महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम और एनसीपी के प्रमुख रहे अजित पवार का बुधवार सुबह प्लेन क्रैश में निधन हो गया. अजित पवार का विमान महाराष्ट्र के बारामती में लैंड करने की कोशिश कर रहा था, तभी यह हादसा हुआ. विमान में सवार सभी पांच लोगों की मौत हो गई है. अजित पवार का अंतिम संस्कार गुरुवार को बारामती के विद्या प्रतिष्ठान के मैदान पर होगा.
अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार की उंगली पकड़कर राजनीति में और उनके छत्रछाया में सियासी ककहरा सीखा, लेकिन समय के साथ वे खुद महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में उभर आए. पिछले 16 साल महाराष्ट्र में किसी की भी सरकार रही हो, लेकिन डिप्टी सीएम की कुर्सी अजित पवार के पास ही रही.
अजित पवार अपने 45 साल के राजनीतिक सफर में एक बार सांसद, 8 बार विधायक और छह बार डिप्टी सीएम रहे. यही नहीं महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा बजट पेश करने वाले वो वित्त मंत्री रहे हैं. महाराष्ट्र की राजनीति के सियासी धुरी माने जाते थे, जिसके चलते ही सीएम फडणवीस ने उन्हें अपने सियासी बैलेंस को बनाए रखने के लिए साथ मिला रखा था.
अजित पवार की राजनीतिक सफर
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार के पीढ़ी में उनके परिवार से कोई भी राजनीति में नहीं आया. शरद पवार के भाई अनंतराव के बेटे अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले के देओलाली प्रवरा में हुआ. शरद पवार के सियासत में सक्रिय होने की वजह से अजित पवार को बचपन से सियासी माहौल मिला. अजित पवार ने शरद पवार की उगली पकड़कर राजनीति में एंट्री की और अपने चाचा की छत्र-छाया में रहते हुए ही राजनीति का पाठ सीखा था.
साल 1982 में अजित पवार ने राजनीति में क़दम रखा, जब वे एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड में चुने गए.इसके बाद अजित पवार ने पलटकर नहीं देखा और दिन ब दिन सियासी बुलंदी छूते गए. 1991 में वे पुणे ज़िला सहकारी बैंक के चेयरमैन बने. अजित पवार साल 1991 में ही पहली बार बारामती से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए.
हालांकि, कुछ समय बाद उन्होंने अपने चाचा शरद पवार के लिए इसे खाली कर दिया. फिर इसी सीट पर उपचुनाव में शरद पवार जीते जो पीवी नरसिंहा राव की सरकार में रक्षा मंत्री बने. इसके बाद अजित पवार ने महाराष्ट्र की राजनीति में किस्मत आजमाने का फैसला किया और 1993 में पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े तो फिर कभी नहीं हारे.इसके बाद लगातार 8 बार विधायक रहे.
महाराष्ट्र में किसी भी सरकार, डिप्टी अजित पवार
अजित पवार ने साल 1993 और 1995 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की. इसके बाद से एनसीपी के टिकट पर चुनावी किस्मत आजमाते रहे और 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 में विधायक बने. जब उनके चाचा शरद पवार मुख्यमंत्री बने थे तो उन्हें मंत्री बनाया गया था. इस तरह से उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में खुद को स्थापित ही नहीं किया बल्कि अपनी पकड़ भी बनाई.
अजित पवार ने अपने 45 साल के सियासी सफर में एक बार सांसद और आठ बार विधायक रहे. उन्होंने खुद को महाराष्ट्र के राजनीति तक सीमित रखा. सरकार में रहते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण मंत्री पद संभालने का तजुर्बा है,उन्होंने राज्य सरकार में कृषि, ऊर्जा और योजना राज्य मंत्री के रूप में काम किया, उन्होंने सुधाकर नाइक की सरकार में कृषि और बिजली राज्य मंत्री के रूप में काम किया.
महाराष्ट्र में अजित पवार सबसे ज्यादा बार डिप्टीसीएम रहे. इस तरह से उन्होंने 6 बार महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. 2010 से 2012 के बीच अजित पहली बार उप मुख्यमंत्री बने.पृथ्वीराज चव्हाण की सरकार में दिसंबर 2012 से सितंबर 2014 तक उनका बतौर उप मुख्यमंत्री दूसरा कार्यकाल रहा. इसके बाद 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद अप्रत्याशित तरीक़े से अजित पवार भारतीय जनता पार्टी के साथ आए और तीसरी बार डिप्टी सीएम बने. हालांकि, दो दिन बाद ही डिप्टीसीएम पद से इस्तीफा दे दिया.
