बिहारः जेपी का सर्वोदय आश्रम, जहां चंबल के कुख्यात डाकुओं को चलाना पड़ा था हल

नक्सल प्रभावित इस इलाके की दशा बदलने के लिए जेपी ने बहुत काम किया, इसी का परिणाम रहा कि कई नक्सलियों ने उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. मध्य प्रदेश के कुख्यात डकैत ने भी साथियों के साथ आत्मसमर्पण करने के बाद सोखोदेवरा आश्रम में खेतीबाड़ी की थी.

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नवादा स्थित सोखोदेवरा आश्रम (फोटो-विजय भान) नवादा स्थित सोखोदेवरा आश्रम (फोटो-विजय भान)

अमित राय

  • नई दिल्ली,
  • 29 सितंबर 2020,
  • अपडेटेड 5:07 PM IST
  • नवादा के सोखोदेवरा आश्रम में जेपी के दिन
  • शहर के कोलाहल से दूर आए
  • कुख्यात डकैत ने किया समर्पण

जयप्रकाश नारायण को बड़ी पहचान संपूर्ण क्रांति आंदोलन से मिली, लेकिन इससे पहले वह जमीनी स्तर पर लोगों का जीवन स्तर बदलने के लिए गांधीवादी तरीके से संघर्ष कर रहे थे. जेपी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया और आजाद भारत में विनोवा भावे के भूदान आंदोलन को समर्थन दिया. इस दौरान जेपी नवादा स्थित कौआकोल के सोखोदेवरा पहुंचे थे. स्थानीय लोगों ने उन्हें यहां पर जमीन मुहैया कराई और उन्होंने यहां पर सर्वोदय आश्रम की स्थापना की थी.

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नक्सल प्रभावित इस इलाके की दशा बदलने के लिए जेपी ने बहुत काम किया, इसी का परिणाम रहा कि कई नक्सलियों ने उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया था. मध्य प्रदेश के कुख्यात डकैत ने भी साथियों के साथ आत्मसमर्पण करने के बाद यहां खेतीबाड़ी की थी. 

कोलाहल से दूर सोखोदेवरा आश्रम पहुंचे जेपी
 
आजाद भारत के बाद की एक कहानी नवादा में लिखी जा रही थी. आजादी के आंदोलन में भाग ले चुके जय प्रकाश नारायण कौतूहल से दूर एक ऐसी जगह की तलाश में थे जहां जमीनी स्तर पर काम करके लोगों का जीवन स्तर बदला जा सके. जहां चुनौती भी हो और प्राकृतिक संसाधन भी. ऐसी जगह की तलाश में जय प्रकाश कौआकोल के सोखोदेवरा पहुंचे थे. वह 1952 का समय था. इससे पहले 1951 में संत विनोवा भावे भूदान आंदोलन शुरू कर चुके थे और पदयात्रा पर निकल गए थे. उन्हें लोग जमीनें दान करने लगे थे. जय प्रकाश नारायण भी चाहते थे कि समान स्तर पर जमीनों का बंटवारा हो, जिससे सामाजिक विषमता खत्म हो. उन्होंने भूदान आंदोलन का समर्थन किया था.

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सोखेदेवरा आश्रम

जेपी ने दी आत्मनिर्भरता की सीख
 
नवादा से 40 किमी दूर सोखोदेवरा में स्थानीय लोगों ने जेपी को जमीनें दान की थीं. यहां उन्होंने सर्वोदय आश्रम की स्थापना की. जेपी ने यहां रहना शुरू किया और आसपास के गांवों की तकदीर बदलनी शुरू कर दी. गांधीवादी तरीके से लोगों को आत्मनिर्भर बनाने की योजना पर काम करते हुए जेपी ने यहां कई गांव बसाए जैसे कस्तूरबा नगर, जेपी नगर, गांधी धाम और प्रभा नगर.

