छत्तीसगढ़ का बस्तर, जो कभी देश में नक्सल हिंसा और सुरक्षा अभियानों का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था, अब राष्ट्रीय नीति और संघीय समन्वय की बड़ी बैठकों का मंच बन रहा है. आज बस्तर में 26वीं सेंट्रल जोनल काउंसिल की बैठक आयोजित रही है रही है, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री करेंगे. इस बैठक में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री , मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री , छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री सहित कई वरिष्ठ मंत्री और अधिकारी शामिल होंगे.
यह बैठक सिर्फ प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि इसके पीछे गृह मंत्रालय की एक व्यापक राजनीतिक, सुरक्षा और विकास रणनीति दिखाई दे रही है. बस्तर को इस आयोजन के लिए चुनना अपने आप में एक बड़ा संदेश माना जा रहा है. जैसा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि बस्तर को अगले 5 साल के भीतर देश के उन तमाम बड़े इलाकों जैसा विकसित किया जाएगा कि बस्तर में विकास की बयार बह रही है. इसी रणनीति का हिस्सा यहां पर सेंट्रल जोनल काउंसिल की बैठक करना भी शामिल है.
बस्तर ही क्यों?
आमतौर पर इस तरह की उच्चस्तरीय बैठकें राज्य की राजधानी या बड़े शहरों में आयोजित होती हैं. लेकिन केंद्र सरकार ने इस बार बस्तर को चुना है, जो वर्षों तक नक्सल हिंसा से प्रभावित रहा. गृह मंत्रालय इस बैठक के जरिए यह संदेश देना चाहता है कि नक्सलवाद यहां से खत्म हो चुका है. बस्तर अब केवल संघर्ष का इलाका नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श और विकास नीति का हिस्सा बन चुका है.
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केंद्र इस बैठक के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि जहां कभी सुरक्षा बलों पर हमले होते थे, वहां अब देश के बड़े मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री सुरक्षित वातावरण में बैठकर नीति निर्माण कर सकते हैं. यह एक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संदेश भी है कि बस्तर में अब सरकार की पकड़ मजबूत हुई है और नक्सलवाद अपने कमजोर चरण गुजर कर समाप्त हो चुका है.
गृह मंत्रालय की 'सुरक्षा से विकास' रणनीति
पिछले कुछ सालों में केंद्र सरकार ने बस्तर में दोहरी रणनीति अपनाई है. एक तरफ बड़े एंटी-नक्सल ऑपरेशन चलाए गए, वहीं दूसरी ओर सड़क, मोबाइल नेटवर्क, बैंकिंग, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया गया.
अब गृह मंत्रालय की कोशिश है कि बस्तर को 'सुरक्षा मॉडल' से आगे बढ़ाकर 'विकास मॉडल' के रूप में प्रस्तुत किया जाए. इसी रणनीति के तहत हाल के महीनों में जन जन सुविधा केंद्र जैसे मॉडल शुरू किए गए हैं, ताकि दूरदराज आदिवासी इलाकों तक शासन की सीधी पहुंच बनाई जा सके. सेंट्रल जोनल काउंसिल की बैठक उसी बदलती तस्वीर का राष्ट्रीय प्रदर्शन माना जा रही है.
बैठक में किन मुद्दों पर होगी चर्चा?
इस बैठक में केवल सुरक्षा मुद्दे ही नहीं बल्कि कई क्षेत्रीय और विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होगी. केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार बैठक में राज्यों के बीच सहयोग बढ़ाने, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की तेज जांच, फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट, ग्रामीण बैंकिंग कनेक्टिविटी और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली ERSS-112 जैसे विषयों पर चर्चा होगी.
इसके अलावा पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, शहरी विकास और सहकारी व्यवस्था को मजबूत करने जैसे मुद्दे भी एजेंडे में शामिल हैं. यह दर्शाता है कि केंद्र सरकार अब आंतरिक सुरक्षा को केवल पुलिस कार्रवाई के नजरिए से नहीं बल्कि समग्र विकास से जोड़कर देख रही है.
गृह मंत्री ने कहा कि आज बस्तर में शहीद वीर गुण्डाधुर सेवा डेरा प्रकल्प की शुरुआत हुई. उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में हमारे लगभग 200 CAPF कैंप हैं, ये 200 कैंप अब तक यहां के आदिवासियों, किसानों, बच्चों और महिलाओं की नक्सलियों से सुरक्षा का काम करते थे.
इन 200 में से 70 कैंप शहीद वीर गुण्डाधुर सेवा डेरा के नाम से जाने जाएंगे और इस क्षेत्र को विकसित करने का मॉडल बनेंगे. उन्होंने कहा कि यहां से 371 योजनाओं का काम ऑनलाइन हो सकेगा.
राशन कार्ड और आधार कार्ड जन सेवा केन्द्र से बन सकेगा, साथ ही सस्ता अनाज नहीं मिलने की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है, बैंक अकाउंट भी इस केन्द्र से ऑपरेट हो सकेगा. स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं उपलब्ध हो सकेंगी. यह डेयरी मिल्क कलेक्शन सेंटर का भी काम करेगा. अच्छी खेती करने के लिए कृषि विभाग का मार्गदर्शन भी मिलेगा. यहां कौशल विकास केंद्र ग्रामीणों के रोजगार का केंद्र बनेगा और वहीं प्रौढ़ शिक्षा का काम शुरू होगा.
