AIMPLB का दावा- विधि आयोग ने माना 10 साल तक संभव नहीं समान नागरिक संहिता?

लॉ कमीशन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से सात बिंदुओं पर राय मांगी थी, जिनमें तीन तलाक और उत्तराधिकार जैसे पहलू भी शामिल थे.  मीटिंग में बोर्ड ने साफ कहा कि इस्लामिक कानून में कोई दखलअंदाजी वह स्वीकार नहीं करेंगे.

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AIMPLB ने लॉ कमीशन चेयरमैन को दिए सुझाव AIMPLB ने लॉ कमीशन चेयरमैन को दिए सुझाव

जावेद अख़्तर / संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 31 जुलाई 2018,
  • अपडेटेड 6:03 AM IST

समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) पर विधि आयोग राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक और धार्मिक संगठनों से सुझाव मांग रहा है. इसी क्रम में मंगलवार को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नुमाइंदों ने आयोग के चेयरमैन से मुलाकात कर अपना पक्ष रखा. मीटिंग के बाद बोर्ड के प्रतिनिधि ने दावा किया कि विधि आयोग ने अगले 10 साल तक देश में समान आचार संहिता लागू करने की संभावनाओं से इनकार किया है.

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विधि आयोग के चेयरमैन जस्टिस बलबीर सिंह चौहान से मुलाकात के बाद AIMPLB के उपाध्यक्ष मौलाना जलालुद्दीन उमरी ने 'आजतक' से खास बातचीत की. उन्होंने दावा किया कि लॉ कमीशन की तरफ से यह कहा गया कि मुस्लिमों से जुड़े कुछ मसलों को हिंदू अधिनियम के साथ तालमेल में लाया जाए. साथ ही विवाह और उत्तराधिकार अधिनियम के आदर्श पहलुओं को मुस्लिम पर्सनल लॉ में शामिल किया जाए. मौलाना ने कहा कि बोर्ड ने विधि आयोग के इन सुझावों को खारिज कर दिया.

आयोग की ओर से सात बिंदुओं पर बोर्ड की राय मांगी गई थी. जिनमें से पांच का जवाब बोर्ड ने दे दिया है, जबकि दो सवालों का जवाब शिया समुदाय से विचार-विमर्श के बाद देने की बात कही है.

तलाक पर हुई चर्चा

मीटिंग में तीन तलाक पर भी चर्चा हुई. बोर्ड की तरफ से कहा गया कि तीन तलाक के खिलाफ जो बिल लाया जा रहा है, उस पर केंद्र सरकार ने हमसे कोई सुझाव नहीं लिया है. बोर्ड ने विधि आयोग से स्पष्ट कहा, 'क्योंकि सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को अवैध बता चुका है, ऐसे में हम चाहते हैं कि केंद्र सरकार इस पर अब कोई कानून न बनाए.'

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10 साल तक कॉमन सिविल कोड नहीं

बातचीत के दौरान मौलाना उमरी ने बताया कि लॉ कमीशन ने यह साफ किया कि आने वाले 10 सालों तक समान आचार संहिता भारत में लागू नहीं की जा सकती है. हालांकि, बोर्ड ने विधि आयोग को बताया कि वह कभी भी कॉमन सिविल कोड लागू करने के पक्ष में नहीं है. बोर्ड का मानना है कि सभी धर्मों के लोगों को अपने पर्सनल लॉ पर अमल करने अधिकार है और इस पर कोई पाबंदी नहीं लगाई जानी चाहिए.

बोर्ड ने लॉ कमीशन से ये भी कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड नहीं चाहता कि कुरान और हदीस से जुड़े इस्लामिक कानून में कोई भी परिवर्तन किया जाए. बोर्ड के मुताबिक, यह कानून पवित्र है जिसे 1500 सालों से माना जा रहा है और हम किसी भी परिवर्तन को बर्दाश्त नहीं करेंगे.

बच्चा गोद लेने पर भी सवाल

लॉ कमीशन की तरफ से इस्लाम में बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया पर भी बोर्ड से सवाल किया गया. जिसके जवाब में बोर्ड ने बताया कि इस्लाम में बच्चा गोद लेने-देने का कोई सिस्टम नहीं है. बोर्ड ने कहा, 'कोई किसी के बच्चे को अपनी औलाद नहीं बता सकता है, साथ ही उसे संपत्ति में हिस्सा भी नहीं दे सकता है.' हालांकि, इस पर मौलान ये जरूर कहा कि किसी जरूरतमंद बच्चे की परवरिश और पढ़ाई लिखाई की जिम्मेदारी उठा सकते हैं. लेकिन बच्चे के बाप का नाम नहीं बदला जा सकता है. एक और मसले पर बोर्ड ने बताया कि अगर किसी औरत के पति की मौत हो जाती है और उनके पास पर्याप्त संसाधन हैं तो वह अपना खर्च खुद उठा सकती है. अगर ऐसा नहीं है तो फिर उसके मायके वालों की जिम्मेदारी होती है. बोर्ड ने ये भी कहा कि हम किसी दूसरे धर्म के तौर-तरीके इस्लाम में कबूल नहीं करेंगे.

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अंत में मौलाना ने ये भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति तीन तलाक की पीड़िता को धमकी देने का काम करता है या उसे नुकसान पहुंचाता है तो उस पर देश के कानून के तहत एक्शन लिया जाना चाहिए.

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