'जल्लीकट्टू-कंबाला और बैलगाड़ी दौड़ कानूनन वैध', सुप्रीम कोर्ट का आया फैसला

Supreme Court Verdict On Jallikattu: तमिलनाडु और महाराष्ट्र में पारंपरिक जल्लीकट्टू खेल और बैलगाड़ी दौड़ को अनुमति देने वाले कानून की वैधता पर आज सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुना दिया. कोर्ट ने इन्हें कानूनन वैध करार दिया है. पिछले साल पांच जजों की संविधान पीठ ने दिसंबर में इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था.

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जल्लीकट्टू मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला (फाइल फोटो) जल्लीकट्टू मामले में सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला (फाइल फोटो)

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 18 मई 2023,
  • अपडेटेड 11:40 AM IST

 Verdict On Jallikattu: सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने गुरुवार को जल्लीकट्टू, कंबाला और बैलगाड़ी दौड़ की इजाजत देने वाले कानूनों की संवैधानिकता पर तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र सरकार को बड़ी राहत दी. सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु संशोधन अधिनियम, महाराष्ट्र अधिनियम, कर्नाटक अधिनियम पर कहा कि राज्य के तीनों अधिनियम वैध हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा जल्लीकट्टू, बैलगाड़ी दौड़ कानून वैध हैं. राज्यों को कानून के तहत पशुओं की सुरक्षा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश है.

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मालूम हो कि कोर्ट ने पिछले साल 8 दिसंबर को एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ और अन्य डब्ल्यू पी ( सी) नंबर 23/2016 और इससे जुड़े मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था. 

एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम ए नागराजा और अन्य के नाम से दाखिल याचिकाओं में भारत सरकार की 7 जनवरी 2016 को जारी अधिसूचना को रद्द और निरस्त करने की मांग की गई है. 

जानकारी के मुताबिक यह मामला लंबित था, लेकिन इसी दौरान तमिलनाडु में पशुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2017 पारित किया गया. बाद में इस अधिनियम को रद्द करने की मांग करने के लिए रिट याचिकाओं को दाखिल किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने तब इस मामले को संविधान पीठ को सौंपते हुए पूछा था कि क्या तमिलनाडु संविधान के अनुच्छेद 29(1) के तहत अपने सांस्कृतिक अधिकार के रूप में जलीकट्टू का संरक्षण कर सकता है, जो नागरिकों के सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी देता है. 

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तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस रोहिंटन नरीमन की पीठ ने महसूस किया था कि जलीकट्टू के इर्द-गिर्द घूमती रिट याचिका में संविधान की व्याख्या से संबंधित पर्याप्त प्रश्न शामिल हैं. इसके बाद रिट याचिकाओं में उठाए गए सवालों के अलावा इस मामले में पांच सवालों के जवाब तय करने के लिए संविधान पीठ के पास भेजने की सिफारिश कर दी थी.

दिसंबर में जजों ने ये की थी टिप्पणी

जस्टिस अजय रस्तोगी ने कहा था- क्या हम इन रिपोर्टों/तस्वीरों के आधार पर कोई धारणा बना सकते हैं? छिटपुट घटनाएं हो सकती हैं, लेकिन हम संविधान के संदर्भ में अधिनियम का परीक्षण कर रहे हैं. तस्वीरों के आधार पर कोई राय एक खतरनाक स्थिति होगी. हम उनके आधार पर एक खोज रिकॉर्ड नहीं कर सकते."

जस्टिस हृषिकेश रॉय ने कहा था- खूनी खेल से क्या मतलब है. इसे खूनी खेल क्यों कहा जा रहा है? कोई भी हथियार का इस्तेमाल नहीं कर रहा है. खूनी खेल की अवधारणा के बारे में आपकी समझ क्या है? यहां लोग नंगे हाथ हैं. क्रूरता हो सकती है. हमें परिभाषाएं मत दिखाइए. हमें बताइए कैसे? इस खेल में मौत होती है, इसका मतलब यह नहीं है कि यह खूनी खेल है. मुझे अभी तक अपना जवाब नहीं मिला है. वहां के लोग जानवर को मारने नहीं जा रहे हैं. खून एक आकस्मिक चीज हो सकती है."

