दिवंगत बाल ठाकरे ने जिस मेहनत से महाराष्ट्र में मराठी-मानुष जैसा एक कट्टर और निष्ठावान वोटबैंक तैयार किया था, शुक्रवार को आए महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव नतीजों में देश ने उस वोट बैंक का ठाकरे ब्रांड से मोहभंग होते देखा. BMC के कुछ वार्डों में उद्धव की शिवसेना को दिल रखने वाली मामूली जीत तो मिली. लेकिन, बाकी पूरे प्रदेश में उसका सूपड़ा साफ हो गया. ठाकरे ब्रांड की इस बर्बादी में उद्धव और राज दोनों ने बराबर का योगदान दिया.
बाला साहब ठाकरे की विरासत कम से एक पुश्त और तो चल ही सकता थी. पर अपनी बर्बादी का जिम्मेदार ठाकरे परिवार खुद है. यह पतन अचानक नहीं हुआ, बल्कि पिछले 3 वर्षों में उठाए गए गलत सियासी कदमों का नतीजा है.
बालासाहेब ठाकरे की विरासत संगठन, सड़क की राजनीति और कार्यकर्ता-केंद्रित नेतृत्व पर टिकी थी. लेकिन उनके बाद शिवसेना धीरे-धीरे परिवार-केंद्रित और फिर व्यक्ति केंद्रित पार्टी बनती चली गई. उद्धव ठाकरे ने संगठन को चलाने के बजाय उसे नियंत्रित करने की कोशिश की. पुत्र आदित्य ठाकरे के रूप में तीसरी पीढ़ी को संवारने में लग गए. सत्ता का मद ऐसा चढ़ा कि बीजेपी जैसी सहयोगी पार्टी प्रतिद्वंद्वी नजर आने लगी. आखिर में बाल ठाकरे का बनाया भाजपा से गठबंधन टूटा. और साथ ही हिंदुत्व के एजेंडे को तिलांजलि दे दी गई.
उद्धव जिस राह पर चल रहे थे, पार्टी पीछे छूट गई. संगठन में संवाद की जगह आदेश ले रहे थे. आखिर में वो असहमति पनपी, जिसे वे गद्दारी कहते रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी के साथ उद्धव का गठबंधन केवल राजनीतिक मजबूरी नहीं था, बल्कि यह कुर्सी के मोह के लिए शिवसेना की वैचारिक आत्मा से समझौता था. जाहिर है कि जब आत्मा ही साथ न हो कोई भी सफलता ज्यादा देर तक नहीं टिकती है. मुंबई का शिवसैनिक बाला साहब में छत्रपति शिवाजी को देखता था. मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते कांग्रेस-विरोधी रहा वो खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा. ठाकरे परिवार ने इसे समय रहते या तो समझा नहीं, या फिर वे खुद को खुदा मान बैठे.
बाल ठाकरे ने 1966 में शिवसेना की स्थापना की. मराठी अस्मिता और रोजगार की लड़ाई के साथ हिंदुत्व का अनोखा मिश्रण करके 'मराठी मानुष' तैयार किया. शुरू में मुंबई में दक्षिण भारतीयों और उत्तर भारतीयों के खिलाफ सन ऑफ स्वायल का नारा दिया, जो नकारात्मक राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण था. पर मराठी युवाओं को इस नारे ने एकजुट किया. उन्हें सीधे सत्ता नहीं मिली, लेकिन वे सत्ता के बड़े खिलाड़ी बन चुके थे. बड़ी चतुराई से बाला साहब ने 1980-90 के दशक में राम मंदिर आंदोलन और बाबरी विध्वंस के बाद हिंदुत्व को मजबूती से अपना लिया. 'हिंदू हूं, हिंदू रहूंगा' का नारा देकर बहुत जल्दी ही वह हिंदू हृदय सम्राट बन गए. बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भी.
इसी मिश्रण ने शिवसेना और ठाकरे ब्रांड को मुंबई ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र में मजबूत बनाया. मराठी गौरव के साथ हिंदू राष्ट्रवाद का संयोजन ठाकरे परिवार की राजनीतिक पहचान बन गया. मातोश्री सिर्फ एक मकान का नाम नहीं था, वो फायर ब्रांड हिंदुत्व का हेडक्वार्टर था. जिसमें सिर्फ वैचारिक ही नहीं, महाराष्ट्र और देश की सत्ता के ताने-बाने तय होते. दुनिया का सबसे मशहूर सितारा माइकल जैक्सन भारत आया तो सबसे पहले मत्था ठेकने मुंबई में मातोश्री ही पहुंचा. ठाकरे ब्रांड में भावनात्मकता और आक्रामकता दोनों थी. जिसने लाखों शिव सैनिकों में जोश भरा.
