हरियाणा राज्यसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछ चुकी है. विधायकों की संख्या के आधार पर एक राज्यसभा सीट बीजेपी तो एक राज्यसभा सीट कांग्रेस आसानी से जीत सकती है, लेकिन बीजेपी दोनों ही सीटों पर चुनाव लड़ने की प्लानिंग कर रही है. बीजेपी की रणनीति है कि राज्यसभा चुनाव में किसी ऐसे उम्मीदवार को उतारा जाए, जिसके जरिए सियासी खेला किया जा सके?
बीजेपी अगर राज्यसभा चुनाव में दो उम्मीदवार उतारती है तो फिर कांग्रेस को चुनावी मुकाबला करना होगा. हरियाणा के राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के दो किस्से ऐसे हैं, जिसने कांग्रेस के पास नंबर गेम होते हुए भी जीत के उम्मीदों पर पानी फेर दिया था. दोनों ही बार कांग्रेस विधायकों के भीतरघात का नतीजा था. ऐसे में कांग्रेस क्या तीसरी बार भी भीतरघाट का शिकार होगी या फिर जीत का परचम फहराएगी?
हरियाणा में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 31 विधायकों का समर्थन चाहिए. राज्य की विधानसभा में 90 सदस्य हैं, जिनमें से बीजेपी के 48 विधायक हैं तो कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं. इसके अलावा दो विधायक इनेलो और तीन निर्दलीय विधायक हैं. इस लिहाज से कांग्रेस के लिए एक राज्यसभा सीट जीतना आसान लग रहा है. मगर पहले भी ऐसा हो चुका है, जब कांग्रेस के पास संख्याबल होने के बावजूद उसके प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा था.
2016 में 14 कांग्रेसी विधायक ने बिगाड़ दिया गेम
साल 2016 में हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों पर चुनाव हुए थे, जिसमें तीन प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे थे. बीजेपी की तरफ से चौधरी बीरेंद्र सिंह मैदान में थे तो कांग्रेस-इनेलो ने सुप्रीम कोर्ट के वकील आरके आनंद को मैदान में उतारा था. सुभाष चंद्रा निर्दलीय तौर पर राज्यसभा चुनाव में तीसरे उम्मीदावर थे, जिन्हें बीजेपी का समर्थन हासिल था.
बीजेपी के 47 विधायक थे जबकि कांग्रेस के 17 और इनेलो-अकाली दल के पास 20 विधायक थे. इस लिहाज से एक सीट बीजेपी और एक सीट विपक्ष को मिलनी थी. इसी समीकरण को देखते हुए कांग्रेस-इनेलो ने सुप्रीम कोर्ट के वकील आरके आनंद को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया था. आरके आनंद बकायदा दिल्ली में सोनिया गांधी से मिलने भी गए थे, जिसके बाद उनकी जीत तय मानी जा रही थी. निर्दलीय सुभाष चंद्र की जीत का कोई समीकरण नहीं बन रहा था.
राज्यसभा चुनाव की वोटिंग हुई तो सारा गेम ही बदल गया. कांग्रेस के 17 में से 14 विधायकों ने वोटिंग के दौरान गलत पेन का इस्तेमाल कर लिया, जिसके चलते उनके वोटों को अमान्य करार दे दिया गया, क्योंकि इनके बैलेट पेपर पर अलग रंग के पेन का इस्तेमाल हुआ था. इसका नतीजा ये हुआ कि दूसरी सीट पर बीजेपी समर्थित सुभाष चंद्रा जीत गए.
माना जाता है कि इनेलो ने एडवोकेट आरके आनंद को मैदान में उतारा जबकि कांग्रेस ने कोई ऑफिशियल प्रत्याशी नहीं उतारा था. ऐसे में कहा जाता है कि कांग्रेस का एक गुट आरके आनंद को समर्थन देने के लिए रजामंद नहीं था, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने समर्थन का फैसला कर लिया तो सियासी खेल करके उन्हें हरा दिया. तब पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने अपना वोट ही नहीं डाला था. ऐसे में सुभाष चंद्रा चुनाव जीत गए थे और बहुमत होते हुए भी आनंद को शिकस्त का सामना करना पड़ा था.
2022 में कांग्रेस विधायकों ने किया क्रॉस वोटिंग से खेला
साल 2022 में भी राज्यसभा की 2 सीटों पर चुनाव हुआ. विधायकों की संख्या के हिसाब से बीजेपी और कांग्रेस को एक-एक सीट मिलनी थी, लेकिन खेल हो गया. बीजेपी ने कृष्णलाल पंवार तो कांग्रेस हाईकमान ने अपने विश्वासपात्र अजय माकन को प्रत्याशी बनाया. पूर्व केंद्रीय मंत्री विनोद शर्मा ने अपने बेटे कार्तिकेय शर्मा को निर्दलीय कैंडिडेट के रूप में मैदान में उतार दिया, जिनको बीजेपी ने अपना समर्थन दे दिया. नंबर गेम में कार्तिकेट शर्मा के जीत की कोई भी उम्मीद नहीं थी, लेकिन कांग्रेस विधायकों के चलते ही सारा गेम बदल गया.
राज्यसभा चुनाव में वोटिंग के दौरान कांग्रेस के कुछ विधायकों ने अपने वोट बीजेपी एजेंट को दिखाए. कांग्रेस ने चुनाव आयोग से इन वोटों को रद्द करने की मांग की मगर वोट रद्द नहीं हुए. नतीजा निर्दलीय कार्तिकेय शर्मा जीत गए और कांग्रेस विधायकों की क्रॉस वोटिंग खुलकर सामने आई. किरण चौधरी और कुलदीप बिश्नोई ने अजय माकन के बजाय कार्तिकेय शर्मा को वोट कर दिया. एक सीट पर बीजेपी के कृष्ण लाल पंवार जीत थे. ऐसे में अजय माकन को करारी मात खानी पड़ी.
हरियाणा में क्या फिर भितरघात की लगेगी हैट्रिक?
हरियाणा में दो राज्यसभा सीटों पर 16 मार्च को चुनाव होने हैं, जिसे लेकर बीजेपी ने मंथन शुरू कर दिया है. बीजेपी ने कांग्रेस का गेम बिगाड़ने के लिए निर्दलीय प्रत्याशी को फिर से चुनाव लड़ने की तैयार में है. ऐसे में निर्दलीय मजबूत उम्मीदवार का समर्थन कर सकती है, लेकिन भाजपा ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं.
कांग्रेस भले ही अपने विधायकों की संख्या के बल पर बेफिक्र है. राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए चाहिए 31 वोट चाहिए. कांग्रेस के पास 37 विधायकों का समर्थन है, लेकिन गुटों में बंटी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा खतरा यह संख्या नहीं, अंदरूनी असंतोष है. राज्यसभा चुनाव का इतिहास बताता है कि पार्टी प्रत्याशी की हार वोटों से नहीं, क्रॉस वोटिंग से होती है.
कांग्रेस में इसी गुटबाजी को भाजपा भुनाना चाहती है. गुटबाजी से उलझ हरियाणा कांग्रेस के लिए दो सीटों पर होने जा रहे राज्यसभा चुनाव किसी चुनौती से कम नहीं है. भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी सैलजा किसके गुट के नेता को कांग्रेस मैदान में उतारती है. अब देखना है कि भितरघात की हैट्रिक लगती है या फिर जीत का स्वाद कांग्रेस चखती है?
कुबूल अहमद