भारत की राजनीति में 6 हफ्ते का वक्त बहुत लंबा हो सकता है. इसी साल 10 फरवरी को कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के खिलाफ गुस्से में एक ट्वीट किया था. यह ट्वीट सरमा के एक विवादास्पद वीडियो के सामने आने के बाद आया था, जिसमें उन्हें मुस्लिम वेशभूषा वाले एक व्यक्ति पर निशाना साधते हुए दिखाया गया था.
वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने टिप्पणी करते हुए कहा था, 'शर्म आनी चाहिए आपको HBS. हमने पहले कभी किसी राजनेता का ऐसा कट्टर पुनर्जन्म नहीं देखा, जिसने अकेले ही असम के गौरवशाली सामाजिक ताने-बाने को इतनी गहरी चोट पहुंचाई और उसे तहस-नहस कर दिया हो.'
18 मार्च को, वही बोरदोलोई मुस्कुराते हुए सरमा के बगल में खड़े थे, उनके गले में भाजपा का पटका और सिर पर टोपी थी. अब उसी पार्टी द्वारा एक 'सम्मानित कार्यकर्ता' के रूप में उनका स्वागत किया जा रहा था, जिस पर असम इकाई ने अगस्त 2025 में असम में अब तक के सबसे भ्रष्ट, जोड़-तोड़ करने वाले सत्ता दलालों में से एक होने का आरोप लगाया था.
मृदुभाषी बोरदोलोई ने उसी पटकथा का पालन किया है जो इतनी परिचित है कि अब शायद ही किसी को आश्चर्यचकित करती है. चुनाव से पहले दलबदल अब कोई विसंगति नहीं रह गई है. यह एक ऐसे राजनीतिक जगत में नया सामान्य चलन है, जहां एकमात्र 'वाद' अवसरवाद ही रह गया है.
कांग्रेस से नाराज होकर सरमा ने थामा था बीजेपी का हाथ
असम का राजनीतिक परिदृश्य इसका एक उदाहरण है. असम भाजपा के मौजूदा नेतृत्व का सबसे प्रमुख चेहरा माने जाने वाले मुख्यमंत्री सरमा, कांग्रेस में अपने करियर के शुरुआती दौर से ऊपर उठे थे, लेकिन बाद में उन्होंने पाला बदलकर एक नया सफर तय किया. बेहद महत्वाकांक्षी सरमा ने दावा किया था कि उन्होंने कांग्रेस इसलिए छोड़ी क्योंकि राहुल गांधी ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया था और उन्हें वो बिस्कुट दिए थे जो वो अपने पालतू कुत्ते को खिला रहे थे.
अच्छी तरह से गढ़ी गई कहानी इस तथ्य को छिपा नहीं सकी कि सरमा भावी मुख्यमंत्री बनने के लिए बेताब थे. तब से, जो एक व्यक्तिगत निर्णय के रूप में शुरू हुआ था, वह एक निरंतर प्रक्रिया में तब्दील हो गया है. एक के बाद एक निर्वाचन क्षेत्रों में, भाजपा का बढ़ता प्रभाव केवल चुनावी जीत का परिणाम नहीं है, यह कांग्रेस नेताओं के लगातार और चुपचाप समर्थन पर आधारित है. असम में भाजपा के एक-तिहाई चेहरे ऐसे हैं, जो अतीत में कांग्रेस के चुनाव चिन्ह पर मैदान में उतरे थे.
यही वजह है कि अब एक मौजूं सवाल पूछने का समय आ गया है, क्या "कांग्रेस-मुक्त भारत" का नारा चुपचाप "कांग्रेस-युक्त भाजपा" में बदल गया है, और वह भी न केवल असम में बल्कि पूरे भारत में?
आंकड़े बताते हैं कि यह बात महज एक राजनीतिक जुमलेबाजी नहीं है. 2024 के आम चुनावों में, भाजपा के सौ से अधिक उम्मीदवार दलबदलू थे, जिनमें मुख्य रूप से कांग्रेस से आए नेता शामिल थे. पिछले एक दशक में, 200 से अधिक विधायक और सांसद मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा में शामिल हुए हैं, जिनमें से लगभग चालीस प्रतिशत दलबदलू कांग्रेस के थे. हम जो देख रहे हैं, वह केवल एक पार्टी का पतन और दूसरी का उदय नहीं है. यह उससे कहीं अधिक गहरा है.
