'हाथ कांप रहे थे, पर बेटे की तड़प नहीं देखी गई...', इच्छा मृत्यु पर बोले हरीश के पिता- 13 साल का पत्थर अब पिघलेगा!

गाजियाबाद के हरीश राणा पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े हैं. सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और परिवार की गुहार सुनने के बाद उन्हें पैसिव यूथेनेसिया यानी इच्छा मृत्यु की अनुमति दी है. अदालत ने निर्देश दिया है कि उन्हें एम्स के पैलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती कर इलाज धीरे-धीरे वापस लिया जाए ताकि पूरी प्रक्रिया गरिमा के साथ पूरी हो सके.

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हरीश राणा के पिता आशोक राणा (Photo: ITG) हरीश राणा के पिता आशोक राणा (Photo: ITG)

मयंक गौड़

  • गाजियाबाद ,
  • 11 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 7:39 PM IST

गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन इलाके में रहने वाले राणा परिवार के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला बेहद भावुक और कठिन पल लेकर आया. करीब 13 साल से अचेत अवस्था में बिस्तर पर पड़े हरीश राणा को देश की सर्वोच्च अदालत ने पैसिव यूथेनेसिया यानी इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी है. सुप्रीम कोर्ट ने इस संवेदनशील मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि हरीश राणा को एम्स के पैलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती कराया जाएगा. वहां डॉक्टरों की निगरानी में मेडिकल ट्रीटमेंट को धीरे-धीरे वापस लेने की प्रक्रिया अपनाई जाएगी. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया गरिमा और मानवीय संवेदनाओं के साथ पूरी की जाएगी.

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस मामले को बेहद गंभीर और संवेदनशील बताया. अदालत ने हरीश के परिवार के सदस्यों से भी बातचीत की. परिवार ने अदालत को बताया कि हरीश अब 100 फीसदी दिव्यांग हो चुके हैं और उनके ठीक होने की उम्मीद लगभग खत्म हो चुकी है.

सुप्रीम कोर्ट ने दी पैसिव यूथेनेसिया यानी इच्छा मृत्यु की अनुमति

परिवार ने यह भी बताया कि पिछले 13 वर्षों से हरीश केवल मशीनों और लगातार देखभाल के सहारे जीवन जी रहे हैं. इतने लंबे समय से अचेत अवस्था में रहने के कारण उनकी स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है. एम्स की मेडिकल टीम ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं बची है. मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार लंबे समय तक अचेत अवस्था में रहने और लगातार बिस्तर पर पड़े रहने की वजह से उनके शरीर पर कई गंभीर घाव बन चुके हैं.

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सुनवाई के दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने इस मामले को बेहद दुखद बताया. उन्होंने कहा कि अदालत के लिए ऐसा फैसला लेना आसान नहीं होता. लेकिन जब किसी व्यक्ति के ठीक होने की कोई संभावना नहीं बचती और वह लगातार पीड़ा में रहता है, तब स्थिति बेहद जटिल हो जाती है.

मेडिकल रिपोर्ट में ठीक होने की उम्मीद पूरी तरह खत्म

जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि किसी व्यक्ति को अनंत पीड़ा में रखना भी उचित नहीं माना जा सकता. अदालत अब उस स्थिति में है जहां अंतिम निर्णय लेना आवश्यक हो गया है. दरअसल हरीश राणा साल 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे थे. उसी दौरान एक हादसा हुआ जिसने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी. हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उनके सिर में गंभीर चोट लग गई थी.

इस हादसे के बाद से ही हरीश अचेत अवस्था में हैं. पिछले 13 सालों से वह बिस्तर पर ही पड़े हुए हैं और उन्हें लगातार देखभाल और चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़ती रही है. हरीश के माता-पिता अशोक राणा और उनकी पत्नी ने इन वर्षों में अपने बेटे के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किया. उन्होंने अलग-अलग अस्पतालों में इलाज कराया और बेटे को ठीक करने की उम्मीद कभी नहीं छोड़ी.

लेकिन समय के साथ जब डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि हरीश के ठीक होने की संभावना लगभग खत्म हो चुकी है, तब परिवार के सामने एक बेहद कठिन फैसला खड़ा हो गया. भारी मन से माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने बेटे के लिए पैसिव यूथेनेसिया की अनुमति मांगी. यह फैसला उनके लिए बेहद पीड़ादायक था, लेकिन वे बेटे की लंबी पीड़ा को देखते हुए इस निर्णय तक पहुंचे.

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जस्टिस जे.बी. पारदीवाला बोले, ऐसा फैसला लेना आसान नहीं

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हरीश के पिता अशोक राणा भावुक हो गए. उन्होंने अदालत का धन्यवाद किया, लेकिन बेटे की स्थिति को याद कर उनकी आंखें नम हो गईं. करीब 13 सालों से बेटे की सेवा और देखभाल में लगे माता-पिता के लिए यह फैसला एक तरफ बेहद दर्द भरा है, तो दूसरी तरफ एक तरह की राहत भी लेकर आया है.

गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन इलाके में स्थित राज एंपायर सोसाइटी में रहने वाले राणा परिवार के पड़ोसियों का भी कहना है कि परिवार पिछले कई वर्षों से बेहद कठिन दौर से गुजर रहा था. सोसाइटी के लोगों के अनुसार पूरा परिवार दिन-रात हरीश की सेवा में लगा रहता था. उनके माता-पिता ने कभी भी बेटे की देखभाल में कोई कमी नहीं आने दी.

हरीश के छोटे भाई और बहन भी लगातार उनकी देखभाल में परिवार का साथ देते रहे. पूरे परिवार ने मिलकर इतने वर्षों तक हरीश की सेवा की. पड़ोसियों का कहना है कि परिवार ने इलाज और देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन जब डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि अब सुधार की कोई उम्मीद नहीं बची है, तब परिवार पूरी तरह टूट चुका था.

13 साल तक बेटे की सेवा में लगे रहे माता-पिता और परिवार

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जहां परिवार बेहद भावुक है, वहीं सोसाइटी के लोग भी इस कठिन घड़ी में राणा परिवार के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं. सोसाइटी के कई लोगों ने कहा कि उन्होंने इतने वर्षों तक परिवार को संघर्ष करते देखा है. ऐसे में यह फैसला जितना कठिन है, उतना ही भावनात्मक भी है.

यह मामला एक बार फिर उस संवेदनशील सवाल को सामने लाता है कि जब किसी व्यक्ति के ठीक होने की कोई उम्मीद न हो और वह वर्षों तक अचेत अवस्था में रहे, तब परिवार और समाज के सामने कितनी बड़ी मानसिक और भावनात्मक चुनौती खड़ी हो जाती है. राणा परिवार के लिए यह फैसला एक ऐसे लंबे संघर्ष का अंत भी है, जिसने पिछले 13 सालों से उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया था.

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