टोपी से इनकार, भगवा गमछा स्वीकार... नीतीश कुमार की परंपरा से अलग कदम, नई पहचान गढ़ रहे सम्राट चौधरी?

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के एक प्रतीकात्मक फैसले ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है, जहां छोटे इशारों को बड़े संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. टोपी से इनकार और भगवा गमछा स्वीकार करने के मामला सुर्खियों में है.

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बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इशारों में दिया बड़ा मैसेज (Photo: PTI) बिहार के नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने इशारों में दिया बड़ा मैसेज (Photo: PTI)

रोहित कुमार सिंह

  • पटना, बिहार,
  • 18 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 3:45 PM IST

बिहार में नई सरकार बनने के बाद नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी एक मामला सुर्खियों में आ गया है. एक बुजुर्ग मुस्लिम व्यक्ति ने उन्हें टोपी पहनाने की कोशिश की लेकिन उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया. उसके अगले ही दिन एक मुस्लिम नेता ने उन्हें भगवा रंग का गमछा पहनाया जो उन्होंने खुशी से स्वीकार किया. इन दो घटनाओं ने बिहार की राजनीति में एक बड़ी बहस छेड़ दी है.

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मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के घर पर जनता दरबार हो रहा था यानी आम लोग अपनी समस्याएं लेकर आ रहे थे. इस दौरान एक बुजुर्ग मुस्लिम शख्स उनसे मिलने आए. उन्होंने सम्मान के तौर पर मुख्यमंत्री को पारंपरिक मुस्लिम टोपी पहनाने की कोशिश की. 

सम्राट चौधरी ने उस बुजुर्ग का हाथ थाम लिया और बहुत शांत और सम्मानजनक तरीके से टोपी पहनने से मना कर दिया. यह पल बहुत शांत था लेकिन जैसे ही इसका वीडियो फैला, बिहार की राजनीति में हलचल मच गई.

शनिवार को क्या हुआ?

अगले ही दिन शनिवार को JDU के नेता और बिहार शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन सैयद अफजल अब्बास मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे. लेकिन इस बार उन्होंने टोपी नहीं बल्कि भगवा यानी केसरिया रंग का दुपट्टा लेकर आए. उन्होंने वो दुपट्टा सम्राट चौधरी को दिया और उन्होंने खुशी से उसे पहन लिया. यह भी खूब चर्चा में आया.

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यह दोनों घटनाएं मिलकर क्या कह रही हैं?

इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखें तो एक साफ संकेत निकलता है. एक तरफ मुस्लिम टोपी को विनम्रता से ठुकराया और दूसरी तरफ भगवा दुपट्टा खुशी से पहना. राजनीतिक जानकार इसे एक नए तरह की राजनीति का संकेत मान रहे हैं जो पहले की 'सबको साथ लेकर चलने' वाली नीति से अलग दिखती है.

नीतीश कुमार की राजनीति से यह कितना अलग है?

नीतीश कुमार ने बिहार में 20 सालों तक यह छवि बनाई थी कि वो हर धर्म और जाति के साथ हैं. टोपी पहनना उस छवि का हिस्सा था. सम्राट चौधरी का यह कदम उस पुरानी परंपरा से हटकर है. यह दिखाता है कि नई सरकार का अंदाज अलग होगा.

राजनीतिक विश्लेषक क्या कह रहे हैं?

जानकारों का कहना है कि सार्वजनिक जीवन में इशारे और प्रतीक बहुत मायने रखते हैं. नेता इन्हीं इशारों से अपनी छवि बनाते हैं और अलग-अलग समुदायों को संदेश देते हैं. सम्राट चौधरी का यह कदम उनकी निजी पसंद भी हो सकती है या यह एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है. बिहार जैसे संवेदनशील राज्य में इस सवाल का जवाब आने वाले दिनों में सामने आएगा.

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सम्राट चौधरी ने अभी तक क्या कहा?

अभी तक मुख्यमंत्री ने इस पूरे मामले पर कोई विस्तृत कोई बातचीत नहीं की है. लेकिन यह बहस बढ़ती जा रही है और पूरे बिहार में इन दो घटनाओं की खूब चर्चा हो रही है.

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बिहार में टोपी पहनने की राजनीति क्या है?

बिहार एक ऐसा राज्य है जहां जातियां और धर्म राजनीति में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं. यहां नेताओं के हर छोटे-बड़े काम और इशारे को बहुत ध्यान से देखा और समझा जाता है. पिछले 20 सालों में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अक्सर मुस्लिम टोपी पहने दिखते थे खासकर इफ्तार पार्टियों और अल्पसंख्यक समुदाय के कार्यक्रमों में. इसे सभी धर्मों को साथ लेकर चलने का संकेत माना जाता था.

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