शौहर की मनाही, AIR लखनऊ के डायरेक्टर ने की गुप्त रिकॉर्डिंग... 8 साल बाद ऐसे हुआ था बेगम अख़्तर का कमबैक

बेगम अख़्तर की जि‍ंदगी में वो एक दौर भी आया जब शादी के बाद उनके शौहर ने गाना ही मना कर दिया. सुरों की मलिका अचानक खामोश हो गईं. पूरे आठ सालों के लिए, मगर किस्मत ने उनके लिए एक और रास्ता चुनकर रखा था. लखनऊ AIR के डायरेक्टर ने उनकी आवाज को चुपके से र‍िकॉर्ड किया और वो गजल बन गई यादगार...

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यतींद्र मिश्रा ने सुनाई बेगम अख़्तर की चोरी से रिकॉर्ड की गई कमबैक कहानी (Photo Credits: Chandradeep Kumar) यतींद्र मिश्रा ने सुनाई बेगम अख़्तर की चोरी से रिकॉर्ड की गई कमबैक कहानी (Photo Credits: Chandradeep Kumar)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 21 नवंबर 2025,
  • अपडेटेड 10:13 PM IST

बेगम अख़्तर ने शादी की भी इसलिए कि दुनिया चाहे न चाहे कोई एक आवाज तो हो जो उन्हें इज्जत दे सके. उन्होंने शादी तो की लेकिन संगीत का साथ छोड़ना पड़ा, पति के घर में संगीत से सात-आठ साल संगीत से नाता टूटा रहा, फिर एक दिन ऑल इंड‍िया रेड‍ियो के तत्कालीन डायरेक्टर ने उनकी संगीत में दोबारा वापसी कराई. साह‍ित्य आजतक के मंच पर लेखक यतींद्र मिश्रा ने वो किस्सा कुछ यूं साझा किया. 

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कहीं वो खफा न हो जाएं...

बेगम अख्तर...यानी अख्तरी भाई फैजाबादी के भीतर एलीट क्लास में जाने की और शूरफा (श्रेष्ठ) कहलाने की इतनी ज्यादा हसरत थी कि उन्होंने सारी शर्तें मान लीं. गाना छोड़ दिया, लेकिन इससे उनका नर्वस ब्रेकडाउन हो गया. सात-आठ साल उन्होंने कुछ नहीं गाया और जब अब्बासी साहब (उनके पति इश्तियाक़ अहमद अब्बासी)चले जाएं हाई कोर्ट तब धीरे से बाजा पेटी निकालें. उसको पोछें, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ती थी कि हारमोनियम से एक सुर न‍िकाल दें क्योंकि अगर मौसीकी यानी म्यूजिक की आवाज भी बैरिस्टर के घर में गूंज गई तो कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाए और वो खफा ना हो जाए. 

बेगम अख्तर का ये किस्सा बताते हुए यतींद्र मिश्रा बताते हैं कि इस बात को वहां पर मौजूद लखनऊ रेडियो स्टेशन के डायरेक्टर थे एलके मल्होत्रा, उन्होंने पकड़ लिया कि बेगम अख्तर के साथ सही नहीं है. और, एक दिन डिनर पे पहुंचे तो बेगम अख्तर के यहां गज़लें गाई जा रही थीं. एक कलाकार को गाना गाने के लिए मना कर दिया जाए और उसके घर में दूसरे लोग गज़ल गाएं और वो गा ना सके.  ...तो वो बहुत दुखी थीं. एल के मल्होत्रा ने कहा,  'कल आप रेडियो स्टेशन आएं.' उन्होंने कहा-

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'मैं क्यों आऊंगी और मैंने तो गाना छोड़ दिया मल्होत्रा साहब.'  इस पर मल्होत्रा साहब बोले,

'आप आइए, हम लोग बैठेंगे गुफ्तगू करेंगे, आप बहुत दिनों से नहीं आईं.'  

