फडणवीस-शिंदे का 'माइक्रो मैनेजमेंट' पड़ा भारी, जानिए साथ आने के बावजूद भी मुंबई क्यों नहीं बचा पाए ठाकरे ब्रदर्स

बीएमसी चुनाव में बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने मिलकर 114 का मैजिक फिगर पार कर लिया. 28 साल बाद ठाकरे परिवार सत्ता से बाहर हो गया. उद्धव और राज ठाकरे साथ आए, फिर भी मराठी वोटों को एकजुट नहीं कर सके. नतीजों ने दिखाया कि मुंबई की राजनीति और मराठी वोट समीकरण में बड़ा बदलाव आ चुका है.

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बीएमसी में बीजेपी-शिंदे की जीत ने ठाकरे का गढ़ मुंबई में ढहाया (Photo: PTI) बीएमसी में बीजेपी-शिंदे की जीत ने ठाकरे का गढ़ मुंबई में ढहाया (Photo: PTI)

अभिजीत करंडे

  • मुंबई,
  • 17 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:41 PM IST

महाराष्ट्र की राजनीति ने फिर एक बार करवट ली है और 28 साल बाद ठाकरे को सत्ता से परास्त कर दिया गया है. बीएमसी के चुनावों में बीजेपी ने शिंदे के साथ मिलकर बड़ी जीत हासिल की है. आंकड़े देखें तो बीजेपी को 89, शिंदे की शिवसेना को 29, ठाकरे की शिवसेना को 65 और मनसे को 6 सीटें मिली हैं.

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227 वॉर्ड की बीएमसी में 114 का मैजिक फिगर है, जो महायुति ने पार किया है. लेकिन सवाल यह है कि क्या शिवसेना और मनसे साथ आकर भी अपना जादू नहीं दिखा सके? क्यों ठाकरे भाई मिलकर भी मुंबई की सत्ता नहीं बचा पाए?

मुंबई में मराठी वोटों का क्या समीकरण है?

मुंबई में 36 विधानसभा क्षेत्रों में मिलकर 1 करोड़ से ज्यादा वोटर्स हैं. जो 227 वॉर्ड हैं, उनमें माना जाता है कि 140 से ज्यादा वॉर्ड्स में मराठी वोटर्स निर्णायक हैं. 40 से ज्यादा ऐसे वॉर्ड हैं जिनमें परप्रांतीय या हिंदी भाषा बोलने वाले लोग अधिक हैं. 40 ऐसे भी वॉर्ड्स हैं जहां मुस्लिम और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की संख्या अधिक है.

लेकिन 2017 के चुनाव में बीजेपी ने 82 सीटें जीती थीं और ठाकरे ने 84 सीटों पर झंडा लहराया था. बीजेपी ने जो 82 सीटें जीती थीं, उनमें परप्रांतीय या फिर हिंदी भाषा बोलने वाली ज्यादातर सीटें शामिल थीं. और 40 से ज्यादा सीटें उन्होंने मराठी भाषा बोलने वालों के दबदबे वाले इलाकों से जीती थीं. यानी ठाकरे का गढ़ पहले से ही, यानी 2017 में ही बीजेपी ने तोड़ दिया था.

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पार्टी टूटने से उद्धव को कितना नुकसान?

2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव को छोड़कर बीजेपी के साथ सरकार बनाई और सीएम भी बन गए. उनके साथ 40 विधायक और 13 सांसद भी जुड़ गए. उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में उद्धव ने महाविकास आघाड़ी के साथ मिलकर अच्छा करिश्मा दिखाया. लेकिन विधानसभा चुनाव में ‘बटेंगे तो कटेंगे’, यानी हिंदुत्व के मुद्दे पर शिंदे ने उन्हें पछाड़ दिया. 57 सीटों के साथ शिंदे फिर से बीजेपी के साथ सरकार में आए, लेकिन सीएम नहीं बन पाए. क्योंकि बीजेपी ने 132 सीटें जीतकर अपना परचम लहराया था.

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चुनाव शिंदे के नेतृत्व में लड़ने के बावजूद उन्हें सीएम नहीं बनाया गया, यह बात शिंदे ने अंडरलाइन कर दी थी. और आंकड़ों का महत्व भी सामने आया. आगे बीएमसी का चुनाव था और शिंदे बेहद सावधान थे. अगर उनके पास लड़ने के लिए उम्मीदवार नहीं रहते तो बीजेपी ज्यादा से ज्यादा सीटें अपने पाले में ले लेगी और उससे शिवसेना की ताकत पर असर पड़ेगा, यह शिंदे समझ चुके थे.

इसलिए सरकार में आते ही और उपमुख्यमंत्री बनने के बावजूद शिंदे ने उद्धव ठाकरे की सेना को फिर से तोड़ने का सिलसिला जारी रखा. शिंदे ने 2007, 2012 और 2017 का चुनाव लड़ चुके 120 से ज्यादा पार्षदों को अपने साथ लिया. जिनमें से 2017 का चुनाव जीत चुके और उद्धव के साथ रहे करीब 50 पार्षद शिंदे के साथ आ गए.

