पिछले कुछ सालों में सबसे ज्यादा तगड़ी हाइप वाली बॉलीवुड फिल्म ‘धुरंधर 2’ पर विवाद छिड़ चुका है. बात बिल्कुल भी हैरान करने वाली नहीं है क्योंकि तीन महीने पहले ‘धुरंधर’ देखते वक्त ही लोगों को पता था कि इस कहानी का सेकंड पार्ट जो दिखाने वाला है, उसपर ‘प्रोपेगेंडा’ का टैग लगना ही है. ये टैग पहली फिल्म पर भी लगा था क्योंकि आदित्य धर की कहानी के कुछ हिस्सों की भाव-भाषा-भंगिमा, भारत की सत्ता संभाल रही राजनीतिक पार्टी से मेल खा रही थी.
अब अगर ‘धुरंधर 2’ में पॉलिटिकल मसाले का डोज पहले से काफी तेज हुआ है, तो इसके तीखेपन से जीभ जलाने वालों का भभकना भी बढ़ना ही था. मगर पूरी बहस का इस बात पर टिक जाना विचित्र है कि ‘धुरंधर 2’ पर पॉलिटिकल रंग चढ़ाने का मकसद, कंट्रोवर्सी का सागर मथकर बॉक्स ऑफिस कामयाबी का अमृत निकालना है.
क्यों विवादों में है ‘धुरंधर 2’?
‘धुरंधर 2’ लगभग सरप्राइज करते हुए पॉलिटिकल संकोच का वो झीना पर्दा भी उतार फेंकती है, जो ‘धुरंधर’ ने बचा रखा था. पहली फिल्म से दूसरी फिल्म तक भारत की सरकार बदलना, कहानी के तेवर बदलने लगता है. पाकिस्तान में मिशन पर तैनात भारतीय जासूस को ‘खुलकर खेलने’ की परमिशन नई सरकार आने के बाद मिलती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शपथग्रहण स्क्रीन पर आता है. कुछ सीन्स बाद वो नोटबंदी की ऐतिहासिक घोषणा करते हुए दिखते हैं.
पाकिस्तान की जमीन से चल रहे आतंकी नेटवर्क्स के तार, पंजाब की ड्रग समस्या और हिंसा से जुड़ते हैं. लेकिन डायरेक्ट नहीं, बीच में एक महत्वपूर्ण कड़ी और है— उत्तर प्रदेश का एक चर्चित नेता. ‘धुरंधर 2’ इन नेता का नाम सीधा नहीं लेती. मगर जो नाम देती है, जो शक्ल-शख्सियत दिखाती है उससे लोग साफ पहचान ले रहे हैं कि ये किस रियल लाइफ व्यक्ति की तरफ इशारा है. जिसके आपराधिक रिकॉर्ड्स पुलिस फाइलों से मीडिया रिपोर्ट्स तक सबके सामने हैं. इन नेता की हत्या भारतीय मीडिया चैनलों के सामने लाइव हुई थी. ये हत्या किसने और क्यों करवाई, ये आज भी एक रहस्य ही है.
‘धुरंधर 2’ में उस नेता के किरदार की हत्या को, टेरर नेटवर्क तोड़ने के मिशन का हिस्सा बना दिया गया है. यानी उसी ‘मिशन धुरंधर’ का हिस्सा, जिसे पाकिस्तान में रणवीर सिंह का हीरो पूरा कर रहा है. भारत के लिए नासूर बन चुके टेरर, ड्रग्स, अवैध हथियारों का नेटवर्क एक पॉइंट पर देश से भगोड़ा घोषित हो चुके चर्चित गैंगस्टर से जुड़ जाता है— दाऊद इब्राहिम. ‘धुरंधर 2’ इस मिशन की असली कामयाबी का क्रेडिट पीएम मोदी के शासनकाल में लिए गए फैसलों को देती है. ‘प्रोपेगेंडा’ के टैग से बचने की इच्छा, कोई पॉलिटिकल पर्दादारी या संकोच दिखाए बिना.
पॉलिटिकल कहानी + कंट्रोवर्सी = ताबड़तोड़ कमाई ?
कोई भी फिल्ममेकर इतना नादान नहीं है जिसे ऐसी चॉइस के साथ आने वाली कंट्रोवर्सी का आईडिया पहले से न हो. पर क्या ‘धुरंधर 2’ में ये चॉइस केवल कमाई के लिए ली गई? ये कहना सरासर गलत होगा क्योंकि कंट्रोवर्सी से कमाने वाला फॉर्मूला असल में आउटडेटेड हो चुका है.