यहां गांव के लोगों को सिखाया जाता कि कैसे चरखा चलाना है, खेती कैसे करनी है और कैसै आत्मनिर्भर बनना है. आज यह आश्रम करीब 10000 एकड़ में फैला है. आज भी यह आश्रम ग्राम निर्माण मंडल की तरफ से संचालित किया जाता है. यहां पर कृषि अनुसंधान केंद्र भी है. पर्यटन के लिहाज से भी यह इलाका समृद्ध है लेकिन बुनियादी सुविधाएं न होने से पर्यटकों को मुश्किल होती है. 

20 सालों तक रहे जेपी
 
आश्रम के सचिव अरविंद कुमार बताते हैं कि जेपी को यह जगह इतनी अच्छी लगी कि वह पत्नी के साथ 20 वर्षों तक यहां पर रहे. जेपी ने खादी के विकास पर खासा जोर दिया था. 1966 में इस इलाके में भयंकर सूखा पड़ा था. जेपी ने यहीं रहते हुए बिहार रिलीफ फंड की स्थापना की और लाखों लोगों को मरने से बचाया था. मुख्यमंत्री रहते हुए नीतीश कुमार यहां आए थे और एक करोड़ रुपये की सहायता दी थी. अरविंद कुमार का दावा है कि आज भी आसपास के गांवों में चरखा चलाया जाता है. आश्रम की तरफ से ही 2000 चरखे बांटे गए हैं. 

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सोखोदेवरा आश्रम में जेपी ने 20 साल गुजारे

जानकार बताते हैं कि 80 के शुरुआती दशक में जैसे-जैसे लोग कांग्रेस शासन के खिलाफ होते जा रहे थे. जेपी के चाहने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी. यहां पर कई नेता उनसे मिलने आते थे लेकिन यहां पहुंचना सबके लिए आसान नहीं था. लोगों को आसानी से उपलब्ध हो सकें इसलिए जेपी ने अपना ठिकाना पटना में बनाने का फैसला किया. इसी दौरान एक ऐसी घटना घटी जिसे आज भी लोग याद करते हैं. 

खूंखार डकैत ने सरेंडर के बाद हल चलाया

उस समय यूपी-एमपी के चंबल में डाकू माधो सिंह का बड़ा आतंक था. सरकार उसे खत्म करना चाहती थी लेकिन वह अपनी रॉबिनहुड वाली इमेज के चलते प्रशासन की पहुंच से दूर था. वह मुख्य धारा में शामिल होना चाहता था लेकिन सम्मानित तरीके से. उसके गुनाहों की फेहरिस्त लंबी थी लेकिन उसका दावा था कि शोषितों को न्याय दिलाने के लिए उसने हथियार उठाए हैं. कई डाकू विनोवा भावे के सामने आत्मसमर्पण कर चुके थे लेकिन माधो सिंह चूक गया था.

लोकनायक जय प्रकाश नारायण

उस दौरान विनोवा भावे वर्धा के अपने आश्रम में रहने लगे थे और एक तरह से सक्रिय जीवन से संन्यास ले लिया था. बताया जाता है कि माधो सिंह अपना दूसरा नाम बताकर विनोवा भावे से मिला लेकिन संन्यास ले चुके बाबा ने जेपी का नाम सुझा दिया. दिल्ली में जेपी से मिलने की असफल कोशिश के बाद माधो सिंह भेष बदलकर पटना में जेपी से मिला. अप्रैल 1972 में उसने जेपी के सामने अपने कई साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया. सोखोदेवरा के आश्रम में वह बहुत दिनों तक रहा और साथियों के साथ खेतों में हल चलाए. इस इलाके में नक्सलियों का भी बड़ा आतंक था, लेकिन जेपी के कहने पर 80 के दशक में यहां नक्सलियों ने भी आत्मसमर्पण किया था.

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(नवादा से विजय भान के इनपुट के साथ)

 

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