क्या है ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन, जिसकी वजह से कोटा अस्पताल में मचा हड़कंप? जानें उसके बारे में कुछ

कोटा में प्रसूताओं की मौत के मामले की जांच के बीच बड़ा खुलासा हुआ है. न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल से लिए गए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का सैंपल फेल पाया गया है. ये इंजेक्शन क्या होता है, क्या काम आता है, इस बारे में जानेंगे.

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ऑक्सीटोसिन, हार्मोन इंजेक्शन है जो डिलीवरी के दौरान कई महिलाओं को दिया जाता है. (Photo: ITG) ऑक्सीटोसिन, हार्मोन इंजेक्शन है जो डिलीवरी के दौरान कई महिलाओं को दिया जाता है. (Photo: ITG)

आजतक हेल्थ डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 27 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:51 PM IST

कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में प्रसूताओं की मौत और तबीयत बिगड़ने का काफी बड़ा मामला सामने आया है. हॉस्पिटल से लिए गए 20 दवाइयों के सैंपल्स में से लाइफ-सेविंग ड्रग माना जाने वाला ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) हार्मोन इंजेक्शन (बैच नंबर 1-7881) फेल पाया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस इंजेक्शन में दवा का एक्टिव कंटेंट पूरी तरह गायब था यानी दवा की मात्रा शून्य के बराबर थी. हालांकि, राहत की बात यह है कि इंजेक्शन में किसी तरह का बैक्टीरियल इन्फेक्शन या संक्रमण नहीं मिला है लेकिन इसका बेअसर होना बेहद गंभीर माना जा रहा है. अब ऐसे में हर किसी के मन में सवाल है कि आखिर ये ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन क्या है, यह क्यों दिया जाता है और कैसे काम करता है? तो आइए इस बारे में विस्तार से जान लीजिए.

क्या है ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन?

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ऑक्सीटोसिन मूल रूप से एक नेचुरल हार्मोन है जो इंसानी शरीर में खुद-ब-खुद बनता है. यह हमारे मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस हिस्से में तैयार होता है और पिट्यूटरी ग्रंथि द्वारा ब्लड में रिलीज किया जाता है. इसे अक्सर लव हार्मोन या बॉन्डिंग हार्मोन भी कहा जाता है क्योंकि यह आपसी जुड़ाव और प्यार की भावनाओं को बढ़ाता है.

जब मेडिकल इमरजेंसी या डिलीवरी के वक्त शरीर में यह हार्मोन पर्याप्त मात्रा में नहीं बनता, तब डॉक्टरों को लैब में तैयार इसका सिंथेटिक रूप इंजेक्शन के जरिए देना पड़ता है जो डिलीवरी के वक्त महिलाओं के लिए बेहद जरूरी और लाइफ-सेविंग ड्रग माना जाता है.

क्यों जरूरी है ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन?

प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के समय यह इंजेक्शन 2 बेहद अहम वजहों से जरूरी होता है. पहला ये कि कई बार गर्भवती महिला की डिलीवरी का समय पूरा हो जाता है, लेकिन उसे नेचुरल रूप से लेबर पेन शुरू नहीं होता. ऐसे में बच्चे और मां दोनों की सुरक्षा के लिए डॉक्टर इस इंजेक्शन की मदद से दर्द शुरू करते हैं ताकि नॉर्मल डिलीवरी कराई जा सके.

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दूसरा कारण है कि कई महिलाओं को डिलीवरी के तुरंत बाद हैवी ब्लीडिंग का सबसे ज्यादा खतरा होता है. अगर यह खून का बहाव समय पर न रुके तो प्रसूता की जान भी जा सकती है. ऑक्सीटोसिन इस ब्लीडिंग को रोकने की सबसे मुख्य दवा है.

कैसे काम करता है ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन?

इस इंजेक्शन के काम करने का तरीका पूरी तरह से यूट्रस के मसल्स पर निर्भर करता है. जब ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन नस (IV) या मसल्स (IM) के जरिए महिला के शरीर में पहुंचाया जाता है तो यह यूट्रस की दीवारों में सिकुड़न पैदा करता है. इससे बच्चा धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसकता है और डिलीवरी का रास्ता आसान होता है.

वहीं जब डिलीवरी का समय आता है तो बच्चा होने के बाद गर्भाशय के अंदरूनी हिस्से से प्लेसेंटा अलग होता है जिससे वहां की खून की नसें खुली रह जाती हैं और तेजी से ब्लीडिंग होने लगती है. ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन यूट्रस मसल्स को इतनी मजबूती से सिकोड़ देता है कि वो खुली हुई नसें आपस में पकड़ बना लेती हैं जिससे खून का बहना तुरंत बंद हो जाता है.

कोटा के मामले में यही सबसे बड़ी चिंता की वजह है क्योंकि अगर ब्लीडिंग के वक्त महिलाओं को जीरो एक्टिव कंटेंट वाला इंजेक्शन दिया गया होगा, तो उसने काम ही नहीं किया होगा जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ गई होगी.

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क्या है कोटा मेडिकल कॉलेज का पूरा मामला?

ड्रग विभाग से मिले आंकड़ों के मुताबिक, पिछले करीब चार महीनों में इस प्रभावित बैच के लगभग 12,500 इंजेक्शन मरीजों को लगाए जा चुके हैं. अमृतसर की जैक्सन लैबोरेट्री प्राइवेट लिमिटेड द्वारा बनाए गए इस बैच के करीब 16 हजार इंजेक्शन कोटा के लोकल सप्लायर राजस्थान मेडिकल हॉल के जरिए मंगाए गए थे. इनमें से 10 हजार इंजेक्शन जेके लोन अस्पताल और 5 हजार न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजे गए थे. 

रिपोर्ट सामने आते ही औषधि नियंत्रण आयुक्तालय ने पूरे राजस्थान में इस बैच की बिक्री और इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगा दी है. विभाग ने छापेमारी कर 3,501 इंजेक्शन सीज कर दिए हैं और कंपनी व सप्लायर पर कोर्ट केस करने की तैयारी में है.

न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के अधीक्षक डॉ. आशुतोष शर्मा ने बताया कि यह इंजेक्शन मेडिकल कॉलेज की मंजूरी के बाद ही खरीदा गया था. यह डिलीवरी को आसान बनाने और उसके बाद होने वाले ब्लीडिंग को रोकने के लिए इस्तेमाल होता है. उन्होंने साफ किया कि सिजेरियन डिलीवरी या इलाज केवल एक इंजेक्शन पर निर्भर नहीं करता, डॉक्टर स्थिति देखकर बेस्ट फैसला लेते हैं. 

वहीं मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. नीलेश जैन ने कहा कि मरीज को इंजेक्शन कब लगा और उसकी क्लिनिकल प्रोग्रेस क्या रही, यह संबंधित गायनेकोलॉजिस्ट के क्लिनिकल जजमेंट का हिस्सा है, जिस पर वह टिप्पणी नहीं करेंगे.

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सहायक औषधि नियंत्रक देवेंद्र गर्ग का कहना है कि इंजेक्शन बेअसर होना गंभीर है. अगर प्रसव के दौरान ब्लीडिंग नहीं रुक रही थी, तो डॉक्टरों को इसके बेअसर होने का अंदाजा लगाकर तुरंत वैकल्पिक दवाओं या अन्य उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए था. हालांकि, लापरवाही तय करने का काम जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद ही होगा.

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