बाल ठाकरे कभी मुख्यमंत्री नहीं बने, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखा. 1995 में बीजेपी से गठबंधन कर पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार बनवाई. उनकी करिश्माई छवि, डर और सम्मान का मिश्रण उन्हें किंगमेकर बनाता था. उनके एक इशारे पर मुंबई ठप हो जाती थी. पर उन्हें बाल ठाकरे की विरासत की लड़ाई उनके जीते जी ही सामने आ गई. यह बहस होती रहेगी कि बाला साहब को किसे अपना उत्तराधिकारी चुनना चाहिए था- बेटे उद्धव या भतीजे राज को. क्योंकि बाला साहेब राज को भी पुत्रवत ही मानते थे. उद्धव ठाकरे के मुकाबले राजनीति के हर गुण में वो ज्यादा पारंगत थे. जब बाला साहेब ने शिवसेना की कमान तो उद्धव को सौंपी तो राज ने अलग राह पकड़ ली. फिर वे महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) बनाकर जनता के बीच आए. ये और बात रही कि भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधनों के बीच उनके लिए कोई जगह नहीं बन पाई.
2019 के महाराष्ट्र चुनाव नतीजों के बाद उद्धव ठाकरे के मन में सीएम बनने की चाह हुई. और फिर उसके बाद लिखी जाने लगी एक मजबूत विरासत की बर्बादी की कहानी. 2022 में एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी. 40 से अधिक विधायकों के साथ शिंदे उद्धव सरकार गिराकर खुद सीएम बन बैठे. उद्धव ठाकरे वही स्वाद चख रहे थे, जो उन्होंने तीन साल पहले भाजपा को चखाया था. हां, इस बार उन्हें जो कुछ परोसा जा रहा था, उसे रसोई में तैयार भाजपा ही कर रही थी.
एकनाथ शिंदे ने बहुत खूबी से शिवसैनिकों के असंतोष को भुनाया, जो बाल ठाकरे के हिंदुत्व छोड़कर 'सेकुलर' राह पर चलने से दुखी थे. राम मंदिर पर चुप्पी, बीजेपी से ब्रेकअप ने पारंपरिक हिंदू-मराठी वोटरों को नाराज किया. उन्हें शिंदे गुट ने शांत किया, ये कहकर अब वे ही असली हिंदुत्ववादी शिवसेना हैं.
मराठी मानुष पर लगाया गया आखिरी दांव ठाकरे बंधुओं के लिए ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ. 2026 बीएमसी चुनाव में उद्धव और राज ठाकरे 20 साल बाद साथ आए. लेकिन, सब जान रहे थे कि यह मराठी अस्मिता नहीं, सियासी अस्तित्व बचाने की छटपटाहट है. मराठी प्राइड के नाम पर फिर दोनों भाइयों ने जो किया, जो कहा वो मुंबईकरों को पचा नहीं. महाराष्ट्र की तो छोड़ ही दीजिये. कांग्रेस ने भी अलग चुनाव लड़ा. कुलमिलाकर, ठाकरे बंधुओं के पास हिंदुत्व पहले से नहीं था, 'सेकुलरिज्म' भी बंट गया.
2026 के महाराष्ट्र नगरीय निकाय चुनाव में ठाकरे बंधुओं की सारी राजनीति मुंबई के 70 मराठी बहुल वार्डों पर आकर अटक गई. और यही उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी राजनीतिक अपरिपक्वता थी. उद्धव ठाकरे की राजनीतिक इम्युनिटी इतनी कमजोर थी कि राज ठाकरे नामक गोली के सेवन ने उन्हें इनफेक्टेड कर दिया. उद्धव की शिवसेना की करीब 3000 वार्डों में से महज 300 पर ही जीत मिली है. जबकि उनके भाई राज तो 13 पर ही अटके पड़े हैं. कौन विश्वास करेगा कि महाराष्ट्र की सियासत में बाल ठाकरे जैसा एक शेर दहाड़ता था, वहां उनकी अगली पीढ़ी कहीं की नहीं रही. BMC पर शिवसेना के 25 साल पुराने वर्चस्व का अंत हुआ. राजनीति में हार-जीत होती रहती है, लेकिन ठाकरे जैसे ब्रांड की दुर्गति लंबे अंधकार का अंदेशा लगती है. और दुर्भाग्य यह है कि इसके लिए कोई भी सहानुभूति का पात्र नहीं है.
संयम श्रीवास्तव