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ज्वालामुखी की आग से बिजली बनाता है ये देश, पेट्रोल-डीजल-LPG पर नहीं है निर्भर

aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 26 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 2:15 PM IST
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जब पूरी दुनिया में जंग की वजह से तेल और गैस की किल्लत हो गई है. ऐसे में एक देश  इन परेशानियों से बेफिक्र दिखाई दे रहा है. क्योंकि, यहां एनर्जी का सोर्स तेल, गैस और कोयला जैसे जीवाश्म ईंधन नहीं, बल्कि ज्वालामुखी, बर्फ और नदियां हैं. जानते हैं वो कौन सा देश है जो पूरी तरह से अपने रिन्यूएबल एनर्जी पर डिपेंडेंट है. (Photo - Pexels)

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ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच चल रहे जंग का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है. पूरे ग्लोब पर तेजी से ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है. तेल और गैस की हर जगह किल्लत हो रही है. इन सबके बीच एक देश ऐसा भी है, जिस पर इन हालात का कोई खास असर नहीं हो रहा. क्योंकि, यहां एनर्जी का सोर्स, तेल-गैस और कोयला नहीं, ज्वालामुखी नदियां और बर्फ है. (Photo - Pexels)
 

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यहां हम आइसलैंड की बात कर रहे हैं. आज जब हर जगह तेल और गैस को लेकर मारामारी चल रही है. ऐसे में आइसलैंड एनर्जी इफिसिएंशी का एक अनूठा और आदर्श   मॉडल पेश कर रहा है. इस छोटे से देश में खपत होने वाली लगभग 100 प्रतिशत बिजली रिन्यूएबल ऊर्जा से आती है. इसके अलावा, यहां हर 10 में से 9 घरों को सीधे जिओथर्मल एनर्जी से गर्म किया जाता है. जीवाश्म ईंधन (तेल, गैस और कोयला) से रिन्यूएबल एनर्जी की ओर आइसलैंड के शिफ्ट होने की कहानी उन देशों के लिए प्रेरक साबित हो सकती है, जो आज ऊर्जा संकट का सामना कर रहे हैं.  (Photo - Pexels)
 

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आइसलैंड को 'आग और बर्फ की भूमि' कहा जाता है. भौगोलिक रूप से इस देश की स्थिति और हालात इसे रिन्यूएबल एनर्जी के व्यापक भंडार उपलब्ध कराते हैं. यह द्वीप उत्तरी अमेरिकी और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच मध्य अटलांटिक रिज पर स्थित है, जो एक अत्यंत सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र है. यह इलाका आइसलैंड के जियोथर्मल प्लांट को पावर देता है. (Photo - Pexels)
 

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ऐसे जियोथर्मल पावर प्लांट पर शुरू हुआ काम
दूसरे तरीके से कहें तो आइसलैंड में ज्वालामुखी की आग से बिजली तैयार की जाती है. इसकी कहानी भी काफी दिलचस्प है. यहां सक्रिय ज्वालामुखी क्षेत्र होने के कारण जगह-जगह धरती के नीचे से गर्म पानी निकलती है.   बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, एक किसान ने जमीन से रिसने वाले गर्म पानी का इस्तेमाल करके अपने खेत के लिए एक शुरुआती जियोथर्मल हिटिंग सिस्टम विकसित करने का तरीका खोजा. (Photo - Pexels)
 

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इसके बाद नगरपालिकाओं ने धीरे-धीरे इस सफलता को आगे बढ़ाया, जिससे जियोथर्मल रिसोर्सेस का अधिक व्यवस्थित इस्तेमाल शुरू हुआ. तेल उद्योग से उधार ली गई ड्रिलिंग तकनीक ने अधिक गर्म पानी के लिए गहरी ड्रिलिंग की गई. इससे अधिक से अधिक घरों को गर्म किया जाने लगा.  इसके बाद व्यावसायिक पैमाने पर जियो थर्मल हिटिंग सिस्टम विकिसित किए जाने लगे. (Photo - Pexels)
 