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शिंदे ने इसी के बलबूते पर बीजेपी से 90 सीटें अपने पाले में ली थीं. लेकिन 50 पार्षदों के साथ उद्धव का कैडर कुछ हद तक शिंदे के साथ जरूर गया, लेकिन उसका बहुत ज्यादा असर नहीं रहा. क्योंकि शिवसेना की ऑक्सीजन कही जाने वाली शिवसेना शाखाएं ठाकरे के साथ मजबूती से खड़ी रहीं. पार्षदों के साथ बड़े पैमाने पर कार्यकर्ता नहीं गए. यानी मुंबई में शिवसेना की नींव फिर भी पक्की रही. और इसी ताकत के साथ उद्धव मैदान में उतरे.

मराठी वोटों को मजबूत बनाने के लिए राज का साथ?

बीएमसी चुनाव में पहली बार मराठी अस्मिता और मराठी मानुष की बात करने वाली तीन पार्टियां मैदान में थीं. शिंदे की शिवसेना, ठाकरे की शिवसेना और राज की मनसे. लेकिन मनसे का प्रभाव उतना ज्यादा नहीं था. 2009 में मनसे का वोट शेयर 6.5 से 7 प्रतिशत तक रहा था, जो 2024 आते-आते 1.5 से 2 प्रतिशत तक नीचे आ गया.

लेकिन राज ठाकरे इसलिए भी जरूरी थे क्योंकि हर वॉर्ड में उनके कम से कम 2 से 3 हजार वोट थे. अगर उद्धव और राज साथ में नहीं आते तो इस टूट का फायदा शिंदे या फिर बीजेपी उठाती.

लोकसभा चुनाव में तो बीजेपी को बिना शर्त समर्थन देकर राज ने एक तरह से मदद की थी. फडणवीस के साथ उनके रिश्ते भी मधुर रहे. लेकिन विधानसभा चुनाव में राज के बेटे के लिए भी शिंदे ने दादर विधानसभा क्षेत्र नहीं छोड़ा, इसकी टीस उनके मन में थी.

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राज ने मुंबई में हिंदुत्व का ब्रांड एंबेसडर बनने की कोशिश भी की थी, लेकिन वह नाकाम रही. मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की उनकी मुहिम चर्चा में रही, लेकिन उससे उन्हें राजनीतिक तौर पर कोई फायदा नहीं हुआ. इससे एक बात साफ हो गई कि राज ठाकरे को लोग सिर्फ मराठी मुद्दे पर ही वोट देते हैं.

लेकिन जब राज ठाकरे की पार्टी पूरी तरह कमजोर थी और जब बीजेपी हिंदी भाषा का सूत्र महाराष्ट्र पर थोपने की कोशिश कर रही थी, तब राज के लिए बीजेपी या शिंदे सेना के साथ जाना बेहद कठिन था. और अकेले लड़ने लायक ताकत भी दिखाई नहीं दे रही थी. ऐसे में मराठी अस्मिता और मराठी मानुष की ताकत के लिए उद्धव के साथ आना ही राज के लिए एकमात्र विकल्प बचा था.

वहीं उद्धव के लिए भी राज का साथ मराठी वोटों की टूट रोकने के लिए जरूरी था. इसलिए दोनों ने साथ आकर मराठी वोटों पर निर्भर रहकर, मराठी के बलबूते पर ही चुनाव लड़ने पर सहमति बनाई.

पराजित होकर भी 72 सीटें मिलने के क्या मायने हैं?

उद्धव और राज ठाकरे साथ आकर आंकड़ों में कोई बड़ा करिश्मा नहीं दिखा सके. राज को 6 और उद्धव ठाकरे की शिवसेना को 65 सीटें मिलीं. वहीं कांग्रेस को 24 सीटें मिलीं. जबकि बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर 118 सीटें जीतकर बीएमसी की सत्ता हासिल की. हालांकि यह मैजिक फिगर से सिर्फ 4 सीटें ज्यादा हैं.

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दूसरी ओर ठाकरे और कांग्रेस मिलकर 100 के करीब पहुंच चुके हैं, जबकि शिंदे सिर्फ 29 सीटों पर ही सिमट गए.

अगर वोट शेयर की बात करें तो बीजेपी ने 135 सीटों पर चुनाव लड़कर 89 सीटें जीतीं और 45 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया. वहीं ठाकरे की शिवसेना को 27 प्रतिशत वोट मिले. एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 10 प्रतिशत और मनसे को 2.87 प्रतिशत वोट मिले.

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कई विश्लेषक उद्धव और राज ठाकरे के इस सीमित प्रदर्शन को अहम मानते हैं. क्योंकि शिवसेना शिंदे की वजह से टूटी और फिर शिंदे ने एक-एक कर नेताओं को तोड़कर उसे और कमजोर किया. शिंदे के पास बीजेपी का समर्थन, महाराष्ट्र और केंद्र में सत्ता, और संसाधनों की भरपूर ताकत थी. इसके बावजूद ठाकरे को मिली सीटें और अगर कांग्रेस को भी जोड़ दिया जाए तो यह साफ होता है कि मुंबई के मराठी लोगों ने ठाकरे का साथ दिया.

वहीं दूसरी ओर कई विश्लेषक यह भी कहते हैं कि मराठी वोटर्स अब सिर्फ ठाकरे की संपत्ति नहीं रहे. बीजेपी ने उसका बड़ा हिस्सा अपने साथ जोड़ लिया है. इसी वजह से दोनों का साथ भी कोई बड़ा जादू नहीं दिखा सका. राजनीति में सातत्य की कमी और हार्ड वर्क के अभाव के कारण ठाकरे को लोगों ने नकार दिया, ऐसा भी माना जा रहा है.

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