जमीन के नीचे पानी दिखाई नहीं देता. फिर भी बोरिंग करने वाली मशीन अक्सर उसी जगह खुदाई शुरू करती है, जहां कुछ देर बाद पानी निकलता है. आखिर यह कैसे संभव होता है? क्या लोगों के पास कोई ऐसी मशीन होती है जो जमीन के अंदर का भी पता लगे लेती है या फिर यह सिर्फ किस्मत का खेल होता है? अगर आपके मन में भी कभी ये सवाल आया है, तो चलिए जानते हैं कि बोरिंग से पहले पानी की जगह कैसे तय की जाती है और इसमें कितना खर्च आता है. मान लीजिए आपके घर तक पानी की पाइप लाइन नहीं पहुंचती या जो पानी आता है, वह जरूरत के हिसाब से काफी नहीं है.
ऐसे में जमीन के नीचे मौजूद भूजल तक पहुंचने के लिए मशीन से गहरा छेद किया जाता है. इसी को बोरिंग या बोरवेल कहते हैं. इसके बाद उस छेद में पाइप डाला जाता है और सबमर्सिबल मोटर लगाकर पानी बाहर निकाला जाता है. आज गांव से लेकर शहर तक करोड़ों लोग इसी पानी पर निर्भर हैं. लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है. हर जगह जमीन के नीचे पानी एक जैसी गहराई पर नहीं होता. कहीं 100 फीट पर पानी मिल जाता है, तो कहीं 500 या 700 फीट तक खुदाई करनी पड़ती है.
लेकिन सबसे बड़ा सवाल... पानी है कहां?
यही बात सबसे ज्यादा लोगों को हैरान करती है. आखिर जब जमीन के नीचे कुछ दिखाई ही नहीं देता, तो ड्रिलिंग मशीन वाले सीधे उसी जगह कैसे बोरिंग शुरू कर देते हैं? क्या यह सिर्फ अंदाजा होता है? आज इसके लिए साइंटिफिक तरीके अपनाए जाते हैं. घरों में बोरिंग करने वाले सुशील बताते हैं कि एक्सपर्ट सिर्फ जमीन को देखकर फैसला नहीं लेते, बल्कि खास मशीनों की मदद से यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि जमीन के नीचे किस तरह की मिट्टी और चट्टानें हैं और किस गहराई पर पानी मिलने की संभावना सबसे ज्यादा है.
इसके लिए इलेक्ट्रिकल रेजिस्टिविटी सर्वे जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें जमीन के अंदर हल्का इलेक्ट्रिक करंट भेजा जाता है. अलग-अलग परतें करंट को अलग तरीके से रोकती हैं. मशीन इन्हीं आंकड़ों के आधार पर बताती है कि नीचे पानी होने की कितनी संभावना है.
पड़ोस की बोरिंग भी बहुत काम आती है
मान लीजिए आपके पड़ोस में पहले से तीन-चार बोरिंग हैं. ऐसे में सबसे पहले लोग यही पूछते हैं कि वहां कितने फीट पर पानी मिला था. क्या पूरे साल पानी आता है? मोटर कितनी गहराई पर लगी है? अगर आसपास के कई घरों में लगभग एक जैसी गहराई पर पानी मिल रहा है, तो नई बोरिंग की योजना भी उसी हिसाब से बनाई जाती है.
यानी पड़ोस की जानकारी कई बार लाखों रुपये बचा सकती है.
नारियल और लकड़ी से पानी खोजने की बात कितनी सच है?
आपने कई बार देखा होगा कि कुछ लोग नारियल, Y आकार की लकड़ी या लोहे की रॉड लेकर जमीन पर चलते हैं और दावा करते हैं कि उन्हें पता चल गया कि पानी कहां है. इसे डाउजिंग कहा जाता है. हालांकि आज तक कोई वैज्ञानिक रिसर्च यह साबित नहीं कर पाई है कि यह तरीका भरोसेमंद है. इसलिए विशेषज्ञ हमेशा मशीनों और भूवैज्ञानिक सर्वे पर भरोसा करने की सलाह देते हैं.
अब बात करते हैं खर्च की
बोरिंग का कोई एक तय रेट नहीं होता. इसका खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि आपका इलाका कौन-सा है, जमीन नरम है या चट्टानी, कितनी गहराई तक खुदाई करनी है और किस तरह की मोटर लगानी है. सामान्य तौर पर सिर्फ ड्रिलिंग का खर्च 150 से 500 रुपये प्रति फीट तक हो सकता है. कई जगह यह इससे ज्यादा भी होता है. अगर 250 फीट तक बोरिंग करनी पड़े और ड्रिलिंग का रेट 250 रुपये प्रति फीट हो, तो सिर्फ खुदाई पर ही करीब 62 हजार रुपये खर्च हो सकते हैं. इसके बाद पाइप, सबमर्सिबल पंप, बिजली की केबल, फिटिंग और इंस्टॉलेशन का खर्च अलग से जुड़ता है. यानी एक सामान्य घरेलू बोरिंग पर कुल मिलाकर 60 हजार से 2 लाख रुपये या उससे ज्यादा खर्च आ सकता है.
क्या ज्यादा गहराई मतलब ज्यादा पानी?
ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि जितनी गहरी बोरिंग होगी, उतना ज्यादा पानी मिलेगा. लेकिन ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं है. कई बार 120 फीट पर ही भरपूर पानी मिल जाता है, जबकि कहीं 500 फीट तक खुदाई करने के बाद भी पानी बहुत कम निकलता है. इसलिए गहराई नहीं, बल्कि उस इलाके की भूगर्भीय संरचना(Geologic structure) सबसे ज्यादा मायने रखती है.
क्या बिना परमिशन के बोरिंग करवा सकते हैं?
देश के कई राज्यों में भूजल तेजी से नीचे जा रहा है. इसलिए कुछ शहरों और इलाकों में बोरिंग करवाने से पहले स्थानीय प्रशासन या संबंधित विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है. इसलिए काम शुरू करने से पहले अपने इलाके के नियम जरूर पता कर लें.
बोरिंग करवाने से पहले ये 5 बातें जरूर याद रखें
बिना जानकारी के किसी भी जगह बोरिंग शुरू न कराएं. जहां संभव हो, पहले भूवैज्ञानिक सर्वे कराएं. अनुभवी ड्रिलिंग एजेंसी से ही काम कराएं. अच्छी क्वालिटी के पाइप और मोटर लगवाएं. अगर संभव हो तो घर में रेन वाटर हार्वेस्टिंग भी जरूर बनवाएं, ताकि भूजल स्तर बना रहे.
जमीन के नीचे पानी ढूंढना पहले जितना मुश्किल लगता था, आज उतना नहीं है. आधुनिक मशीनें और वैज्ञानिक तकनीक काफी हद तक यह बता देती हैं कि कहां पानी मिलने की संभावना ज्यादा है. हालांकि 100 प्रतिशत गारंटी कोई नहीं दे सकता, क्योंकि भूजल पूरी तरह प्राकृतिक स्रोत है. अगर सही जानकारी, सही सर्वे और सही ड्रिलिंग एजेंसी के साथ बोरिंग करवाई जाए, तो लंबे समय तक पानी की समस्या से राहत मिल सकती है. इसलिए जल्दबाजी करने के बजाय पहले पूरी जानकारी लेना ही सबसे समझदारी का फैसला है.
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