दिल्ली सरकार के 'मंडे मेट्रो डे' का रियलिटी चेक: मंत्री-अफसर मेट्रो में, दफ्तर के बाहर गाड़ियों की कतार

दिल्ली सरकार के ‘मंडे मेट्रो डे’ अभियान का राजधानी में मिला-जुला असर देखने को मिला. कुछ अधिकारी और मंत्री मेट्रो और फीडर बस से सचिवालय पहुंचे, लेकिन बड़ी संख्या में कर्मचारी निजी वाहनों से ही आए. सरकार ने इसे स्वैच्छिक पहल बताया और कहा कि लोगों की अपनी मजबूरियां भी हो सकती हैं.

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दिल्ली सरकार की फ्यूल सेविंग पहल को मिला आंशिक समर्थन (Photo: PTI) दिल्ली सरकार की फ्यूल सेविंग पहल को मिला आंशिक समर्थन (Photo: PTI)

सुशांत मेहरा / अमरदीप कुमार

  • नई दिल्ली,
  • 18 मई 2026,
  • अपडेटेड 7:20 PM IST

दिल्ली सरकार ने एक नया अभियान शुरू किया है, नाम है ‘मंडे मेट्रो डे’. मतलब सरकार चाहती है कि लोग हफ्ते में कम से कम एक दिन, खासकर सोमवार को, अपनी निजी गाड़ी (कार या बाइक) छोड़कर मेट्रो या बस जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दफ्तर जाएं. मकसद है ईंधन बचाना, ट्रैफिक कम करना और प्रदूषण घटाना. लेकिन इस अभियान के पहले ही दिन दिल्ली में तस्वीर कुछ और ही दिखी.
 
यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद दिल्ली सरकार ने शुरू की. सोच यह है कि अगर लोग एक दिन भी मेट्रो. बस से जाने लगें, तो सड़कों पर गाड़ियां कम होंगी. पेट्रोल और डीजल की खपत कम होगी. ट्रैफिक जाम थोड़ा कम हो सकता है. हवा में धुआं और प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है.  

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सरकार ने यह नहीं कहा कि 'सबको ही करना है'. सरकार ने बस अपील की थी कि हफ्ते में एक दिन मेट्रो और पब्लिक ट्रांसपोर्ट को अपनाइए. इसे ही ‘मंडे मेट्रो डे’ कहा गया.

पहले दिन ग्राउंड पर क्या दिखा?

सोमवार को दिल्ली सचिवालय और आसपास के इलाके में हालात देखकर लगा कि अभियान का असर 'पूरी तरह' नहीं पड़ा. सचिवालय के बाहर दोनों तरफ बड़ी संख्या में कारें खड़ी दिखीं. कई गाड़ियों पर दिल्ली सचिवालय के स्टिकर भी लगे थे. इससे यह संकेत मिला कि अपील के बावजूद बहुत सारे अधिकारी और कर्मचारी अपनी निजी गाड़ियों से ही ऑफिस पहुंचे.

फिर भी कुछ लोग मेट्रो से पहुंचे
 
हालांकि यह भी हुआ कि कई वरिष्ठ अधिकारी, मंत्री और सचिव स्तर के अफसर मेट्रो और मेट्रो फीडर बस से दफ्तर पहुंचे. दिल्ली सरकार के सचिव धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि यह पहल 'अनूठी' है. उन्होंने बताया कि वे आमतौर पर मेट्रो से यात्रा करते हैं, और इस बार उन्होंने मेट्रो के साथ मेट्रो फीडर बस भी ली. 

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दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी मेट्रो से सफर किया. उनके साथ मंत्री रविंदर इंद्रजीत सिंह भी नजर आए.

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मेट्रो से यात्रा की (Photo: PTI)


मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की सचिव मधु तेवतिया भी मेट्रो फीडर बस से सचिवालय पहुंचीं. इसे सरकार की तरफ से अभियान को सपोर्ट करने के संकेत के तौर पर देखा गया.

मेट्रो फीडर बस का रोल क्या है?

कई बार समस्या यह होती है कि मेट्रो स्टेशन घर से दूर होता है, या मेट्रो स्टेशन से ऑफिस तक पहुंचना आसान नहीं होता. इसी 'लास्ट माइल' के लिए सरकार ने करीब 18 मेट्रो फीडर बसें चलाने की बात कही है. इन बसों का काम है. मेट्रो स्टेशन से सचिवालय और दूसरे सरकारी दफ्तरों तक कर्मचारियों को लाना-ले जाना.

लोगों ने निजी गाड़ियां क्यों लीं- सरकार ने क्या जवाब दिया?

इस पर दिल्ली सरकार के कैबिनेट मंत्री कपिल मिश्रा ने कहा कि सरकार ने सिर्फ अपील की थी, कोई जरूरी आदेश नहीं था. उन्होंने यह भी कहा कि कई कर्मचारियों की व्यावहारिक दिक्कतें हो सकती हैं, जैसे - कुछ लोगों के घर के पास मेट्रो की सुविधा नहीं है. कुछ को बहुत लंबा सफर करना पड़ता है. कुछ लोगों के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट से समय ज्यादा लग सकता है.  

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मंडे मेट्रो डे सफल रहा?

पहले दिन की तस्वीरों से यह साफ हुआ कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ाने की दिशा में शुरुआत जरूर हुई.  लेकिन दिल्ली में निजी गाड़ियों की आदत और निर्भरता कम करना अभी भी बड़ी चुनौती है. यानि अभियान चला तो है, कुछ लोगों ने अपनाया भी, लेकिन बड़ी संख्या में लोग अभी भी कार. बाइक से ही ऑफिस जा रहे हैं.

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