उन्होंने कहा कि तीन महीने के भीतर हम एनआईडी के सहयोग से इसका पूरा नक्शा तैयार कर एक सम्पूर्ण विकास परियोजना शहीद वीर गुण्डाधुर सेवा डेरा के नाम से जमीन पर उतारने का काम करेंगे. इससे माओवादियों के समर्थक बुद्धिजीवियों को संदेश मिलेगा. उन्होंने कहा कि माओवाद इसलिए नहीं फैला था कि यहां विकास नहीं था, बल्कि यहां विकास नहीं होने का कारण ही हथियारबंद नक्सल अभियान था. अब हथियारबंद नक्सल अभियान समाप्त हो गया है.
क्या है सेंट्रल जोनल काउंसिल?
सेंट्रल जोनल काउंसिल देश के पांच जोनल काउंसिलों में से एक है. इसकी स्थापना 1956 के स्टेट्स रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट की धारा 15 से 22 के तहत की गई थी. इन जोनल काउंसिलों का उद्देश्य राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है. केंद्रीय गृह मंत्री इन परिषदों के अध्यक्ष होते हैं जबकि सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रशासक और वरिष्ठ मंत्री इसके सदस्य होते हैं.
हर साल सदस्य राज्यों में से एक मुख्यमंत्री उपाध्यक्ष की भूमिका निभाता है. परिषद के अंतर्गत मुख्य सचिव स्तर की स्थायी समिति भी बनाई गई है, जो पहले मुद्दों की समीक्षा करती है और फिर उन्हें परिषद की बैठक में रखा जाता है. पिछले 11 सालों में विभिन्न जोनल काउंसिलों और उनकी स्थायी समितियों की कुल 64 बैठकें हो चुकी हैं.
बस्तर में बैठक का बड़ा राजनीतिक संदेश
बस्तर में यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब केंद्र सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि देश में नक्सलवाद निर्णायक रूप से कमजोर हुआ है. गृह मंत्री अमित शाह कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुके हैं, सरकार नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है. ऐसे में बस्तर में चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी एक राजनीतिक संदेश भी देती है कि अब यह क्षेत्र लोकतांत्रिक प्रशासन और विकास की मुख्यधारा में लौट रहा है.
विशेषज्ञ मानते हैं कि केंद्र सरकार यह भी दिखाना चाहती है कि आदिवासी इलाकों को केवल सुरक्षा नजरिए से नहीं बल्कि राष्ट्रीय विकास भागीदार के रूप में देखा जा रहा है.
राज्यों के बीच सहयोग बढ़ाने की कोशिश
बैठक का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाना भी है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड जैसे राज्यों के सामने कानून-व्यवस्था, साइबर अपराध, महिला सुरक्षा, बैंकिंग पहुंच और ग्रामीण विकास जैसी कई साझा चुनौतियां हैं. गृह मंत्रालय चाहता है कि ये राज्य एक-दूसरे के सफल मॉडल साझा करें और साझा रणनीति पर काम करें. विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों की त्वरित जांच, फास्ट ट्रैक कोर्ट और इमरजेंसी रिस्पॉन्स सिस्टम जैसे मुद्दों पर राज्यों के बीच बेहतर तालमेल बनाने की कोशिश होगी.
प्रधानमंत्री मोदी के कोऑपरेटिव फेडरलिज्म मॉडल का हिस्सा
प्रधानमंत्री मोदी लगातार कोऑपरेटिव और कॉम्पिटिटिव फेडरलिज्म की बात करते रहे हैं. जोनल काउंसिल उसी सोच का हिस्सा हैं, जहां राज्यों और केंद्र के बीच संवाद के जरिए समस्याओं का समाधान खोजा जाता है. सरकार का मानना है कि मजबूत राज्य ही मजबूत राष्ट्र की नींव हैं. इसलिए जोनल काउंसिल राज्यों के बीच स्वस्थ सहयोग और बेहतर प्रशासनिक समन्वय का मंच बन रही हैं.
स्थानीय लोगों के लिए इसका क्या अर्थ?
बस्तर के लोगों के लिए यह बैठक केवल वीआईपी दौरा नहीं है. इससे इलाके के विकास, बुनियादी ढांचे और प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है. ऐसे आयोजनों के दौरान सड़क, सुरक्षा, संचार और सार्वजनिक सुविधाओं में तेजी से सुधार होता है. इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर बस्तर की सकारात्मक छवि भी बनती है, जिससे भविष्य में निवेश और पर्यटन की संभावनाएं बढ़ सकती हैं.
बस्तर में 26वीं सेंट्रल जोनल काउंसिल की बैठक केवल एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं बल्कि बदलते भारत की नई रणनीति का प्रतीक है. केंद्र सरकार इस आयोजन के जरिए यह संदेश देना चाहती है कि बस्तर अब भय, हिंसा और अलगाव की पहचान से आगे बढ़ चुका है.
अब यहां सुरक्षा के साथ विकास, शासन और राष्ट्रीय भागीदारी की नई कहानी लिखी जा रही है. अमित शाह और चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों की मौजूदगी यह स्पष्ट करती है कि गृह मंत्रालय बस्तर को केवल नक्सल विरोधी अभियान का केंद्र नहीं बल्कि नए भारत के विकास मॉडल के रूप में स्थापित करना चाहता है.
जितेंद्र बहादुर सिंह