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जस्टिस केएम जोसेफ ने कहा था, "पर्वतारोहण भी खतरनाक है, तो क्या हम इसे रोक दें? अगर हम इन नियमों का पालन कर रहे हैं, तो आप ऐसा क्या रखना चाहेंगे जिससे स्थिति में सुधार हो. क्या आप हमें एक न्यायशास्त्रीय अर्थ में जानवर के निहित अधिकारों पर स्थिति बता सकते हैं?"

याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने पिछले साल यह दी थीं दलीलें

सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा था,

- सिर्फ यह कहना कि यह एक संस्कृति है, को संस्कृति नहीं माना जा सकता है और यह मानते हुए कि यह एक संस्कृति है, क्या आज के समय में सभी संस्कृतियों को अनुमति दी जानी चाहिए."

- मनोरंजन के लिए एक गतिविधि को आवश्यकता के सिद्धांत के अपवाद के रूप में नहीं लाया जा सकता है क्योंकि यह सिद्धांत तर्कशीलता में निहित है. 

- अहिंसा इस राष्ट्र के संस्थापक आधारों में से एक थी. हम अहिंसक वातावरण के सिद्धांत को दूर नहीं कर सकते. जानवरों को इंसानों की हद तक व्यक्तित्व का अधिकार नहीं हो सकता है, लेकिन उनके पास सम्मान के साथ जीने और क्रूरता के साथ व्यवहार न करने का एक सीमित अधिकार है.

सीनियर एडवोकेट आनंद ग्रोवर ने दलील दी थी,

- राष्ट्रपति की सहमति पर यह एक अजीबोगरीब मामला है. नियम बनाए गए हैं. वे इस मामले के केंद्र हैं. जब सहमति मांगी गई थी, तो कोई नियम नहीं थे. अब, अगर आपके पास नियम नहीं हैं, तो आप राष्ट्रपति के रूप में अपनी सहमति कैसे दे सकते हैं, इसलिए राष्ट्रपति अनुमति नहीं दे सकते थे."

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- ग्रोवर ने ब्राउन बनाम बोर्ड ऑफ एजुकेशन के अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी कानून की संवैधानिकता तय करते समय कानून के वास्तविक प्रभाव को ध्यान में रखा जाना चाहिए.

- आज जलवायु परिवर्तन का संकट है. बच्चे विरोध कर रहे हैं- हमारे भविष्य का क्या होगा. उस लिहाज से इंसान का जानवरों से रिश्ता अहम है. हम आज इस स्थिति में इसलिए पहुंचे हैं क्योंकि हमने जानवरों और पौधों के लिए सम्मान नहीं दिया. 

सीनियर एडवोकेट के के वेणुगोपाल ने कहा था,

- "महिलाओं को भी एक बार संपत्ति के रूप में माना जाता था. पशु अधिकारों के लिए दार्शनिक आधार यह है कि जानवर जो संवेदनशील प्राणी हैं, वे अधिकारों के पात्र हैं. पांच स्वतंत्रताएं अंतरराष्ट्रीय कानून से आती हैं. दीवान ने खूनी खेल के बारे में बात की.

- प्राचीन रोम में वहां एक सर्कस हुआ करता था - जहां जानवर लोगों और जानवरों से लड़ते थे. वहां भीड़ आपस में लड़ने का आनंद लेती थी और खून बहता था. क्या इस तरह का आदिम आग्रह कि तेज सींग वाले बैल देखने वाले दर्शक हैं तो लोगों द्वारा हाथापाई की अनुमति दी जानी चाहिए. क्या आज की यह प्रथा हमें 2000 साल पहले नहीं ले जाती?"

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- मैं एक सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार पर भरोसा कर रहा हूं और जानवर मेरे पर्यावरण का हिस्सा हैं और मैं नहीं चाहता कि किसी जानवर के साथ क्रूर व्यवहार किया जाए."

सीनियर एडवोकेट वी गिरी ने कोर्ट में कहा था,

- "यह एक ऐसा मामला है जहां राज्य ने जलीकट्टू के आयोजन को पशु अधिकारों के दायरे से बाहर कर दिया है. क्या यह जलीकट्टू को अधिनियम से बाहर करके पीसीए अधिनियम में संशोधन है. यह एक ऐसे कानून का अधिनियमन है जो एक खेल को जानवरों के प्रति क्रूरता की रोकथाम के दायरे से पूरी तरह से बाहर कर देता है. यह कोई कानून नहीं है. नियमों को कभी भी पूर्ण कानून की स्थिति तक नहीं बढ़ाया जा सकता. नियम खामियों को बंद नहीं कर सकते."

(खबर अपडेट हो रही है)

 

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