बस्ती का तालाब कैसे बना रामलीला मैदान? जेपी से लेकर अन्ना आंदोलन तक का गवाह, पढ़ें पूरा इतिहास

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल तीसरी बार दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे. दिल्ली के रामलीला मैदान में उनका शपथ ग्रहण समारोह है. जिस रामलीला मैदान में केजरीवाल शपथ लेंगे, वो कई  कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रह चुका है.

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दिल्ली का रामलीला मैदान (Photo-PTI) दिल्ली का रामलीला मैदान (Photo-PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 16 फरवरी 2020,
  • अपडेटेड 10:18 AM IST

  • कई ऐतिहासिक मौकों का गवाह रह चुका है रामलीला मैदान
  • आज तीसरी बार सीएम पद की शपथ लेंगे केजरीवाल

आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल आज तीसरी बार दिल्ली के रामलीला मैदान में शपथ लेंगे. दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी 62 सीट जीतकर फिर से राजधानी की सत्ता पर काबिज हुई है. जिस रामलीला मैदान में केजरीवाल शपथ लेंगे, वो कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रह चुका है.

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जेपी से लेकर अन्ना के आंदोलन का गवाह

किसी जमाने में बस्ती का तालाब के नाम से पहचाने जाने वाले रामलीला मैदान में इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ तक आ चुकी हैं. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना , भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अलावा इस मैदान ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण का वो ऐतिहासिक आंदोलन भी देखा है, जिसमें उन्होंने इंदिरा गांधी सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था. कांग्रेस सरकार के खिलाफ लोकपाल की मांग को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे ने भी इसी रामलीला मैदान में अनशन किया था.

कभी कहलाता था बस्ती का तालाब

दिल्ली की ऐतिहासिक यात्रा में रामलीला मैदान उसका हमसफर बना रहा. जहां आज बड़ी-बड़ी रैलियां होती हैं, यह रामलीला मैदान कभी एक बड़ा तालाब हुआ करता था. बताया जाता है कि इसके नजदीक कई बस्तियां हुआ करती थीं, जिसकी वजह से लोग इसे बस्ती का तालाब कहा करते थे.

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रामलीला मैदान, यूं मिला नाम 

इतिहासकार बताते हैं कि भारत के आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के लश्कर में हिंदू सैनियों की काफी आबादी थी. वे लोग लाल किले के पीछे यमुना की रेत पर रामलीला का आयोजन करते थे. इस तालाब के एक विशाल हिस्से को साल 1845 में समतल मैदान में तब्दील कर दिया गया. लेकिन सैनिक तब भी रामलीला का आयोजन करते रहे. इसी से इसका नाम रामलीला मैदान पड़ गया. 35 साल बाद साल 1880 में यह मैदान ब्रिटिश सैनिकों के पास आ गया और उन्होंने इसमें कैंप बना दिए. यहां ड्यूटी के बाद थके सैनिक आराम करते थे.

दिल्ली में जगह सिकुड़ी लेकिन मैदान नहीं

वक्त के साथ दिल्ली की आबादी बढ़ती गई और जगह सिकुड़ती गई. लेकिन दिल्ली के एक कोने में यह खुला मैदान वैसे ही खड़ा रहा. इसके बाद यह रैलियों, मंचन और जनसभाओं के लिए इस्तेमाल होने लगा. महात्मा गांधी, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू जैसे नेता भी यहां रैलियां कर चुके हैं. 1945 में मोहम्मद अली जिन्ना की रैली और 1952 में कश्मीर मसले पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सत्याग्रह का गवाह भी यह मैदान रहा है. 1956 और 57 में जवाहर लाल नेहरू ने भी यहां कई रैलियां की थीं. 28 जनवरी 1961 को इंग्लैंड की क्वीन एलिजाबेथ भी यहां जनसभा को संबोधित कर चुकी हैं.

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जब भर आई थीं नेहरू की आंखें

1962 में भारत-चीन युद्ध के एक साल बाद इस मैदान में एक कार्यक्रम का आयोजन  किया गया था, जिसमें मशहूर गायिका लता मंगेश्कर ने ऐ मेरे वतन के लोगों...गाया था, जिसे सुनकर नेहरू की आंखें भर आई थीं. 1965 में जब भारत-पाक युद्ध हुआ, तब पूर्व पीएम लाल बहादुर शास्त्री ने इसी रामलीला मैदान में जनसभा का आयोजन कर 'जय जवान, जय किसान' का नारा दोहराया था.

जेपी के आंदोलन का चश्मदीद

धार्मिक कार्यक्रमों, जनसभाओं, रैलियों के अलावा यह रामलीला मैदान लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का चश्मदीद रह चुका है. 1975 में इमरजेंसी के दौरान जेपी ने इंदिरा सरकार के खिलाफ इसी मैदान से हल्ला बोला था. तब इसी मैदान में 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' चारों ओर गूंज उठा था. 1977 में भी विपक्षी दलों ने यहां जनसभाएं आयोजित की थीं, इसमें अटल बिहारी वाजपेयी, जगजीवन राम, चंद्रशेखर, चौधरी चरण सिंह और मोरारजी देसाई एक साथ दिखाई दिए थे.

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