संसद में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सियासी गतिरोध जारी है. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ कांग्रेस ने आक्रमक रुख अख्तियार कर लिया है और उन्हें कुर्सी से हटाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है. लोकसभा स्पीकर के खिलाफ कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा महासचिव को दी है.
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिए जाने के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला अब लोकसभा की कार्यवाही का संचालन नहीं कर सकेंगे. लोकसभा में पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने किसी स्पीकर को हटाने के लिए अविश्वास लेकर आई है.
आजादी के बाद से यह चौथी बार है जब किसी लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की नोटिस दिया गया है. इससे पहले लोकसभा के तीन स्पीकरों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया गया था, लेकिन तक किसी लोकसभा स्पीकर को इस प्रक्रिया के तहत पद से नहीं हटाया जा सका है.
पहली बार कब आया अविश्वास प्रस्ताव
भारत की संसदीय इतिहास पर नजर डालें तो लोकसभा में स्पीकर के खिलाफ अब तक कुल चार बार प्रस्ताव लाया जा चुका है. पहला मामला 15 दिसंबर 1954 का है, जया देश के पहले लोकसभा स्पीकर जीवी मावलनकर के खिलाफ समाजवादी पार्टी के नेता विग्नेश्वर मिश्रा ने प्रस्ताव पेश किया था. हालांकि, लोकसभा द्वारा उसे अस्वीकृत कर दिया गया था, जिसके चलते जीवी मानलनकर अपने पद पर बने रहे थे.
1966 और 1987 में लाया गया प्रस्ताव
संसद में दूसरी बार लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए साठ के दशक में अविश्वास प्रस्ताव लगाया गया था. 24 नवंबर 1966 को तत्कालीन स्पीकर सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ समाजवादी नेता मधु लिमये द्वारा लाया गया था. हुकुम सिंह को स्पीकर के पद से हटाया नहीं जा सका.
लोकसभा स्पीकर के हटाने के लिए तीसरी बार 15 अप्रैल 1987 को तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ लाया गया, जिसे सीपीएम के सांसद सोमनाथ चटजी ने पेश किया था, लेकिन इस बार भी विपक्ष सफल नहीं रहा. अब चौथी बार ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव कांग्रेस लेकर आई है, जिसकी नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंप दी है. अब 14 दिन के बाद उसकी परीक्षण होगी.
कैसे स्पीकर को हटाया जा सकता है?
संसद में लोकसभा स्पीकर का पद निष्पक्षता, संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक संतुलन का प्रतीक माना जाता है, लेकिन जब स्पीकर की भूमिका पर सवाल उठते है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की एक तय संवैधानिक प्रक्रिया भी मौजूद है. संविधान के मुताबिक अगर संसद के किसी भी सदन के अंदर सभापति या फिर उपसभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आता है और स्वीकार कर लिया जाता है तो सदन की अध्यक्षता फिर वो नहीं कर पाते हैं.
स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 94(e) और लोकसभा के नियमों में दर्ज है. लोकसभा का कोई भी सदस्य स्पीकर को हटाने के लिए लिखित रूप में लोकसभा के सेक्रेटरी जनरल को नोटिस दे सकता है. सामान्य तौर पर दो लोकसभा सांसद मिलकर यह नोटिस देते हैं.
अविश्वास प्रस्ताव की नोटिस में स्पीकर के खिलाफ कार्रवाई के कारणों को स्पष्ट सटीक और ठोस आरोपों (स्पेसिफिक चार्ज) के रूप में दर्ज करना अनिवार्य होता है. स्पीकर के खिलाफ नोटिस देने के बाद लोकसभा अध्यक्ष खुद को संसद की कार्यवाही से अलग कर लेता है.
नोटिस मिलने की तारीख से कम से कम 14 दिन बाद किसी दिन सदन की कार्यसूची में शामिल किया जाता है. इसके बाद सदन में प्रस्ताव रखा जाता है और इसके समर्थन में कम से कम 50 सांसदों का खड़े होना जरूरी होता है. आवश्यक समर्थन मिल जाता है, तो प्रस्ताव पर सदन में बहस होती है और इसके बाद वोटिंग कराई जाती है. बहुमत से प्रस्ताव पारित होने की स्थिति में ही स्पीकर को पद से हटाया जा सकता है.
कुबूल अहमद