फूलन देवी: वह दस्यु सुंदरी जिसके समर्पण के लिए इंदिरा को करनी पड़ी थी अपील

फूलन ने बीहड़ में 1976 से 1983 तक राज किया. इंदिरा गांधी की पहल पर फूलन ने 12 फरवरी, 1983 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने अपनी शर्तों पर आत्मसमर्पण किया. जेल से छूटने के बाद वह राजनीति की दुनिया में आ गईं और सांसद बनीं.

Advertisement
फूलन देवी (फाइल फोटो) फूलन देवी (फाइल फोटो)

कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 10 अगस्त 2017,
  • अपडेटेड 12:23 PM IST

70-80 के दशक में यूपी-एमपी के बीहड़ों में डाकुओं का खौफ पसरा रहा करता था. दोनों ही राज्यों के सीमावर्ती इलाके डाकुओं के लिए सबसे बेहतर पनाहगार थे. इन्हीं दस्यु सरगनाओं में एक नाम तेजी से चढ़ा जिसे बीहड़ में 'फूलन' कहा जाता था. फूलन को लोग फूलन देवी और बाद में बैंडिट क्वीन के नाम से भी याद करते हैं. फूलन की शख्सियत ही कुछ ऐसी थी कि उसके ऊपर फिल्म भी बनी और किताब भी लिखी गई.

Advertisement

दलित परिवार में जन्मी थी फूलन

फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के एक छोटे से गांव गोरहा का पूरवा में हुआ था. बचपन से उसने जातिप्रथा और गरीबी का दंश झेला था. 11 साल की छोटी सी उम्र में फूलन की शादी उसे काफी बड़े आदमी से करा दी गई थी. छोटी सी उम्र में भारी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना ने उसे अंदर से बागी बना दिया. जिसकी वजह से वह अपने ससुराल से भाग कर अपने मायके वापस आ गई.

बीहड़ से संसद तक पहुंची फूलन

फूलन ने बीहड़ में 1976 से 1983 तक राज किया. इंदिरा गांधी की पहल पर फूलन ने 12 फरवरी, 1983 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने अपनी शर्तों पर आत्मसमर्पण किया. जेल से छूटने के बाद वह राजनीति की दुनिया में आ गईं और सांसद बनीं.

Advertisement

15 साल में हुआ बलात्कार उसके बाद पहुंची बीहड़

उस दौर में समाज में ऊंची जातियों का ही बोलबाला था. इसी वजह से छोटी-छोटी बातों पर फूलन को डांट पड़ा करती थी. एक दिन फूलन की किसी बात पर नाराज गांव के ठाकुरों ने उसे सबक सिखाने की ठानी. जिसका परिणाम हुआ कि फूलन को 15 साल की छोटी सी उम्र में सामूहिक बलात्कार का सामना करना पड़ा.

ऐसा कहा जाता है कि फूलन को रास्ते से हटाने के लिए गांव के मुखिया ने डकैतों को बुलाया था. लेकिन वे उसे अपने साथ उठा ले गए. बीहड़ में भी दस्यु सरगना श्रीराम और उसका भाई लाला राम ने फूलन के साथ कई बार बलात्कार किया. बीहड़ में ही फूलन की मुलाकात विक्रम मल्लाह से हुई और दोनों ने मिलकर अपना खुद का अलग गिरोह बना लिया.

इस घटना से सुर्खियों में आईं फूलन

फूलनदेवी सबसे पहली बार (1981) में उस वक्त राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में आईं जब उन्होंने और उनके गैंग ने कानपुर के बेहमई गांव में ऊंची जातियों के बाइस लोगों का एक साथ तथाकथित (नरसंहार) किया. इसे बेहमई हत्याकांड के नाम से भी जाना जाता है. लेकिन बाद में फूलन ने इस नरसंहार से इंकार कर दिया था.

Advertisement

इंदिरा की पहल पर आत्मसमर्पण

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार के अलावा प्रतिद्वंदी गिरोहों ने फूलन को पकड़ने की बहुत सी नाकाम कोशिशें कीं. इंदिरा गांधी की सरकार ने (1983) में उनसे समझौता किया की उन्हें (मृत्यु दंड) नहीं दिया जाएगा और उनके परिवार के सदस्यों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. फूलन ने इस शर्त को मान लिया क्योंकि उस वक्त तक उनके करीबी विक्रम मल्लाह की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो चुकी थी, जिसने फूलन को अंदर से तोड़ दिया था. 12 फरवरी, 1983 को फूलन ने मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

मुलायम लाए जेल से बाहर

बिना मुकदमा चलाये ग्यारह साल तक जेल में रहने के बाद फूलन को 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने छोड़ दिया. दरअसल उस वक्त दलित लोग फूलन के समर्थन में गोलबंद हो रहे थे और फूलन दलित समुदाय में एक नायक की छवि के रुप में तेजी से बढ़ रही थीं. अपनी रिहाई के बाद फूलन ने बौद्ध धर्म में अपना लिया. 1996 में फूलन ने उत्‍तर प्रदेश के भदोही सीट से लोकसभा का चुनाव जीता और संसद पहुंचीं.