एक पूरे राजनीतिक इकोसिस्टम का समावेश. भाजपा अब केवल कांग्रेस को विस्थापित नहीं कर रही है, बल्कि कई मायनों में वह उसकी विरासत को अपना रही है. इसके नेताओं को, इसके नेटवर्क को, और यहां तक कि इसके सामाजिक आधार के कुछ हिस्सों को भी.
यह विचारधारा को लेकर एक असहज करने वाला सवाल खड़ा करता है. दशकों तक, भारतीय राजनीति स्पष्ट भले ही कभी-कभी बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई, वैचारिक विभाजनों के इर्द-गिर्द सिमटी रही. कांग्रेस ने खुद को धर्मनिरपेक्ष और मध्यमार्गी के रूप में पेश किया. तो भाजपा ने एक विशिष्ट सांस्कृतिक दृष्टिकोण के साथ राष्ट्रवादी के रूप में, फिर भी, आज की इस उथल-पुथल में, ये सीमाएं बेहद लचीली नजर आती हैं. जो नेता कभी भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ चेतावनी देते थे, वे अब उतनी ही शिद्दत से उसका बचाव करते हैं. चुनावी घोषणापत्र अब प्रतिबद्धताओं के बजाय 'पोशाक' की तरह लगते हैं, जिन्हें आसानी से बदला जा सकता है और जो शायद ही कभी बाध्यकारी होते हैं.
क्या इसका मतलब यह है कि विचारधारा खत्म हो गई है?
पूरी तरह से नहीं. लेकिन इसका मतलब यह जरूर है कि विचारधारा का दर्जा घटा दिया गया है. सत्ता और संपत्ति अब राजनीति का प्राथमिक संगठनात्मक सिद्धांत बन गई है. एक ऐसी व्यवस्था में जहां चुनावी सफलता तेजी से एक ही जगह केंद्रित हो रही है, वहां इसके कारण स्पष्ट हैं. प्रभावी ताकत के साथ जुड़ें और प्रासंगिक बने रहें, या फिर राजनीतिक गुमनामी का जोखिम उठाएं.
लेकिन यह केवल अवसरवादिता का मामला नहीं है, यह पार्टी संरचनाओं का मामला है. सत्ताधारी दल और विपक्ष के बीच शक्ति की असमानता और गहरी हो गई है. फंडिंग तक पहुंच, मीडिया में विज़िबिलिटी और संगठनात्मक ताकत अब भारी रूप से एक तरफ झुकी हुई है. इस बीच, दलबदल विरोधी कानून राजनीतिक चतुराई के साथ तालमेल बिठाने के लिए संघर्ष कर रहा है.
अस्थिरता को रोकने के लिए बनाए गए इस कानून को 'सुनियोजित विभाजन' और 'विलय' के माध्यम से बार-बार दरकिनार किया गया है. मतदाताओं के जनादेश की रक्षा के लिए बनाया गया यह कानून अब अक्सर उसके उल्लंघन को वैधता प्रदान करता है.
कांग्रेस का संगठनात्मक पतन
राजनीतिक व्यवहार में इस नैतिक संकट को और भी गहरा कर रहा है कांग्रेस का संगठनात्मक पतन. भारतीय राजनीति का कभी मुख्य धुरी रही यह पार्टी, अब प्रमुख राज्यों में नेतृत्व को बनाए रखने या नया नेतृत्व तैयार करने में खुद को असमर्थ पा रही है. इसके कई नेताओं के लिए, पार्टी अब सत्ता तक पहुंचने का कोई विश्वसनीय मार्ग नहीं रह गई है. इस लिहाज से, दलबदल अब एक 'धोखा' कम और एक 'नफा-नुकसान का गणित' ज्यादा बन गया है.
भारत की दलीय व्यवस्था पर इसके दूरगामी परिणाम होंगे. हम एक प्रतिस्पर्धी बहु-दलीय ढांचे से हटकर एक ऐसी प्रभावी-दलीय व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जिसकी सीमाएं बेहद धुंधली हैं. भाजपा का यह विस्तार केवल चुनावी नहीं है, बल्कि यह समावेशी है. यह राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए एकमात्र ठिकाना बनती जा रही है.
