बिना कोषाध्यक्ष BJP: एक साल में 1,034 करोड़ चंदा पाने वाली पार्टी में कौन रखता है हिसाब-किताब?

बीजेपी ने वित्त वर्ष 2016-17 के लिए चुनाव आयोग में ऑडिट रिपोर्ट के जरिए 1,034 करोड़ रुपए चंदा मिलने की जानकारी दी. एक साल में इतने मोटे चंदे के साथ बीजेपी देश की सबसे रईस पार्टी बन गई. बीते साल की तुलना में इस साल बीजेपी के चंदे में 81 फीसदी की वृद्धि हुई.

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अमित शाह (फाइल फोटो) अमित शाह (फाइल फोटो)

हिमांशु मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 14 जून 2018,
  • अपडेटेड 9:19 PM IST

बीजेपी बेशक खुद को दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बताती हो, इस पार्टी को एक ही वित्त वर्ष में 1,034 करोड़ रुपये का चंदा मिला हो लेकिन हैरानी की बात है कि पार्टी के पास पिछले कुछ साल से कोषाध्यक्ष ही नहीं है.

किसी जमाने में सीताराम केसरी के कोषाध्यक्ष पद पर रहते एक जुमला बहुत सुनने को मिलता था, 'ना खाता, ना बही, जो केसरी कहें वही सही,' लेकिन आज की बीजेपी की बात करें तो क्या वो बिना कोषाध्यक्ष ही अपना काम चलाने में सक्षम है?

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शाह ने नहीं चुना कोषाध्यक्ष

दरअसल, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में केंद्र में एनडीए सरकार बनी तो गृह मंत्री के तौर पर राजनाथ सिंह ने जिम्मा संभाला. इससे पहले तक राजनाथ सिंह के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे. गृह मंत्री बनने के बाद राजनाथ सिंह ने बीजेपी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.

राजनाथ के पार्टी अध्यक्ष रहते बीजेपी के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी पीयूष गोयल के कंधों पर थी. गोयल ने भी मोदी सरकार में मंत्री बनने के पार्टी कोषाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. राजनाथ सिंह की जगह मोदी के खास सिपहसालार माने जाने वाले की बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी हुई. अमित शाह ने संगठन में अपनी नई टीम और कार्यकारिणी बनाई.

हालांकि उन्होंने कोषाध्यक्ष का पद खाली रखा. अमित शाह एक बार फिर से जनवरी 2016 में पार्टी के अध्यक्ष बने लेकिन इस बार उन्होंने अपनी नई टीम नहीं बनाई. यद्यपि उन्होंने संगठन में कुछ खाली पदों को जरूर भरा लेकिन कोषाध्यक्ष का पद खाली ही रहा.

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पिछले साल 81 फीसदी का इजाफा

बीजेपी ने वित्त वर्ष 2016-17 के लिए आयोग में ऑडिट रिपोर्ट के जरिए 1,034 करोड़ रुपए चंदा मिलने की जानकारी दी. एक साल में इतने मोटे चंदे के साथ बीजेपी देश की सबसे रईस पार्टी बन गई. बीते साल की तुलना में इस साल बीजेपी के चंदे में 81 फीसदी की वृद्धि हुई.

बीजेपी ने वित्त वर्ष 2016-17 के लिए चुनाव आयोग में जो ऑडिट रिपोर्ट जमा कराई उस पर कोषाध्यक्ष के स्थान पर ‘For’ लिखकर पार्टी के संगठन महासचिव रामलाल और चार्टर्ड अकाउंटेंट वेणी थापर हस्ताक्षर हैं.

हैरानी की बात है जिस पार्टी को एक साल में ही 1,034 करोड़ रुपये की आमदनी हो रही हो, उसके लिए कोषाध्यक्ष के बिना फंड कौन इकट्ठा कर रहा है? चुनाव आयोग पिछले तीन साल से बीजेपी की ऑडिट रिपोर्ट को कैसे स्वीकार कर रहा है?

चुनाव आयोग मांग सकता है रिपोर्ट

इस विषय पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी से 'आजतक' ने बात की. उनका इस विषय पर कहना था कि ऑडिट रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं इसलिए उस पर पार्टी के किसी जिम्मेदार पदाधिकारी के हस्ताक्षर होने चाहिए. कुरैशी के मुताबिक चुनाव आयोग संबंधित पार्टी से उस व्यक्ति की विस्तृत जानकारी मांग सकता है जिसने ऑडिट रिपोर्ट को दाखिल किया और प्रमाणित किया हो. अगर चुनाव आयोग को कोई गड़बड़ी लगती है तो वो संबंधित पार्टी के खिलाफ कार्रवाई भी कर सकता है.

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वहीं, बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि जिस नेता को पार्टी अध्यक्ष अधिकृत करते हैं उसी नेता के ऑडिट रिपोर्ट पर हस्ताक्षर होते हैं. ये हस्ताक्षर पार्टी की तरफ से ही होते हैं. शाहनवाज ने दावा किया कि बीजेपी नियम से चलने वाली पार्टी है और उसका रिकॉर्ड साफ सुथरा है.

शाहनवाज के मुताबिक जितनी पारदर्शिता बीजेपी बरतती है इतनी और कहीं देखने को नहीं मिलेगी. उन्होंने कहा कि हम चंदा लेते हैं तो रसीद देते हैं, हम आजीवन सहयोग निधि से पार्टी चलाते हैं. विपक्ष के आरोपों पर शाहनवाज ने कहा कि विपक्ष क्या कहता है, इससे क्या फर्क पड़ता है.

बहरहाल, अमित शाह के अध्यक्ष पद पर रहते बीजेपी का चुनाव दर चुनाव ग्राफ ऊंचा हुआ है बल्कि अकूत चंदा मिलने से पार्टी का खजाना भी बड़ा है. अब यह बड़ा सवाल जरूर है कि क्या चंदे का इतना बड़ा हिसाब किताब रखने के लिए पार्टी को कोषाध्यक्ष की भी जरूरत नहीं है?

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