'मुझे घर ले चलो....'. यह शायद वही भावना थी, जो इस महीने अपने ससुराल में मृत पाई गईं तीन युवतियों ट्विशा शर्मा, दीपिका नागर और पलक रंजन के आखिरी दिनों में उनके मन में चल रही थी. दहेज की मांग, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के आरोपों के बीच इन तीनों की मौत ने एक बार फिर भारतीय समाज में दहेज प्रथा, महिलाओं की सामाजिक स्थिति और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
भोपाल की ट्विशा शर्मा, नोएडा की दीपिका नागर और ग्वालियर की पलक रंजन अपने मायके वापस नहीं लौट सकीं. तीनों मामलों में परिवारों ने आरोप लगाया कि ससुराल पक्ष लगातार पैसे, महंगे उपहार और दहेज की मांग को लेकर उनकी बेटियों को प्रताड़ित कर रहा था. समाज में दहेज को अब 'गिफ्ट' और 'भव्य शादी' के नाम पर सामान्य बना दिया गया है, जबकि तलाक आज भी कलंक माना जाता है.
2024 में देशभर में 5,737 दहेज हत्याएं दर्ज हुईं
NCRB के ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024 में देशभर में 5,737 दहेज हत्याएं दर्ज हुईं. यानी हर दिन औसतन 16 महिलाओं की मौत दहेज के कारण हुई. हालांकि यह संख्या 2023 के 6,156 मामलों से कम है, लेकिन अब भी हर महीने करीब 478 महिलाओं की जान जा रही है.
इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80, जो पहले आईपीसी की धारा 304B थी, के तहत देशभर की अदालतों में 59,446 मामले लंबित हैं. इन मामलों में दोषसिद्धि दर केवल 46 प्रतिशत के आसपास है.
ट्विशा, दीपिका और पलक की कहानियां अलग-अलग शहरों की जरूर हैं, लेकिन दर्द लगभग एक जैसा है. भोपाल में ट्विशा शर्मा 12 मई को शादी के महज पांच महीने बाद अपने ससुराल में फंदे से लटकी मिलीं. उसी दिन ग्वालियर में पलक रंजन ने शादी के करीब एक साल बाद आत्महत्या कर ली. वहीं 17 मई को ग्रेटर नोएडा में दीपिका नागर की मौत हुई, जिसने कथित तौर पर अपने ससुराल की इमारत से छलांग लगा दी थी.
मौत से पहले ट्विशा ने परिवार से किया था संपर्क
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्विशा शर्मा अपनी मौत से कुछ घंटे पहले तक परिवार के संपर्क में थीं और उन्हें घर ले जाने की गुहार लगा रही थीं. सोशल मीडिया पर वायरल कथित चैट्स में उन्होंने अपनी मां से परेशानियों का जिक्र किया था.
दीपिका ने रोते हुए पिता को किया था फोन
दीपिका नागर के पिता संजीव नागर ने पुलिस शिकायत में कहा कि 17 मई की दोपहर उनकी बेटी का रोते हुए फोन आया था. उसने बताया था कि दहेज की मांग को लेकर उसके साथ मारपीट की जा रही है. उसी दिन उसकी मौत हो गई.
पलक ने मौत से भाई को किया कॉल
वहीं 21 वर्षीय इंस्टाग्राम कंटेंट क्रिएटर पलक रंजन ने कथित तौर पर मौत से करीब आधे घंटे पहले अपने भाई को फोन किया था. इससे पहले वह सोशल मीडिया पर मानसिक तनाव और भावनात्मक टूटन से जुड़े कई वीडियो साझा कर रही थीं.
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक दबाव महिलाओं को रिश्तों से बाहर निकलने से रोकता है. मुंबई के नरसी मोनजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज में फॉरेंसिक साइकोलॉजी की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीप्ति पुराणिक कहती हैं कि महिलाओं को बचपन से ही यह सिखाया जाता है कि शादी परिवार की प्रतिष्ठा से जुड़ी होती है. ऐसे में आर्थिक रूप से सक्षम होने के बावजूद महिलाएं मानसिक रूप से खुद को रिश्ते से बाहर निकलने के लिए स्वतंत्र नहीं मान पातीं.
उन्होंने कहा, 'महिलाएं सोचती हैं कि क्या समाज उन्हें स्वीकार करेगा? क्या परिवार उनका साथ देगा? कई बार बच्चे और परिवार की जिम्मेदारियां भी उन्हें फैसले लेने से रोकती हैं.'
क्या कहते हैं जानकार?
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील सीमा कुशवाहा, जिन्होंने 2012 के निर्भया केस में पीड़िता के परिवार का पक्ष रखा था, उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में आज भी तलाक और दोबारा शादी को सहज रूप से स्वीकार नहीं किया जाता. माता-पिता अक्सर बेटियों से हर हाल में शादी बचाने की उम्मीद करते हैं.
बॉम्बे हाईकोर्ट की अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता आभा सिंह ने कहा कि दहेज अब नए रूपों में सामने आ रहा है. पांच सितारा शादियां, डेस्टिनेशन वेडिंग, मेहमानों के लिए चार्टर्ड फ्लाइट जैसी चीजें अब स्टेटस सिंबल बन चुकी हैं और इन्हें समाज सामान्य मानने लगा है.
उन्होंने कहा कि कम दोषसिद्धि दर अपराधियों का मनोबल बढ़ाती है. कई मामलों में फॉरेंसिक जांच कमजोर होती है, सबूत सही तरीके से इकट्ठा नहीं किए जाते और लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण परिवार भी केस वापस लेने लगते हैं.
आभा सिंह ने कहा, 'कई बार बच्चों की जिम्मेदारी को देखते हुए लड़की के परिवार वाले केस वापस ले लेते हैं. वहीं अगर चार्जशीट मजबूत नहीं होती तो बचाव पक्ष आसानी से सवाल खड़े कर देता है.'
किरण बेदी ने क्या कहा?
पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी ने कहा कि ऐसे मामलों में फॉरेंसिक जांच बेहद अहम होती है. उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम, ब्लड टेस्ट और अन्य वैज्ञानिक जांच निष्पक्ष और गहराई से होनी चाहिए. यदि किसी मामले में स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकलता, तो अदालत के सामने सभी साक्ष्य रखकर न्यायिक फैसला लिया जाना जरूरी है.
इन तीनों मौतों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कानून होने के बावजूद महिलाएं सुरक्षित क्यों नहीं हैं? क्या सामाजिक सोच और न्याय व्यवस्था की धीमी रफ्तार महिलाओं को न्याय मिलने से रोक रही है? और सबसे बड़ा सवाल आखिर बेटियां अपने ही घरों में कब सुरक्षित महसूस करेंगी?
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