मतदाताओं के लिए, यह एक लोकतांत्रिक धर्मसंकट पैदा करता है. जब एक पार्टी के टिकट पर चुना गया प्रतिनिधि पाला बदल लेता है, तो जनादेश प्रभावी रूप से बिना सहमति के स्थानांतरित हो जाता है. मतदाता की पसंद कमजोर, यहां तक कि शून्य हो जाती है. और फिर भी, यह कहानी पूरी तरह से मतदाता की बेबसी की नहीं है. कई मामलों में दलबदलू फिर से चुन लिए जाते हैं. जो दर्शाता है कि मतदाता वैचारिक स्थिरता की तुलना में सत्ता के निकट रहने को प्राथमिकता देने को तैयार हैं. विकास, पहुंच और प्रभाव का वादा अक्सर राजनीतिक निष्ठा संबंधी चिंताओं पर भारी पड़ता है.
एक ओर निराशावाद और दूसरी ओर व्यावहारिकता, यही द्वंद्व हमारे वर्तमान समय की पहचान है. तो फिर क्या किया जा सकता है?
एक संभावित सुधार प्रोत्साहन संरचना में बदलाव करना है यदि एक निर्वाचित प्रतिनिधि को यह पता हो कि पाला बदलने से उसे तुरंत पद नहीं मिलेगा, तो उसका गणित बदल सकता है. एक ऐसा नियम, जो दलबदलुओं को एक निश्चित अवधि मान लीजिए, पांच साल तक मंत्री पद धारण करने से रोकता हो, एक निवारक के रूप में काम कर सकता है. यह दलबदल को पूरी तरह खत्म तो नहीं करेगा, लेकिन इसके सबसे तात्कालिक 'इनाम' को जरूर छीन लेगा.
साथ ही, दलबदल विरोधी ढांचे को तत्काल और कड़ा करने की आवश्यकता है. उन खामियों को दूर किया जाना चाहिए जो 'विभाजन' की आड़ में सामूहिक दलबदल की अनुमति देती हैं. इस प्रक्रिया के फैसले को पक्षपातपूर्ण नियंत्रण से मुक्त किया जाना चाहिए, और शायद इसे अध्यक्ष के बजाय किसी स्वतंत्र प्राधिकरण को सौंपा जाना चाहिए.
कैसे बीजेपी बनी चुनावी मशीन
लेकिन अंततः, कोई भी कानूनी सुधार राजनीतिक पुनरुद्धार का विकल्प नहीं हो सकता. जब तक विपक्ष बिखरा हुआ और संगठनात्मक रूप से कमजोर रहेगा, तब तक दलबदल का आकर्षण बना रहेगा. इसका समाधान राजनीतिक व्यवहार को नियंत्रित करने के साथ-साथ एक भरोसेमंद विकल्प खड़ा करने में भी निहित है. यह हमें वापस असम और व्यापक रूप से पूरे भारत की ओर ले आता है.
भाजपा का उदय निःसंदेह राजनीतिक सफलता की कहानी है, लेकिन यह उस पार्टी के राजनीतिक विलय की भी कहानी है जिसने कभी खुद को 'एक अलग पार्टी' होने का गौरव दिया था. मोदी-शाह युग में, भाजपा अब एक शक्तिशाली चुनावी मशीन बन गई है, जो उन सभी के लिए स्वाभाविक ठिकाना है जो बहुत कम समय में सत्ता और संसाधनों तक पहुंच बनाना चाहते हैं.
ऐसी व्यवस्था में, लोकतंत्र के एकतरफा रास्ता बनने का जोखिम पैदा हो जाता है. मतदाता अपना वोट तो डालते हैं, लेकिन राजनीतिक वर्ग अपनी मर्जी से पाला बदलने की आजादी सुरक्षित रखता है और इसी शांत, लगभग अनचाहे बदलाव में, 'जनादेश' के अपने मायने ही बदलने लगते हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. उनसे rajdeepsardesai52@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)
राजदीप सरदेसाई