अजित पवार ने शरद पवार के साथ आ गए और उद्धव ठाकरे सरकार में उप मुख्यमंत्री बने.इसके बाद शिंदे ने शिवसेना से बगावत कर बीजेपी के साथ सरकार बनाई तो उसके एक साल बाद अजित पवार ने भी एनसीपी के 40 विधायकों के साथ महायुति में शामिल हो गए. 2023 में शिंदे के अगुवाई वाली सरकार में अजित पवार पांचवी बार डिप्टीसीएम बन गए. 2024 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अजित छठवीं बार उपमुख्यमंत्री बने. इस तरह 15 सालों में जो भी सरकारें बनी तो अजित पवार डिप्टीसीएम रहे.
अजित पवार जब सीएम बनते-बनते रह गए
महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार को बड़ा पद 1999 में मिला, जब वे विलासराव देशमुख के नेतृत्व वाली सरकार में सिंचाई मंत्री बने. साल 2004 में राजनीति मौका आया था जब अजित पवार मुख्यमंत्री बन सकते थे. लेकिन शरद पवार के सियासी समीकरणों के चलते अजित पवार के हाथों से सीएम की कुर्सी निकल गई थी.
2004 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर लड़ा था.कांग्रेस को 69 सीटें और एनसीपी को 71 सीटें मिलीं थी.कांग्रेस और एनसीपी के बीच के फॉर्मूले के मुताबिक मुख्यमंत्री का पद एनसीपी को जाना तय था. ऐसे में जब एनसीपी को मुख्यमंत्री पद मिलने की उम्मीद थी तो कांग्रेस के विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री बने.
एनसीपी को उस समय मुख्यमंत्री पद अघर मिला होता तो अजित पवार सीएम बन सकते थे. लेकिन कहा जाता है कि शरद पवार के कुछ राजनीतिक समझौतों और रणनीति के कारण, एनसीपी को मुख्यमंत्री का पद नहीं मिला. इसके बाद से फिर कभी मौका नहीं आया कि अजित पवार सीएम की कुर्सी तक पहुंच सके और फिर उन्हें डिप्टीसीएम की कुर्सी से ही संतोष करना पड़ा.
शरद पवार और अजित पवार के सियासी रिश्ते
शरद पवार और अजित पवार के रिश्ते सुप्रिया सुले के राजनीति में आने से पहले काफी बेहतर थे. अजित पवार को शरद पवार का सियासी उत्तराधिकारी तक माना जाता था, लेकिन सुप्रिया सुले के एंट्री के साथ ही गेम बदल गया. सियासी महात्वकंक्षा में अजित पवार ने अपने चाचा से अलग होने की राह चुनी. 2023 में अजित ने 40 विधायकों को अपने साथ मिलाकर एनसीपी की कमान अपने हाथ में ले ली.
2 जुलाई 2023 को अजित पवार ने चाचा शरद पवार से अलग होकर अपना अलग गुट बनाया और भाजपा-शिवसेना (एकनाथ शिंदे) के साथ महायुति गठबंधन में शामिल हो गए.इस फ़ैसले ने पारिवारिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर हलचल पैदा की. शरद पवार से अलग होकर अजित ने चुनाव आयोग से मूल एनसीपी का नाम और सिंबल हासिल किया. इसके बाद शरद पवार को एनसीपी (एससीपी) बनानी पड़ी. एनसीपी भले ही दो गुटों में बंट गई, लेकिन पवार परिवार के रिश्ते बने रहे.
महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव में भी एक ही परिवार के दोनों दलों ने कुछ इलाकों में साथ मिलकर चुनाव लड़ा. ऐसे में पवार परिवार के फिर से एक होने के कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन अचानक अजित पवार का निधन हो गया है. ऐसे में अब देखना होगा कि अजित पवार के बाद एनसीपी की कमान कौन संभालेगा, क्या फिर से परिवार एकजुट होगा?
कुबूल अहमद