बदले के मकसद से हुई फूलन की हत्या, पहले खाई थी खीर

Advertisement

25 जुलाई 2001 की सुबह शेर सिंह राणा खुद फूलन देवी से मिलने गया था वहां उसने अपना फर्जी नाम शेखर बताया था. राणा ने फूलन के सामने उनकी एकलव्य सेना से जुड़ने की मंशा जाहिर की थी. इसी मुलाकात के दौरान राणा को फूलन ने खीर खाने को दी थी. क्योंकि उस दिन नागपंचमी का त्योहार था. उसी दिन तकरीबन 11 बजे फूलन देवी सरकारी बंगले से संसद भवन के लिए रवाना हो गईं लेकिन राणा उनके घर से गया नहीं वह बाहर बनी लॉबी में बैठा रहा. दोपहर करीब डेढ़ बजे जब फूलन देवी संसद भवन से वापस अपने आवास पहुंचीं राणा ने फुर्ती से गोलियां चला दीं जिससे उनकी मौत हो गई. यह बातें फूलन के पति उम्मेद सिंह ने खुद मीडिया को बताई थीं. आपको बता दें कि उम्मेद सिंह से फूलन ने 1994 में शादी की थी जब वे जेल से छुटकर बाहर आई थीं. उम्मेद सिंह की पहली शादी फूलन की बहन के साथ हुई थी.

25 साल के हो चुके शेर सिंह राणा ने घटना के तुरंत बाद अपने को कानून के हवाले कर दिया था और देहरादून डालनवाला थाने में हुई प्रेस कांफ्रेंस में यह स्वीकार किया था कि उन्होंने बेहमई में फूलन के हाथों मारे गए 22 क्षत्रियों की हत्या का बदला लिया था. इस बात की तस्दीक संयुक्त पुलिस आयुक्त के के पॉल ने भी दिल्ली में की थी। उन्होंने कहा था, "वह खुद चलकर पुलिस थाने आया और आत्मसमर्पण कर दिया."

Advertisement

फूलन की हत्या के बाद पुलिस ने फूलन के परिवार वालों से भी पूछताछ की. फूलन के पति उम्मेद सिंह से भी दिल्ली पुलिस ने पूछताछ की. तत्कालीन खबरों की मानें तो उम्मेद सिंह और फूलन के रिश्तों में कुछ गड़बड़ चल रही थी. लोगों का अनुमान था कि फूलन कोई वसीयत भी बनवा रही थीं. माना जा रहा था कि वसीयत में शायद घर और किताब से आने वाली रॉयल्टी में उम्मेद सिंह का हक न होने की बात रखी जाने वाली थी. पुलिसिया पूछताछ के दौरान उम्मेद सिंह ने ऐसी किसी भी वसीयत के होने से इनकार किया था और फूलन के साथ उनके रिश्तों को भी बेहतर बताया था. उम्मेद सिंह का कहना था कि हमारी लड़ाई कभी इतनी गंभीर नहीं हुई.

फूलन हत्याकांड को 'राजनीतिक साजिश' भी कहा गया

फूलन हत्याकांड को लेकर समाजवादी पार्टी और मीडिया पुलिस पर दबाव बना रहा था. दरअसल फूलन एसपी से ही मिर्जापुर की सांसद थीं और पार्टी का दलित चेहरा थीं. समाजवादी पार्टी ने ही फूलन हत्याकांड को 'राजनीतिक साजिश' करार दिया था. समाजवादी पार्टी ने सरकार द्वारा फूलन की सुरक्षा भी कम करने का आरोप लगाया था जिसे सरकार ने नकार दिया था. समाजवादी पार्टी के सांसदों का आरोप था कि फूलन की हत्या इसलिए कराई गई थी क्योंकि उत्तर प्रदेश में फरवरी में चुनाव होने वाले थे. जहां एसपी का सीधा मुकाबला राज्य में उस वक्त शासन कर रही बीजेपी से था. उम्मेद सिंह का भी मानना था कि फूलन की हत्या के पीछे लंबी साजिश रची गई थी. उनको लगता था कि फूलन की हत्या में किसी बड़े नेता का हाथ रहा होगा।.

Advertisement

फूलन देवी हत्याकांड में उस वक्त एसपी से सांसद रहे अमर सिंह का नाम भी खूब उछला था जिन्हें इन दिनों लोग 'अखिलेश के अंकल' के नाम से भी पुकारते हैं. फूलन हत्याकांड में सजा पा चुके शेर सिंह राणा की किताब 'जेल डायरी' भी इस बात की पुष्टि करती है. राणा ने अपनी किताब में लिखा है कि पुलिस रिमांड के बाद जब दिल्ली पुलिस ने उन्हें तिहाड़ जेल में बंद किया तो उसी दौरान एक दिन जेलर ने उनसे कहा कि मेरे पास एक आइडिया है जिससे तुम चाहो तो एक-दो करोड़ कमा सकते हो. जेलर ने शेर सिंह राणा से अमर सिंह (समाजवादी पार्टी के तत्कालीन सांसद) को फोन करने के लिए कहा था. जेलर के मुताबिक उनको अमर सिंह से फोन पर कहना था कि वे मीडिया के सामने कह देंगे कि फूलन की हत्या उन्होंने अमर सिंह के कहने पर की है.

जेलर का कहना था कि उस वक्त टीवी पर लगभग हर दिन सांसद अमर सिंह पर फूलन की हत्या का आरोप लगने वाली खबरें चल रही थीं. ऐसे में यदि शेर सिंह राणा मीडिया में जा कर अमर सिंह का नाम लेने की बात अमर सिंह से करेगा तो वे डर जाएंगे, क्योंकि इससे उनकी राजनीति खत्म हो सकती थी. हालांकि किताब के मुताबिक शेर सिंह राणा ने जेलर की इस सलाह को दरकिनार कर दिया.

Advertisement

मीडिया में भले ही फूलन हत्याकांड में को लेकर कई लोगों के नाम उछले हों लेकिन अदालत ने शेर सिंह राणा को ही फूलन की हत्या का दोषी माना. आपको बता दें कि फूलन की हत्या के 13 साल बाद अदालत ने 8 अगस्त 2014 को राणा को दोषी ठहराया और 14 अगस्त 2014 को एकमात्र दोषी शेर सिंह राणा को दिल्ली की एक अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई. उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था.

 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »