसे ठीक से व्यवहार नहीं करती. वे फ्रांस, स्पेन और जर्मनी के नेताओं को न जाने क्या क्या कह चुके हैं. ट्रंप बार बार कहते हैं कि यूरोप अपनी सुरक्षा खुद नहीं संभाल सकता. फ्रांस को तो वे कई बार कह चुके हैं कि यदि दूसरे विश्वयुद्ध में उन्हें अमेरिका बचाने नहीं आता तो आज वे जर्मन बोल रहे होते. यानी, हिटलर की जर्मनी के उपनिवेश होते. ऐसे बयान यूरोप में सीधे-सीधे अपमान की तरह देखे गए.

अब ईरान युद्ध ने इन सभी पुराने जख्मों को फिर से खोल दिया है. बल्कि यूरोपीय नेताओं को हिसाब बराबर करने का मौका दिया. यूरोप का तर्क साफ है. वह कहता है कि अमेरिका जल्दबाजी कर रहा है. वह बिना अंतरराष्ट्रीय सहमति के कदम उठा रहा है. इससे वैश्विक व्यवस्था कमजोर हो रही है.

जबकि ट्रंप का लॉजिक साफ है. वे कहते हैं कि यूरोप कमजोर है. वह फैसले लेने से डरता है. वह सिर्फ बातचीत में समय बर्बाद करता है. यहीं से शुरू होती है नई ‘कोल्ड वॉर’ की कहानी.

कैसा होगा NATO के भीतर का कोल्ड वॉर

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यह जंग खुली नहीं होगी. इसमें टैंक नहीं चलेंगे. लेकिन दबाव होगा. हर स्तर पर दबाव. सबसे पहले आएगा आर्थिक दबाव. ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि यूरोप पर और टैरिफ लगाए जा सकते हैं. खासकर जर्मनी की ऑटो इंडस्ट्री निशाने पर आ सकती है. फ्रांस के लग्जरी ब्रांड्स पर भी असर पड़ सकता है.

दूसरा दबाव होगा सैन्य. अमेरिका NATO में अपनी भूमिका घटा सकता है. ट्रंप तो इस अलायंस से अलग होने की ही धमकी दे चुके हैं. वे कह सकते हैं कि यूरोप अपनी रक्षा खुद करे. इससे यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था हिल जाएगी. क्योंकि दशकों से वह अमेरिकी सिक्योरिटी पर निर्भर रहा है.

तीसरा दबाव होगा पॉलिटिकल और डिप्लोमैटिक. ट्रंप की शैली यही रही है. वह सार्वजनिक मंचों पर यूरोपीय नेताओं को निशाना बना सकते हैं. उन्हें कमजोर दिखा सकते हैं. इससे यूरोप के भीतर भी मतभेद बढ़ सकते हैं. इससे यूरोप का ग्लोबल रसूख कम हो जाएगा.

क्या होगी यूरोप की तैयारी?

लेकिन यह कहानी सिर्फ अमेरिका की नहीं है. यूरोप भी अब बदल रहा है. यूरोप के भीतर यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या उसे अमेरिका पर निर्भर रहना चाहिए? क्या उसे अपनी अलग सुरक्षा नीति बनानी चाहिए? क्या उसे NATO से अलग कोई नया ढांचा बनाना चाहिए?

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फ्रांस लंबे समय से ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ की बात कर रहा है. जर्मनी भी अब रक्षा खर्च बढ़ा रहा है. यूरोप धीरे-धीरे अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. अगर यह प्रक्रिया तेज होती है, तो NATO का भविष्य खतरे में पड़ सकता है. और यही वह पाइंट है, जहां यह ‘कोल्ड वॉर’ सबसे खतरनाक हो जाएगी.

असर ग्लोबल पावर बैलेंस पर

क्योंकि अगर पश्चिमी दुनिया ही बंट गई, तो वैश्विक संतुलन बदल जाएगा. रूस और चीन जैसे देश इसका फायदा उठा सकते हैं. अमेरिका और यूरोप के बीच यह दूरी सिर्फ दो पक्षों का मामला नहीं है. यह पूरी दुनिया पर असर डालने वाली घटना है.

ईरान युद्ध ने इस दूरी को उजागर कर दिया है. अब सवाल यह नहीं है कि क्या दरार है. सवाल यह है कि यह दरार कितनी गहरी होगी. ट्रंप का रवैया साफ है. वह पीछे हटने वाले नहीं हैं. वह इसे अपनी व्यक्तिगत लड़ाई की तरह देख रहे हैं. उनके लिए यह ‘सम्मान’ का सवाल है.

यूरोप भी अब झुकने के मूड में नहीं दिख रहा. वह अपनी नीति पर कायम है. वह युद्ध से दूरी बनाकर रखना चाहता है. यही टकराव आगे बढ़ेगा. अटलांटिक के दोनों किनारों पर खड़े लोग अब एक-दूसरे को शक की नजर से देख रहे हैं. एक समय था, जब ये दोनों एक साथ खड़े होते थे तो दुनिया सहम जाती थी.

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ईरान युद्ध ने सिर्फ एक इलाके को नहीं बदला. इसने दुनियाभर के रिश्तों का ताना-बाना बिगाड़ दिया है. अब दुनिया एक नए दौर में प्रवेश कर रही है. जहां दोस्ती स्थायी नहीं है. और जहां गठबंधन भी भरोसे से ज्यादा हितों पर टिके हैं. ट्रंप के मामले में यह काफी हद तक पर्सनल मामला है. उन्हें अब यूरोप नापसंद है, और आसिम मुनीर फेवरेट.

चलते-चलते...

कहा जा सकता है गोरे लोगों की दुनिया में एक अनकही अंडरस्टैंडिंग है. यूरोप और अमेरिका के बीच जो दूरी आई है, वो ट्रंप के कारण है. यदि ट्रंप हटेंगे तो सब पहले जैसा हो जाएगा. ऐसा हो सकता है. लेकिन, तब तक न जाने क्या-क्या हो जाएगा. ट्रंप ने NATO से हटने के फैसले पर कानूनी मुहर लगा दी तो? ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लिया तो? रूस से यूरोप की अनबन बढ़ी, और मदद के लिए ट्रंप न आए तो? 

इस ‘तो’ का जवाब है- गहरी खाई. NATO के भीतर कोल्ड वॉर के हॉट हो जाने का क्राइसिस.

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