कर्नाटक की बानू मुश्ताक कौन हैं? जिनके लघु कहानी संग्रह हार्ट लैंप को मिला अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार

77 वर्षीय कन्नड़ लेखिका, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता बानू मुश्ताक ने अपनी लघु कहानी संग्रह हृदय दीप (Heart Lamp) के लिए प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया. वह पहली कन्नड़ लेखिका बन गई हैं जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ है. संग्रह में 12 कहानियां शामिल हैं, जो 1990 से 2023 तक कर्नाटक की मुस्लिम महिलाओं के रोजमर्रा के संघर्षों को दर्शाती हैं.

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अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार विजेता कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार विजेता कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 21 मई 2025,
  • अपडेटेड 7:39 PM IST

कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक ने प्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया, जिसके बाद कर्नाटक के हासन में खुशी की लहर है. उनके बेटे ताहिर मुश्ताक ने इस उपलब्धि पर गर्व और खुशी जताते हुए इसे 'ऐतिहासिक और बेहद खुशी' का मौका बताया. 

अपने घर से बात करते हुए ताहिर ने कहा कि परिवार पूरी रात जागकर लंदन से पुरस्कार की घोषणा का लाइव प्रसारण देख रहा था. उन्होंने बताया, “जब बानू का नाम घोषित हुआ, हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा. यह न केवल पहला कन्नड़ साहित्य है जिसने बुकर जीता, बल्कि यह पहला लघु कहानी संग्रह भी है जिसे यह सम्मान मिला.”

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इस किताब के लिए मिला पुरस्कार
यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि प्रतियोगिता में डेनमार्क, फ्रांस और जापान जैसे देशों की रचनाएं भी शामिल थीं. ताहिर ने कहा, “हम समीक्षाओं पर नजर रखे हुए थे और नतीजे का अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहे थे, जब घोषणा हुई, हम भावुक हो गए.” ताहिर ने जीत के बाद बानू से संक्षिप्त बात की और जल्द ही इस उपलब्धि को व्यक्तिगत रूप से उत्सव के साथ मनाने की उम्मीद जताई.

बता दें कि 77 वर्षीय कन्नड़ लेखिका, वकील और सामाजिक कार्यकर्ता बानू मुश्ताक ने अपनी लघु कहानी संग्रह हृदय दीप (Heart Lamp) के लिए प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीतकर इतिहास रच दिया. वह पहली कन्नड़ लेखिका बन गई हैं जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ है. संग्रह में 12 कहानियां शामिल हैं, जो 1990 से 2023 तक कर्नाटक की मुस्लिम महिलाओं के रोजमर्रा के संघर्षों को दर्शाती हैं.

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बानू ने इस सम्मान को अपनी कहानियों में दर्ज महिलाओं की आवाज को समर्पित करते हुए कहा, “यह सिर्फ मेरी जीत नहीं है, बल्कि उन अनसुनी आवाजों का समवेत स्वर है जो अक्सर दबा दिया जाता है.”

बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक (बाएं) साथ में हैं उनकी किताब की अंग्रेजी अनुवाद दीपा भास्ती

इस संग्रह का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाली दीपा भास्ती को भी बानू के साथ अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस उपलब्धि के साथ, बानू अब उन चुनिंदा भारतीय लेखकों की सूची में शामिल हो गई हैं जिन्होंने 1969 में इस पुरस्कार की शुरुआत के बाद से इसे जीता है, जिसमें वी.एस. नायपॉल, सलमान रुश्दी, अरुंधति रॉय, किरण देसाई, अरविंद अडिगा और गीतांजलि श्री शामिल हैं.

कौन हैं बानू मुश्ताक?
कर्नाटक के हासन से ताल्लुक रखने वाली बानू ने मिडिल स्कूल में अपनी पहली लघु कहानी लिखी थी. 26 साल की उम्र में उनकी पहली कहानी लोकप्रिय कन्नड़ पत्रिका प्रजामाता में प्रकाशित हुई, जिसने साहित्य जगत में उनकी धमाकेदार शुरुआत को चिह्नित किया.

दलित आंदोलन-किसान आंदोलनों से प्रेरित कहानी
बुकर पुरस्कार मंच पर उनके प्रोफाइल के अनुसार, बानू ने छह लघु कहानी संग्रह, एक उपन्यास, एक निबंध संग्रह और एक कविता संग्रह लिखा है. बुकर पुरस्कार फाउंडेशन को दिए एक साक्षात्कार में बानू ने बताया कि उनकी प्रेरणा सत्तर के दशक में कर्नाटक में दलित आंदोलन, किसान आंदोलन, भाषा आंदोलन, महिलाओं के संघर्ष और पर्यावरण सक्रियता से मिली.

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उन्होंने कहा, “हाशिए पर पड़े समुदायों, महिलाओं और उपेक्षित लोगों के जीवन से मेरी सीधी बातचीत और उनके भावों ने मुझे लिखने की ताकत दी. कुल मिलाकर, कर्नाटक की सामाजिक परिस्थितियों ने मुझे गढ़ा.” जब उनके लेखन के बारे में पूछा गया, तो बानू ने फाउंडेशन को बताया कि वह “विस्तृत शोध” नहीं करतीं, बल्कि वास्तविक जीवन की बातचीत से प्रेरणा लेती हैं. उन्होंने कहा, “मेरा दिल ही मेरा अध्ययन का क्षेत्र है.”

महिलाओं के अधिकारों की प्रबल समर्थक बानू, उन महिलाओं की कहानियों से प्रेरित और प्रभावित हुईं जो मदद के लिए उनके पास आईं. उन्होंने धार्मिक और जातिगत उत्पीड़न के खिलाफ भी अपनी आवाज बुलंद की है.

 

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