माया-अखिलेश के चाहने भर से नहीं बनेगा महागठबंधन, ये हैं 5 बड़े रोड़े

अखिलेश और माया के हाल में आए बयानों ने एक तरह के बिहार का महागठबंधन फॉर्मूला पूरे देश में लागू करने की भविष्यवाणी कर दी है लेकिन क्या ये इतना आसान होगा? जवाब है नहीं.

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अखिलेश यादव-मायावती अखिलेश यादव-मायावती

संदीप कुमार सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 15 अप्रैल 2017,
  • अपडेटेड 9:11 AM IST

यूपी विधानसभा चुनाव करारी के बाद न सिर्फ अखिलेश और मायावती साथ आने को तैयार दिख रहे हैं बल्कि 2019 के लिए महागठबंधन की कवायद भी तेजी पकड़ रही है. यही कारण है कि अगस्त में होने वाले लालू की महारैली के लिए तमाम दलों के नेता राजी दिख रहे हैं. सूत्रों के अनुसार अखिलेश और मायावती लालू की महारैली में साथ आने वाले हैं. यूपी की हार झेलने के बाद अब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी चिर प्रतिद्वंद्वी पार्टियों को अपने भविष्य को लेकर चिंता सताने लगी है. यही वजह है कि चुनाव में जो दो पार्टियां एक-दूसरे की जानी दुश्मन बनी हुई थीं, अब आपसी गठबंधन के लिए तैयार खड़ी दिख रही हैं. अखिलेश और माया के हाल में आए बयानों ने एक तरह के बिहार का महागठबंधन फॉर्मूला पूरे देश में लागू करने की भविष्यवाणी कर दी है लेकिन क्या ये इतना आसान होगा? जवाब है नहीं.

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महागठबंधन की राह के ये हैं 5 बड़े रोड़े-

1. महागठबंधन का नेता कौन?
यूपी चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत के तुरंत बाद महागठबंधन बनाने को लेकर कांग्रेस और जेडीयू के बयान आए थे. लेकिन साथ ही नेता कौन होगा इसपर भी बयानबाजी शुरू हो गई. कांग्रेस ने कहा कि राहुल गांधी के अलावा और कोई नेता नहीं हो सकता तो जेडीयू ने कहा कि मोदी को सिर्फ नीतीश ही टक्कर दे सकते हैं. बाद में नीतीश का भी बयान आया कि अगर यूपी में कांग्रेस-बसपा और सपा मिलकर लड़े होते तो बीजेपी से 10 प्रतिशत ज्यादा वोट पाते. बिहार में बीजेपी इसलिए हारी क्योंकि यहां विपक्ष एकजुट था. अब यही एकजुटता पूरे देश में दिखानी होगी. तभी बेड़ा पार होगा. लेकिन यहां सवाल ये है कि मोदी के खिलाफ एक नेता पर क्या राय बनेगी. राहुल गांधी, नीतीश, मुलायम, ममता, लालू, मायावती, नवीण पटनायक में पीएम फेस को लेकर किस हद तक सहमति बन पाएगी इसपर सबकी निगाहें रहेंगी.

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2. क्षत्रपों का सीमित जनाधार
महागठबंधन को लेकर बयान देना तो ठीक लेकिन तमाम विपक्षी दलों में ऐसा कोई नेता नहीं दिखता जिसका एक से ज्यादा राज्यों में असर हो. मुलायम सिंह या अखिलेश का प्रभाव सिर्फ यूपी में हो सकता है. से ही साफ हैं बाकी राज्यों में असर पर संदेह ही है. लालू की पार्टी ने नीतीश लहर के बूते जैसे-तैसे सत्ता में वापसी की है. नीतीश कुमार की पार्टी का बिहार के बाहर प्रभाव नहीं दिखता. बिहार विधानसभा में भी जेडीयू दूसरे नंबर पर है. पीएम पद की नीतीश की महत्वाकांक्षा को सहयोगी आरजेडी से कितना समर्थन मिलेगा इसपर भी संदेह है. ममता बनर्जी का बंगाल में अच्छा प्रभाव है लेकिन बाकी राज्यों के क्षेत्रीय दल उनके नेतृत्व को कितना मानेंगे. कांग्रेस का प्रभाव पूरे देश में माना जा सकता है लेकिन 2014 से अबतक कांग्रेस का ग्राफ गिरता ही गया है और इसे लेकर राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता को लेकर पार्टी के अंदर ही सवाल उठ रहे हैं.

3. राज्यों में आपस में भिड़ीं पार्टियों का क्या होगा?
मोदी विरोध तो ठीक लेकिन विपक्षी दलों के आपसी समीकरणों का क्या होगा? यूपी में अस्तित्व बचाने के लिए महागठबंधन माया और अखिलेश की मजबूरी हो सकती है लेकिन बंगाल में कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस-लेफ्ट किस हद तक साथ आएंगे. साउथ में क्या डीएमके-एआईएडीएमके साथ आएंगे? बिहार में सपा-बसपा-कांग्रेस-आरएलडी क्या साथ आ सकेंगे. जैसे तमाम सवाल हैं जो मोदी लहर के खिलाफ विपक्षी एकजुटता पर सवाल खड़े करते हैं.

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4. मोदी विरोध के अलावा फैक्टर क्या होंगे?
महागठबंधन का कॉन्सेप्ट तो ठीक है लेकिन क्या ये महागठजोड़ सिर्फ मोदी फैक्टर के खिलाफ जनता के बीच जाएगा. ऐसे वक्त में जब हर चुनाव में मोदी नाम से बीजेपी जीत रही है ऐसे में सिर्फ की खिलाफत कितना वोट दिला पाएगी ये भी बड़ा सवाल होगा. इस फैक्टर पर खुद कांग्रेस को ही संदेह है. यूपी चुनाव के बाद कांग्रेस की अंदरूनी रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि हिंदुत्व के खिलाफ पार्टी की छवि और सिर्फ मोदी विरोधी दिखने के कारण पार्टी को हाल के चुनाव में नुकसान हुआ है. खुद राहुल गांधी पार्टी की रणनीति को नए सिरे से आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं. यहां तक कि आम आदमी पार्टी के बारे में भी खबर है कि वो भी मोदी विरोध की अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने लगी है.

5. जमीनी स्तर पर गठबंधन का कैसे तय होगा समीकरण?
महागठबंधन के नाम पर अगर ये दो दर्जन से ज्यादा पार्टियां एक हो भी जाती हैं तो इनके कार्यकर्ता कितने साथ आएंगे ये फैक्टर भी अहम होगा. यूपी में सपा-कांग्रेस ने मिलकर चुनाव तो लड़ा लेकिन कई सीटों पर दोनों दलों के उम्मीदवार मैदान में उतर गए. चुनाव में हार के तुरंत बाद कई उम्मीदवारों ने एक-दूसरे की पार्टियों पर भितरघात की आरोप लगाना शुरू कर दिया. ऐसा हाल ही अन्य राज्यों में भी होगा.

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