साल 2009 में रिलीज हुई 'कुर्बान' फिल्म का एक पावरफुल सीन इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. सैफ अली खान और विवेक ओबेरॉय के बीच हुई बातचीत महज फिल्मी डिस्कशन नहीं, बल्कि एक तीखा टकराव है. एक ऐसी बहस जो आतंकवाद की परिभाषा, वैश्विक राजनीति और दोहरे मानदंडों पर सीधे सवाल उठाती है. फिल्म में करीना कपूर भी अहम भूमिका में थीं.
हाल ही में अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद जो टकराव शुरू हुआ है, उसके बीच इस फिल्मी सीन की चर्चा अचानक बढ़ गई है. सोशल मीडिया पर लोग इसे शेयर कर रहे हैं और आतंकवाद की परिभाषा को लेकर फिर से बहस छिड़ गई है.
सैफ-विवेक ने समझाई रणनीति
कुर्बान फिल्म में सैफ अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं, तो वहीं विवेक ओबेरॉय- स्टूडेंट हैं. जब सैफ अपने स्टूडेंट्स को आतंकवाद पर लेक्चर दे रहे होते हैं तो विवेक समझाते हैं कि कैसे अमेरिका ने भी समय-समय पर आतंकवाद का फायदा उठाया है. कैसे तालिबान- जिसे सब आतंकी के तौर पर जानते हैं, उसका निर्माण भी गोरे लोगों ने अपने फायदे के लिए किया था.
इस सीन को वायरल कर यूजर्स कह रहे हैं कि- जब बॉलीवुड में खुलेआम मिडल ईस्ट और यूएस के मूव पर चर्चा होती थी.
आतंकवाद की डेफिनेशन पर सवाल
ध्यान से समझें तो, इस सीन में सीधा सवाल उठाया गया है कि क्या आतंकवाद की परिभाषा सबके लिए एक जैसी है? अक्सर देखा जाता है कि जब बड़ी ताकतें लोकतंत्र या सुरक्षा के नाम पर किसी देश में सैन्य कार्रवाई करती हैं, तो उसे ‘रणनीतिक कदम’ या ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ बताया जाता है. लेकिन अगर वैसी ही हिंसा कोई और देश या संगठन करे, तो उसे तुरंत ‘आतंकवाद’ कह दिया जाता है.
सीन ये इशारा भी करता है कि इन परिभाषाओं के पीछे इस्लामोफोबिया और राजनीतिक फायदे जैसी बातें भी काम कर सकती हैं. सवाल ये है कि क्या आतंकवाद की परिभाषा सच में निष्पक्ष है, या फिर ताकतवर देशों के हिसाब से बदल जाती है?
सोशल मीडिया पर तेज बहस
यूनाइटेड स्टेट्स-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच लोग इस सीन को मौजूदा हालात से जोड़कर देख रहे हैं. कुछ इसे अपने समय से आगे की सोच बता रहे हैं, तो कुछ इसे एक साहसी राजनीतिक बयान मान रहे हैं.
करीब 15 साल पुरानी इस फिल्म का ये सीन एक बार फिर याद दिला रहा है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं होता, बल्कि समाज और राजनीति पर सवाल उठाने का भी एक मजबूत जरिया है. आतंकवाद, राष्ट्रवाद और वैश्विक राजनीति जैसे मुद्दों पर खुलकर बातचीत आज भी उतनी ही जरूरी है.
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