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कैसे ज्वालामुखी से तैयार होती है बिजली
आइसलैंड में ज्यादा तापमान वाली ज्वालामुखी चट्टानों में 2–3 km गहरे कुएं खोदकर ज्वालामुखी से निकलने वाली जियो थर्मल ऊर्जा (भाप और गर्म पानी)का इस्तेमाल बड़े-बड़े टर्बाइनों को चलाने में किया जाता है. ड्रील कर खोदे गए इन कुओं से जमीन के नीचे सक्रिया ज्वालामुखी के कारण प्राकृतिक रूप से तैयार भाप और गर्म पानी के भंडारों तक पहुंचा जाता है. जहां तापमान 250°C से भी ज़्यादा होता है. यह तेज दबाव वाली भाप ऊपर उठकर जियो थर्मल पावर प्लांट में लगे टर्बाइनों को चलाती है, जिससे बिजली बनती है. वहीं बचा हुआ गर्म पानी घरों और उद्योगों को सीधे तौर पर गर्मी पहुंचाने का काम करता है. (Photo - Pexels)
 

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जियो थर्मल के अलावा पनबिजली का भी है विकल्प
इस देश का 11 प्रतिशत भाग ग्लेशियरों से ढका हुआ है. मौसमी पिघलाव से हिमनदियां बनती हैं, जो पहाड़ों से समुद्र तक बहती हैं और आइसलैंड के जलविद्युत (हाइड्रोइलेक्ट्रिसिटी )संसाधन का काम करती है.  इसके अलावा, देश में पवन ऊर्जा की अपार क्षमता है, जिसका अभी तक पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया है. (Photo - Pexels)
 

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जियोथर्मल पावर की तरह ही शुरुआती हाईड्रोइलेक्ट्रिसिटी परियोजनाएं भी मेहनती किसानों द्वारा अपने फार्महाउसों के लिए बिजली प्रदान करने के लिए शुरू की गई थीं. यह कुछ खेतों के लिए एक सहकारी प्रयास के रूप में विकसित की गईं. 1950 में, आइसलैंड में ऐसे 530 छोटे जलविद्युत संयंत्र बनाए गए, जिससे देश भर में बिखरी हुई स्वतंत्र बिजली प्रणालियां स्थापित हुईं. (Photo - Pexels)
 

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पहले आइसलैंड भी तेल, गैस और कोयला पर निर्भर था
1970 के दशक की शुरुआत तक, इस देश की ऊर्जा खपत का सबसे बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से प्राप्त जीवाश्म ईंधन (तेल, गैस और कोयला) से प्राप्त होता था. फिर आइसलैंड में रिन्यूएबल एनर्जी के विकास के लिए जियोथर्मल और पनबिजली दोनों क्षेत्रों में चुनौतीपूर्ण शुरुआती कदम स्थानीय उद्यमियों द्वारा उठाए गए थे.(Photo - Pixabay)
 

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जियो थर्मल एनर्जी के इस्तेमाल को और अधिक प्रोत्साहित करने के लिए, आइसलैंड सरकार ने 1960 के दशक में एक जियोथर्मल ड्रिलिंग कंपनसेशन फंड की स्थापना की. इस कोष ने इस क्षेत्र में रिसर्च और टेस्ट ड्रिलिंग के लिए लोन देना शुरू किया.  साथ ही असफल परियोजनाओं के लिए लागत वसूली भी प्रदान की. इन कानूनी ढांचे ने परिवारों के लिए तेल और गैस का इस्तेमाल जारी रखने के बजाय नए जियो थर्मल पावर नेटवर्क से जुड़ने को आकर्षक बना दिया. (Photo - Pixabay)
 

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इसी दौरान, आइसलैंड ने बड़े पैमाने पर हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी के विकास पर ध्यान ध्यान देना शुरू किया, जिससे बड़े अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक ऊर्जा उपभोक्ता आकर्षित हुए. इसका मकसद आइसलैंड में नए उद्योगों को लाना था ताकि इसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सके और ज्यादा रोजगार सृजित किए जा सकें.(Photo - Pixabay)
 

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