ये हैं वो टॉप शार्ट फिल्में जो आपको जरूर देखनी चाहिए

बड़े बॉलीवुड स्टार्स की फिल्में तो आपने खूब देखी होंगी, पर क्या आपने इन बेहतरीन शार्ट फिल्म्स को देखा...

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तांडव के एक दृश्य में मनोज वाजपेयी तांडव के एक दृश्य में मनोज वाजपेयी

साकेत सिंह बघेल

  • नई दिल्ली,
  • 30 जनवरी 2017,
  • अपडेटेड 8:34 PM IST

जब भी फिल्म या उनके अवार्ड्स की बात होती है सारे लोगों का ध्यान बड़े सुपरस्टार्स और उनके फिल्मों तक ही सीमित रहता है. बहुत कम ही लोग ऐसे होते हैं जो छोटी बजट की फिल्म और शार्ट फिल्म्स को गौर कर पाते हैं.

 

हाल ही में 62 वें फिल्मफेयर अवार्ड को ऐलान किया गया. जहां बेस्ट शार्ट फिल्म का अवार्ड टिस्का चोपड़ा अभिनीत फिल्म 'चटनी' को गया और बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर मेल का अवार्ड मनोज वाजपेयी को फिल्म तांडव के लिए दिया गया. आईए बात करते हैं कुछ ऐसे ही शार्ट फिल्म्स के बारे में जो आपको देखनी चाहिए.

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1. चटनी:
टिस्का चोपड़ा अभिनीत इस फिल्म की प्रोड्यूसर भी टिस्का खुद ही हैं. इस शार्ट फिल्म की जान इसकी स्क्रिप्ट है. जो कई परतों में ढके होने के बावजूद बेहद सीधी और सपाट बात में तंज कसते हुए सामने आती है. कहानी का अंत जब सामने आता है तो आपको हैरान कर देता है. फिल्म के नाम की ही तरह फिल्म भी काफी छोटा सी है पर कहानी में बहुत तीखापन है.

2. तांडव:
मनोज वाजपेयी जैसे दिग्गज एक्टर 11 मिनट में क्या कमाल कर सकता है जानना हो तो तांडव देख लें. फिल्म में एक के साथ होने वाली एक कॉमन से प्रॉब्लम को दर्शाया गया है. देवाशीष माखिजा ने फिल्म को बेहतरीन ट्रीटमेंट और डायरेक्शन से सजाया है.


3. ममता टॉनिक:
इस ड्रामा फिक्शन फिल्म को श्रीनिवासन सुंदरराजन ने बनाया है. इस फिल्म को फिल्मफयर अवार्ड के लिए नॉमिनेट भी किया गया था. फिल्म में एक महिला है जो घर का बना हुआ टॉनिक बेचती है और टॉनिक के सहारे आपको वो महिला और कहानी दोनों ऐसी जगह पर लेकर पहूंच जाती है जहां से आपके पास सिर्फ वाह-वाह करने के सिवा और कुछ नहीं बचता.

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4. ट्यूबलाइट का चांद:
इस फिल्म को अनुराग कश्यप ने प्रोड्यूस किया है और लिखने और डायरेक्शन का काम ने किया है. फिल्म एक बच्चे की है जो कलकत्ता के सड़कों में पनाह लिए हुए होता है. अचानक एक दिन उसे चांद से प्यार हो जाता है. फिर क्या होता है जानने के लिए इस फिल्म को देखना होगा.


5. बायपास:
इरफान खान और नवाजुद्दीन सिद्दीकी जैसे दिग्गज स्टार्स से सजे इस फिल्म का डायरेक्शन ने किया था. फिल्म में कोई सबटाईटल या डॉयलॉग नहीं पर बेहतरीन सिनेमैटोग्राफी और एक्टर्स की बेहतरीन एक्टिंग उसकी जरुरत महसूस भी नहीं होती. ये फिल्म 2003 में बनाई गई थी जब दोनों ही ऐक्टर्स अपनी पहचान के लिए स्ट्रगल कर रहे थे.

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