सैफ अली खान की नेटफ्लिक्स फिल्म 'कर्तव्य' पर इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है. मगर इस चर्चा का फोकस ज्यादातर एक ही कलाकार तक सीमित है, जिसने पत्रकारिता से एक्टिंग में कदम रखा है. अधिकतर लोग यही शिकायत करते दिख रहे हैं कि कैसे इस एक परफॉरमेंस ने फिल्म का पूरा मजा खराब कर दिया है. लेकिन कर्तव्य की ये एक दिक्कत असल में उस पूरे गड़बड़ डिजाइन की वजह से है, जो इस फिल्म में छुपा है.
हार्ड-हिटिंग कहानी बनाने में ईमानदारी की कमी
दिल्ली में अक्सर ऐसे नॉन-हरियाणवी लोग मिलते हैं, जो बस-मेट्रो-सरकारी दफ्तरों में हरियाणवी एक्सेंट उगलने की धुआंधार नाकाम कोशिश करते हैं. कर्तव्य के पूरे रनटाइम में ये दिक्कत कॉमन है. इंस्पेक्टर पवन मलिक (सैफ) के पहले सीन से ही हरियाणवी बोलने में लग रहा एफ़र्ट दिखाई देने लगता है. एक सीन में वो 'दीपक कहां है' को हरियाणवी बोलने की कोशिश में 'दिप्पक खां ए' टाइप कुछ बोलते हैं, तो बहुत खटकता है. शायद फिल्म की राइटिंग टीम को ये पता ही नहीं कि ये किरदार लोकल हरियाणवी में इसे 'दीपक कित है?' बोलेगा.
ये बात सिर्फ गलत भाषा या गलत एक्सेंट की नहीं है. ये बात उस क्रिएटिव चॉइस की है, जो फिल्म का ट्रीटमेंट तय करती है. कर्तव्य का लीड किरदार पवन पूरी फिल्म में इस गलत एक्सेंट को एक खास तरह से छाती फुलाकर, तेज टोन में लगभग चिल्लाने की तरह दोहराता रहता है. दूसरी जात की जिस लड़की के साथ पवन का भाई दीपक भागा है, उसका भाई अमर भी इसी तरह बात करता नजर आता है. ये किरदार 'पंचायत' में बनराकस का मशहूर रोल निभा चुके दुर्गेश कुमार को दिया गया है. केवल सीनियर एक्टर्स जाकिर हुसैन और संजय मिश्रा के काम में ये गलती थोड़ी कम दिखाई देती है. हालांकि, कहीं-कहीं इन दोनों के काम में भी ये गड़बड़ नजर आ जाती है.
कर्तव्य के किरदार अपनी बोली-भाषा से हरियाणवी होने की कोशिश तो करते हैं, मगर इस फिल्म में कहीं गलती से भी किसी रियल लोकेशन का नाम आपको नहीं सुनाई देगा. ये पूरा डिजाइन फिल्म को कहीं भी ऑथेन्टिक नहीं लगने देता.
चौंका देने की कोशिश में, गंभीरता से समझौता
एक धर्मगुरु के चरणों में अपना दिमाग रख चुके समाज में कैसे पिता अपने ही बेटों को मारने के लिए तैयार रहते हैं, ये कहानी ट्रीटमेंट में गंभीरता चाहती थी. इस कहानी को स्क्रीन पर ऐसा माहौल बनाना चाहिए था कि जहां डायलॉग नहीं हैं, वहां भी आपका ध्यान न टूटे. लेकिन कर्तव्य आपको हर मिनट कुछ नया करतब दिखाने की जल्दी में लगती है. इस जल्दी में सीन्स बहुत आर्टिफिशियल तरीके से स्टेज्ड लगते हैं.
इसका इरादा कुछ शॉकिंग कर देने का है. इसकी कोशिश 'पाताल लोक' जैसा कुछ क्रांतिकारी कर डालने की है. मगर कर्तव्य इसके लिए कहानी से ईमानदारी नहीं बरतना चाहती. कर्तव्य इस समस्या को कहीं भी एड्रेस करने की बजाय किरदारों की हत्या कर देना ज्यादा आसान समझती है. फिल्म के राइटर-डायरेक्टर पुलकित न जाने कैसे ये भूल गए कि राइटिंग में किरदारों को इतनी आसानी से मारते चले जाना, लोगों को फिल्म में इन्वेस्ट होने का मौका नहीं देता.
पवन अपने पिता से क्यों अलग है, अलग क्यों सोचता है, इसकी वजह कहानी में नहीं है. एक धर्मगुरु इतना बड़ा रैकेट कैसे चला रहा है, इसे दिखाने में भी कर्तव्य की कोई दिलचस्पी नहीं है. बल्कि कर्तव्य को इस बात में भी कोई दिलचस्पी नहीं है कि पुलिस इंस्पेक्टर और उसका जीवन नर्क बना रहा धर्मगुरु क्लाइमैक्स में आमने-सामने हों. ये तो सोचकर भी घबराहट होती है कि कहीं मेकर्स ने ये एंगल कर्तव्य का सीक्वल बनाने के इरादे से तो बाकी नहीं छोड़ा!
2 घंटे से भी कम रनटाइम वाली इस फिल्म में ईमानदारी की कमी इतनी खलती है कि इतनी देर होल्ड कर पाना भी मुश्किल लगता है. ऐसा बिल्कुल नहीं है कि ये कमी एक्टर्स की तरफ से है, क्योंकि एक्टर्स को दर्शक से आंखें मिलानी होती हैं और इस काम में ईमानदारी टेस्ट हो जाती है. कर्तव्य की कमी उस इरादे में है, जो इस फिल्म के स्क्रीन पर आने की वजह बना. कहीं ऐसा तो नहीं कि आजकल के सेंसिटिव माहौल को देखते हुए फिल्म से कुछ महत्वपूर्ण चीजें हटाई गई हैं? क्योंकि ये बात कई जगह महसूस होती है.
ऐसा लगता है कि एक बड़े प्रोडक्शन हाउस ने 'पाताल लोक' जैसा कुछ बनाने के इरादे से कर्तव्य प्लान की थी. फिल्म को हाइप दिलाने के इरादे से सैफ के साथ वो चेहरे कास्ट किए गए, जो कंटेंट की दुनिया में चर्चित हैं. मगर ईमानदारी फिल्म का वो पहलू है, जिसे जनता बहुत दूर से भांप लेती है. खासकर लॉकडाउन के बाद वाले दौर में 'पाताल लोक' जैसे शोज ने ऑडियंस को इतना बिगाड़ दिया है कि अब कहानियों का हल्कापन बर्दाश्त करना मुश्किल लगने लगा है.
और चौंकाने वाली बात ये है कि ये चूक नेटफ्लिक्स से हुई है, जो इंडिया में 'सेक्रेड गेम्स' (2018) से कंटेंट की दुनिया में क्रांति लेकर आया था. उस कहानी में भी हीरो सैफ थे और उनका वो काम आज भी तारीफें बटोरता है. लेकिन नेटफ्लिक्स इस बार कहानी को ऑथेन्टिक बनाने के कर्तव्य में बुरी तरह नाकाम हुआ है.
सुबोध मिश्रा