हिंसा और विवाद के बावजूद मणिपुर में क्यों बची है CM बीरेन सिंह की कुर्सी?

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर हिंसा की आग में लगभग तीन महीने से जल रहा है. इतनी हिंसा होने के बाद तमाम विपक्षी पार्टियां मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग पर अड़ी हैं. लेकिन न तो बीरेन सिंह खुद इस्तीफा दे रहे हैं और न ही बीजेपी उन्हें पद से हटा रही है. पर इसकी वजह क्या है? जानते हैं...

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मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह. (फाइल फोटो) मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह. (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 जुलाई 2023,
  • अपडेटेड 7:43 PM IST

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में हिंसा शुरू हुए लगभग तीन महीने होने वाले हैं, लेकिन यहां तनाव कम होने की बजाय लगातार बढ़ता ही जा रहा है. हाल ही में दो महिलाओं के साथ हुई अभद्रता और यौन हिंसा का वीडियो वायरल होने के बाद हालात और बिगड़ गए हैं. 

मणिपुर की उस घटना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की 'बेइज्जती' बताया. साथ ही उन्होंने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से अपील करते हुए कानून-व्यवस्था मजबूत करने की बात कही थी. 

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वहीं, मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने कहा था कि उनकी सरकार दोषियों को फांसी की सजा दिलवाने की कोशिश करेगी. 

मणिपुर में महिलाओं के साथ ज्यादती की घटनाएं सामने आने के बाद मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के इस्तीफे की मांग भी तेज हो गई है. नागा पीपुल्स फ्रंट का कहना है कि बीरेन सिंह को या तो इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर उन्हें बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए. हालांकि, इन सबके बावजूद न तो बीरेन सिंह इस्तीफा देने के मूड में हैं और न ही बीजेपी उनसे इस्तीफा मांग रही है. 

पर इसकी वजह क्या है?

- दरअसल, मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह भी उसी मैतेई समुदाय से आते हैं, जो बरसों से मणिपुर में अनुसूचित जनजाति का दर्जा मांग रहे हैं. 

- राज्य में मैतेई समुदाय की आबादी लगभग 53 फीसदी है. राज्य के 60 में से 40 विधायक भी मैतेई समुदाय से ही हैं. बीरेन सिंह की सियासी मजबूती की एक वजह ये भी है. 

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विदेश में खेलने वाले मणिपुर के पहले खिलाड़ी

- इनके बारे में कहा जाता है कि फुटबॉल और पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका जो प्रदर्शन रहा, वही उन्हें मुख्यमंत्री के पद तक ले गया. 

- बीरेन सिंह का लुवांगसांगबाम ममांग लइकै गांव में 1 जनवरी 1961 को हुआ था. राजनीति में आने से पहले बीरेन सिंह फुटबॉल के खिलाड़ी थे. वो मणिपुर के पहले खिलाड़ी हैं, जो विदेश में खेले हैं.

- बीरेन सिंह का डिफेंस कमाल का था. यही वजह रही 1981 में वो डुरंड कप जीतने वाली टीम के सदस्य रहे.

- बाद में उन्होंने एक स्थानीय अखबार में बतौर संपादक काम शुरू किया. पहले फुटबॉल खिलाड़ी और फिर पत्रकार के रूप में मणिपुर के लोगों के बीच वे काफी लोकप्रिय रहे.

ऐसे आए राजनीति में

- साल 1972 में मणिपुर अलग राज्य तो बन गया. लेकिन यहां अगले तीन दशकों तक राजनीतिक अस्थिरता हावी रही. यही वजह रही कि 30 साल में यहां 18 बार सरकारें बदल गईं.

- साल 2002 में बीरेन सिंह ने पहली बार डेमोक्रेटिक रिवॉल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी से चुनाव लड़ा और विधायक बने. 

- 2002 में कांग्रेस के इबोबी सिंह राज्य के मुख्यमंत्री बने. उनके सामने स्थिर सरकार चलाने की चुनौती थी. ऐसे में उनकी मदद की बीरेन सिंह ने. 2003 में बीरेन सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए. बीरेन सिंह कांग्रेस की सरकार में लगातार दो बार मंत्री रहे.

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इबोबी सिंह से बढ़ने लगीं दूरियां

- बीरेन सिंह की मदद से इबोबी सिंह एक के बाद एक तीन कार्यकाल पूरा कर सके. जब इबोबी सिंह का तीसरा कार्यकाल था, तो बीरेन सिंह से उनकी दूरियां बढ़ने लगीं.

- बीरेन सिंह और इबोबी सिंह के बीच मतभेद बढ़ने लगा. बीरेन सिंह की नाराजगी दूर करने के लिए उन्हें मणिपुर कांग्रेस का उपाध्यक्ष बना दिया गया. 

- 2012 में जब मणिपुर में तीसरी बार इबोबी सिंह की सरकार बनी तो उन्हें कैबिनेट में जगह नहीं मिली. इसने इन मतभेदों को और गहरा दिया.

ऐसे आए बीजेपी में

- बाद में असम और अरुणाचल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद उसकी नजरें मणिपुर पर थीं. लेकिन मणिपुर में बीजेपी के पास अपना कोई ऐसा चेहरा नहीं था, जो इबोबी सिंह को मात दे सके.

- बीजेपी की नजर बीरेन सिंह पर थी. बीजेपी अच्छे से जानती थी कि बीरेन सिंह ही ऐसे नेता हैं जो इबोबी सिंह की रग-रग से वाकिफ हैं. 

- आखिरकार अक्टूबर 2016 में बीरेन सिंह बीजेपी में शामिल हो गए. माना जाता है कि बीरेन सिंह को बीजेपी में लाने की जिम्मेदारी हिमंता बिस्वा सरमा को दी गई थी. उसकी वजह ये थी कि कांग्रेस के जमाने से ही दोनों में अच्छी दोस्ती थी.

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कांग्रेस से कम सीटें, लेकिन सरकार बनी बीजेपी की

- 2017 में मणिपुर में विधानसभा चुनाव हुए. ये बीरेन सिंह का ही कमाल था कि 2012 में एक भी सीट नहीं जीतने वाली बीजेपी इस बार 21 सीटों पर जीत गई.

- हालांकि, 60 सीटों वाली मणिपुर विधानसभा में सरकार बनाने के लिए कम से कम 31 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी. 

- 2017 में कांग्रेस ने 28 सीटें जीती थीं, लेकिन उससे कम सीटें होने के बावजूद बीजेपी ने सरकार बनाने का दावा ठोक दिया. 

- बीजेपी ने नागा पीपुल्स फ्रंट और नेशनल पीपुल्स पार्टी के अलावा छोटी-छोटी पार्टियों का समर्थन लिया और सरकार बना ली. 

- पांच साल तक गठबंधन सरकार चलाने के बाद 2022 के चुनाव में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया. 2022 में बीजेपी ने राज्य की 32 सीटें जीत लीं. 

 

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