'कई मंदिरों में शराब भी चढ़ती है तो क्या कोर्ट मना करेगा', सबरीमाला की बहस में उठा सवाल

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने मंदिरों में धार्मिक प्रथाओं, महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा पर बहस की. केंद्र सरकार ने बताया कि धार्मिक प्रथाओं का आकलन समुदाय के भीतर होना चाहिए और न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए.

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सबरीमाला मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है सबरीमाला मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है

अनीषा माथुर

  • नई दिल्ली,
  • 09 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 7:18 PM IST

केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला केस की सुनवाई के दौरान भारत के मंदिरों में रीतियों और परंपराओं के बारे में बात की. एएसजी नटराज ने कहा, दक्षिण भारतीय मंदिरों में प्रसाद के रूप में शराब भी दी जाती है. कल को आप इस पर यह आपत्ति नहीं उठा सकते कि शराब न दी जाए.

सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की बुधवार को लगातार तीसरे दिन सुनवाई की. इसमें विभिन्न धर्मों में प्रचलित धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरे पर भी विचार किया जा रहा है.

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शाकाहारी मंदिरों में मांसाहारी भोजन की मांग जायज?
एएसजी नटराज ने कहा,  एक उदाहरण देता हूं, कई मंदिरों में शाकाहारी भोजन परोसा जाता है, और अगर कोई व्यक्ति अपनी पसंद पर कहता है कि वह मांसाहारी भोजन करना चाहता है, तो वह किसी खास संप्रदाय के पास जाकर यह नहीं कह सकता कि मेरा यह अधिकार है और मुझे यही परोसा जाना चाहिए. उसे उन श्रद्धालुओं के अधिकारों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है.

सबरीमाला पर पहले आया फैसला गलत धारणा पर आधारित- तुषार मेहता
इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलों को कन्क्लूड करते हुए कहा कि 'सबरीमाला पर दिया गया पहले दिया गया फैसला इस धारणा पर आधारित था कि पुरुषों को श्रेष्ठ और महिलाओं को निम्न माना जाता है. उन्होंने कहा कि यह धारणा सही नहीं है,

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क्योंकि देश में ऐसे कई मंदिर हैं जहां केवल महिलाओं को ही प्रवेश मिलता है, कहीं अविवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है, और यहां तक कि एक ऐसा मंदिर भी है जहां विवाहित पुरुषों को महिलाओं के वेश में ही प्रवेश मिलता है.

'सबरीमाला का मामला पुरुष प्रधान पूजा का नहीं'
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मामला 'पुरुष-प्रधान पूजा' का नहीं है. उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी दलीलें केवल संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 तक सीमित रखी हैं और मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण जैसे मुद्दों को नहीं छुआ है. इस पर मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने कहा कि अदालत फिलहाल केवल सात कानूनी प्रश्नों पर विचार कर रही है. इसके बाद सॉलिसिटर जनरल ने केंद्र सरकार की ओर से अपनी दलीलें समाप्त कीं.

क्या बोले एएसजी केएम नटराजन
इसके बाद अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) केएम नटराज ने केंद्र की ओर से दलीलें रखीं. उन्होंने कहा कि संविधान के तहत धार्मिक आचरण को नियंत्रित करने के लिए तीन-स्तरीय व्यवस्था मौजूद है. उन्होंने बताया कि अनुच्छेद 25 दो पहलुओं वाला अधिकार है—एक, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, और दूसरा, राज्य की उसे नियंत्रित करने की शक्ति. अनुच्छेद 25 और 26 को एक साथ (harmonise करके) समझना जरूरी है.

उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे बहुलतावादी समाज में “essential religious practice” (आवश्यक धार्मिक प्रथा) तय करना व्यावहारिक नहीं है. धार्मिक प्रथाओं का आकलन समुदाय के भीतर से होना चाहिए और न्यायिक समीक्षा की सीमा सीमित होनी चाहिए.

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‘सम्प्रदाय’ की व्याख्या पर बहस
एएसजी ने कहा कि देवता के अधिकार, भक्तों के अधिकार का अभिन्न हिस्सा हैं और अनुच्छेद 25(1) तथा 26 आपस में जुड़े हुए हैं. उन्होंने तर्क दिया कि “डिनॉमिनेशन” को पश्चिमी संदर्भ में नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के हिंदी अनुवाद में प्रयुक्त शब्द “धार्मिक सम्प्रदाय” के रूप में समझना चाहिए.

उनके अनुसार, “सम्प्रदाय” का अर्थ किसी औपचारिक संगठन से नहीं है, बल्कि ऐसे लोगों का समूह है जिनकी आस्था और विश्वास समान हो. इसमें किसी औपचारिक ढांचे या संरचना की आवश्यकता नहीं होती और यह अवधारणा काफी लचीली है. इस पर जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि क्या यह पश्चिमी अर्थ में “डिनॉमिनेशन” के बजाय केवल धार्मिक विश्वास का मामला है?

एएसजी ने जवाब दिया कि कोई भी समूह, यदि उसकी आस्था का समान है, तो उसे “सम्प्रदाय” माना जा सकता है चाहे वह औपचारिक रूप से संगठित हो या नहीं.

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि सम्प्रदाय प्राचीन काल से अस्तित्व में होते हैं, जबकि जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या नए सम्प्रदाय भी बन सकते हैं? जस्टिस नागरत्ना ने यह भी कहा कि हिंदू धर्म की विशेषता यह है कि इसमें मोक्ष प्राप्ति के कई मार्ग हैं. इस पर जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी की कि यह बात सभी धर्मों पर लागू होती है, जैसे कबीर ने कहा है कि भक्ति किसी भी मार्ग से आ सकती है.

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आस्था बनाम न्यायिक हस्तक्षेप पर सुनवाई के दौरान एएसजी ने तर्क दिया कि धार्मिक प्रथाओं, देवता की प्रकृति और आस्था की परिभाषा तय करने का अधिकार संबंधित सम्प्रदाय का होना चाहिए और इसमें बाहरी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि जब किसी प्रथा या सम्प्रदाय के अस्तित्व पर विवाद होता है, तो उसका समाधान न्यायालय ही करता है.

क्या कोई नास्तिक प्रथा को दे सकता है चुनौती
उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि क्या कोई नास्तिक व्यक्ति धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है। एएसजी का जवाब था कि नास्तिक सम्प्रदाय के बाहर है, उसे असहमति का अधिकार है, लेकिन वह धार्मिक प्रथाओं पर सवाल नहीं उठा सकता। इस पर अदालत ने पूछा कि क्या आस्तिकों के सामूहिक अधिकार, नास्तिक के अधिकार से ऊपर हैं.

बहुलता के मुद्दे पर एएसजी ने कहा कि भारत में धार्मिक प्रथाएं आस्था पर आधारित हैं और हर समुदाय की अपनी मान्यताएं हैं. हिंदू धर्म की विशेषता उसकी विविधता और बहुलता है, जहां किसी एक प्रथा को “अनिवार्य” नहीं माना जा सकता.

राज्य और न्यायालय की भूमिका पर चर्चा करते हुए कहा गया कि जब तक कोई प्रथा थोपे नहीं जाती, हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए. हालांकि संविधान के अनुच्छेद 25(2) और 26(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और सुधार के आधार पर राज्य हस्तक्षेप कर सकता है, जिसकी वैधता पर अंतिम फैसला न्यायालय करता है.

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