बड़ी-बड़ी मेनस्ट्रीम बॉलीवुड फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर टक्कर देने वाली ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) और ‘द केरला स्टोरी’ (2023) को आए ठीकठाक वक्त बीत चुका है. इन फिल्मों ने दिखाया कि विवादित पॉलिटिकल मुद्दों के फैक्ट्स अगर फिक्शन में घोलकर, इमोशनल ट्रीटमेंट के साथ पेश किए जाएं तो बड़ी बॉक्स ऑफिस सक्सेस संभव है. लेकिन क्या फिल्ममेकिंग का ये स्टाइल कामयाबी की गारंटी है? बिल्कुल नहीं.
डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ वाले टेम्पलेट को ही पिछले साल ‘द बंगाल फाइल्स’ में दोहराने की कोशिश की थी. ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह नाकाम साबित हुई. ‘द केरला स्टोरी’ के मेकर्स ने वही फॉर्मूला ‘बस्तर’ (2024) में भी ट्राई किया, मगर उन्हें भी बॉक्स ऑफिस पर निराशा हाथ लगी. इसी साल आई ‘द केरला स्टोरी 2’ को कामयाब फिल्म का सीक्वल होने के नाते दर्शक तो मिले, लेकिन ये पहली फिल्म के मुकाबले एक चौथाई कमाई भी नहीं कर पाई.
अगर किसी पॉलिटिकल पार्टी की विचारधारा के काम आने वाली, कंट्रोवर्सी क्रिएट करने वाली फिल्मों का तगड़ी कमाई करना पक्का होता तो पिछले दो सालों में आई करीब एक दर्जन फिल्में बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच देतीं— मैं अटल हूं, बस्तर, स्वातंत्र्य वीर सावरकर, हमारे बारह, केसरी वीर, इमरजेंसी, उदयपुर फाइल्स, द बंगाल फाइल्स, अजेय, द ताज स्टोरी, हक.
इनमें से एक फिल्म भाजपा से निकले पहले प्रधानमंत्री, स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी की बायोपिक है. इन फ्लॉप फिल्मों में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बायोपिक भी है. लेकिन इस बात पर शर्त लगाई जा सकती है कि बहुत लोगों को पता भी नहीं चला होगा कि ये फिल्में कब थिएटर्स में लगीं और कब उतर गईं!
‘धुरंधर 2’ का फर्स्ट हाफ, हीरो जसकीरत सिंह रांगी की कहानी पर ज्यादा फोकस करता है. इस पोर्शन में यूपी के नेता पर बेस्ड किरदार का एंगल बस बढ़िया बनी दाल को धनिया से गार्निश करने वाला मामला है. सेकंड हाफ में उसी धनिए की चटनी भी मिल जाती है, लेकिन चटनी होती तो साइड डिश ही है! पॉलिटिक्स फिल्म की कहानी को अंजाम तक पहुंचाने का काम करने लगती है. मगर फिर भी आदित्य धर की इस शानदार दावत में मेन डिश जसकीरत की कहानी ही है.
चटनी से खाने का भी अपना स्वाद होता है, मगर वो कभी-कभी ही लिया जा सकता है. तीनों वक्त चटनी-रोटी से भूख नहीं मिटाई जा सकती. ‘धुरंधर 2’ वो दावत है जिसमें दर्शक को ही तय करना है कि किस चीज का स्वाद जीभ पर लेकर घर लौटना है— मेन डिश, मिठाई या चटनी. रिस्पॉन्स बता रहा है कि जनता अपनी चॉइस में क्लियर है और इसीलिए ‘धुरंधर 2’ ताबड़तोड़ ब्लॉकबस्टर साबित हो रही है.
‘धुरंधर’ में कहानी जिस मोड़ पर, जिस असर के साथ छूटी थी… उससे आगे देखने की जिज्ञासा ‘धुरंधर 2’ की सक्सेस का सबसे बड़ा ईंधन है. केवल पॉलिटिकल होने या कंट्रोवर्सी वाले मुद्दे चुनने से फिल्में इतनी कामयाब नहीं होतीं कि बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड्स याद रखने वाले लोगों को बादाम खाने पड़ जाएं!
सुबोध मिश्रा