पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले का उपखंड स्तरीय कस्बा मेकलीगंज समृद्ध इतिहास और राजनीतिक विरासत का गवाह है. यह विधानसभा क्षेत्र मेकलीगंज नगरपालिका, मेकलीगंज सामुदायिक विकास खंड, हल्दीबाड़ी नगरपालिका और हल्दीबाड़ी सामुदायिक विकास खंड को शामिल करता है. यह जलपाईगुड़ी (अनुसूचित जाति) संसदीय क्षेत्र के सात विधानसभा खंडों में से एक है.
में स्थापित इस विधानसभा क्षेत्र में अब तक 17 चुनाव हो चुके हैं. शुरुआत में यह सामान्य श्रेणी की सीट थी, लेकिन 1967 से इसे अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया और यह स्थिति आज तक बनी हुई है.
शुरुआती वर्षों में कांग्रेस का दबदबा रहा. कांग्रेस ने शुरुआती दो चुनाव जीते और 1972 में आखिरी बार जीत हासिल की. 1962 से ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक (AIFB) ने सीट पर पकड़ बनाई और 12 बार जीत दर्ज की. 2016 में बड़ा बदलाव आया जब जनता ने AIFB को नकारते हुए सीट तृणमूल कांग्रेस (TMC) को दे दी. तब से टीएमसी लगातार दो बार जीत चुकी है. AIFB का ग्राफ तेजी से गिरा है. 2021 विधानसभा चुनाव में उसे सिर्फ 3.45% वोट (6,853 वोट) मिले और जमानत तक जब्त हो गई.
2021 में टीएमसी के परेश चंद्र अधिकारी ने बीजेपी के दधिराम राय को 14,685 वोटों से हराया. अधिकारी को 99,338 (49.98%) और बीजेपी को 84,653 (42.59%) वोट मिले. दिलचस्प बात यह है कि परेश चंद्र अधिकारी 2001 से 2011 के बीच तीन बार AIFB के टिकट पर यहां से विधायक रह चुके हैं, लेकिन 2016 में टीएमसी में शामिल हो गए. बीजेपी, जो पहले यहां हाशिए पर थी, अब टीएमसी की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है.
2024 लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने टीएमसी को कड़ी टक्कर दी. 2019 में 4,705 वोटों से पीछे रहने वाली बीजेपी ने 2024 में अंतर घटाकर महज़ 2,818 वोट कर दिया.
2021 विधानसभा चुनाव में मेकलीगंज में कुल 2,16,540 मतदाता थे, जिनमें, अनुसूचित जाति 1,40,924 (65.08%), मुस्लिम मतदाता 49,371 (22.80%), और शहरी मतदाता केवल 9.92% हैं.
2024 लोकसभा चुनाव तक मतदाताओं की संख्या बढ़कर 2,34,912 हो गई. यहां परंपरागत रूप से मतदान प्रतिशत ऊंचा रहता है- 2016 में 89.32% और 2021 में 79.09% दर्ज किया गया.
कूचबिहार राज्य के अंतर्गत मेकलीगंज कभी जमींदारी क्षेत्र था, जिसे तीन भागों में बांटा गया था. इसके पुनर्वास और विकास में सिकरवार राजपूतों का अहम योगदान रहा. कहा जाता है कि कोच साम्राज्य के राजचिह्न में मौजूद हाथी इन्हीं राजपूतों ने उपजाऊ भूमि और एक मामूली नजराने के बदले भेंट किया था. बाद में महाराजा नरेंद्र नारायण ने इस क्षेत्र का नाम मेकलीगंज रखा, जिसका अर्थ है- नर्मदा क्षेत्र से आकर बसे लोगों की बस्ती.
मेकलीगंज का भूभाग समतल और उपजाऊ है, जो तीस्ता और जलढाका नदियों के जलोढ़ मैदानों में आता है. यहां मानसून में बाढ़ आम बात है. इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित है. धान, जूट और सब्जियां प्रमुख फसलें हैं.
मेकलीगंज टी एस्टेट अब पर्यटन का आकर्षण भी बन रहा है. सनियाजन नदी और भारत-बांग्लादेश के बीच का तीन बीघा कॉरिडोर यहां की पहचान है. यह 1992 में बांग्लादेश को लीज़ पर दिया गया था और आज इंडो-बांग्ला कूटनीति का प्रतीक है. सीमित रोजगार के कारण यहां के युवा बड़े पैमाने पर शहरों की ओर पलायन करते हैं. स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाएं केवल नगरपालिका क्षेत्रों में ही सिमटी हुई हैं.
यहां से कूचबिहार शहर से 82 किमी, सिलीगुड़ी से 86 किमी, अलीपुरद्वार से 105 किमी, कोलकाता से लगभग 550 किमी दूर है. सीमा पार बांग्लादेश के पटग्राम और लालमोनिरहाट शहर तीन बीघा कॉरिडोर से आसानी से पहुंच योग्य हैं.
2026 विधानसभा चुनाव में बीजेपी पूरे आत्मविश्वास के साथ उतरेगी, जबकि टीएमसी को सतर्क रहना होगा. यहां बीजेपी की जीत काफी हद तक वाम मोर्चे की रणनीति पर निर्भर करेगी- यदि लेफ्ट टीएमसी के वोट बैंक (खासकर मुस्लिम वोटरों) को काट पाती है, तो बीजेपी को बड़ा फायदा हो सकता है.
(अजय झा)