उधर, मल्होत्रा साहब ने प्लानिंग कर रखी थी कि बेगम को दोबारा से गवाना शुरू कराएंगे. उन्होंने सारी रिकॉर्डिंग की व्यवस्था कर ली. 

यतींद्र कहते हैं कि ये बड़ी ऐतिहासिक घटना है बेगम अख्तर के जीवन में. जब सारी रिकॉर्डिंग की तैयारी हो गई, सारे साजिंदे बिठा दिए गए. बता दिया गया कि रिकॉर्ड तो करना है लेकिन बेगम साहिब को पता न चले. फिर उनका गाना चोरी से रिकॉर्ड किया गया. जब बेगम अख्तर के पास पहुंचे तो उन्होंने कहा कि आप कुछ गाएं. 

यह भी पढ़ें: वफादारी, "दर्द, वफादारी, नफ़ासत और सुकून… यतींद्र के किस्सों और माल‍िनी के सुरों की संगत में गूंजे बेगम अख़्तर के फ़साने

बेगम अख्तर बोलीं, मेरी तो आवाज निकलना ही बंद हो चुकी है. 

वो बोले- आप कुछ भी गाइए, हम अपने लिए सुनना चाहते हैं. बेगम अख्तर ने पूछा कि कोई सुन तो नहीं रहा है. लेकिन रिकॉर्डिंग का पूरा कमरा पैक किया गया था और मल्होत्रा ने कहा मैं बैठा हूं, कोई नहीं है आप गाओ, मैं अपनी खुशी के लिए आपको सुनना चाहता हूं. यहां कुछ भी नहीं रिकॉर्ड होगा. माइक वगैरह सब छुपाया गया था. 

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जब गाना गा चुकीं तो मल्होत्रा साहब उनको ले गए कि आइए आपको चाय पीना है और चाय पीने के बाद उनको गाना सुनाया गया. 
उन्होंने कहा, 'ये आपकी आवाज़ है बेगम साह‍िबा' 

वो अचानक से उठी, रोने लगी और इतना कह के स्टूडियो से भागीं, 'हाय अल्लाह, कोई देखेगा तो क्या करेगा.' 

...और वो गज़ल वो दादरा, उनके जीवन का कमबैक सॉन्ग बन गया. यतींद्र कहते हैं कि भारतीय संगीत जगत को केएल मल्होत्रा का शुक्रगुज़ार होना चाहिए. जिन्होंने बेगम अख्तर का दोबारा से परिचय कराया, हम सब के बीच में लेकर के आए, वो बहुत ही सुंदर बंदिश है जिसे आप सुनेंगे तो आप को-रिलेट करेंगे कि किस दर्द में डूबकर बेगम अख्तर ने गाया होगा और तमाम सारी ऐसी गायिकाएं जो कहीं निकाह में, कहीं विवाह के बंधन में परिवार चलाने के लिए, इज्जत के लिए घूंघट करने के नाम पे तमाम तमाम तरीकों से दबाई गईं.  

लेकिन जब उनकी ताकत उभरी तो जमाना उन्हें रोक नहीं पाया. इस पर मालिनी अवस्थी ने कहा कि कई बार दबाया नहीं जाता औरत खुद दब जाती है गृहस्थी के बोझ में, रिश्तों के बोझ में. कोई कहता नहीं औरत खुद दब जाती है. जब इस वाक्य का कभी भी जिक्र करते हैं तो मुझे अपनी ज़िन्दगी याद आती है कि जब दोनों बच्चे हो गए और उसके बाद गाने के लिए मेरी अपनी बड़ी बहन ने मुझसे कहा कि कुछ सुनाओ तो मैं गाने के बजाय फूट के रो पड़ी. आज शायद डिप्रेशन बोलेंगे उसको लेकिन वो वापसी का गाना या किसी जीत की तरह से इस गाने को देखना चाहिए. 

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