बहरामपुर जिला मुख्यालय से सूती विधानसभा क्षेत्र तक की यात्रा महज 80 किलोमीटर की दूरी नहीं है; बल्कि एक अलग सामाजिक और राजनीतिक दुनिया में प्रवेश करने जैसा है. शहर को पीछे छोड़ते ही परिदृश्य बदलने लगता है. जैसे-जैसे भारत-बांग्लादेश सीमा नजदीक आती है, दृश्य पूरी तरह बदल जाता है. साजुरमोर पहुंचकर जब मैंने राष्ट्रीय राजमार्ग से उतरकर दूसरे रास्ते की ओर रुख किया, अर्बन बंगाल के निशान गायब होते चले गए और उनकी जगह मुर्शिदाबाद के ग्रामीण इलाकों की जटिल सामाजिक-राजनीतिक बनावट ने ले ली.
मुझे मुर्शिदाबाद के देबीपुर जाना था- एक ऐसा गांव, जो अक्सर अशांति और राजनीतिक हिंसा के चलते सुर्खियों में रहता है. फिर भी, देबीपुर की एक विरोधाभासी पहचान है, इसे इस क्षेत्र का सबसे शिक्षित गांव माना जाता है. मैं यहां विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की जमीनी हकीकत और उसके उस प्रभाव को समझने आया था, जिसने लोगों को प्रशासनिक उलझनों में डाल दिया है. मेरा स्थानीय संपर्क देबीपुर गांव के जीडी प्राइमरी स्कूल में नहीं आया. ग्रामीण बंगाल के संवेदनशील, अल्पसंख्यक-बहुल इलाकों में कैमरे को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है और यह संदेह जायज भी है. लेकिन यहां मुझे किसी आक्रामकता का सामना नहीं करना पड़ा, लोगों की खामोशी टूटी और वे अपनी बात सुनाने के लिए बहुत उत्सुक थे.
गांव के बुजुर्ग रेजाउल करीम ने अपनी पीड़ा साझा की. उन्होंने थरथराती आवाज में कहा, 'हम पांच पीढ़ियों से यहां हैं, लेकिन मेरा नाम सूची से हटा दिया गया, जबकि मेरा बेटा- जो प्रोफेसर हैं और बेटी- जो डॉक्टर हैं, उनके नाम वोटर लिस्ट में मौजूद हैं. यह कैसा न्याय है?' उनका सवाल सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल उठाता है. उन्होंने पूछा, 'टीएमसी, बीजेपी और चुनाव आयोग कहां हैं?' यह बयान उस जवाबदेही के अभाव को दर्शाता है, जहां लोग खुद को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.
नई आकांक्षाएं
मुर्शिदाबाद की राजनीति लंबे समय से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नजरिए से देखी जाती रही है. ग्रेजुएट मुनु और जंगीपुर कोर्ट के वकील उनके भाई जाहिद कहते हैं, 'यहां ध्रुवीकरण पुराना मुद्दा है, लेकिन रोजगार और शिक्षा पर कोई बात नहीं करता.' एसआईआर के बाद जहां एक भाई वोटर है, तो दूसरे का नाम लिस्ट में नहीं है. सबसे चौंकाने वाली कहानी अब्दुल बारी की है, जो 16 साल से बीएसएफ में सेवा दे रहे हैं. कश्मीर में एलओसी की सुरक्षा करने वाला यह जवान आज अपने ही गांव में पहचान के संकट से जूझ रहा है. फोन पर बातचीत में उन्होंने कहा, 'मैंने 16 साल तक देश की सेवा की है. मेरी गलती क्या है? किसी को जवाबदेह होना चाहिए.'
सूती के राजनीतिक परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता कदम है. एक स्थानीय मस्जिद में मेरी मुलाकात अजीजुर रहमान से हुई. उन्होंने मुझे अंदर आने का न्योता दिया- एक ऐसा इशारा, जिसने मेरी अपनी झिझक को भी तोड़ा. फिर वह मुझे छत पर ले गए, जहां युवाओं ने एक हेल्प डेस्क बनाई है, जो गांव वालों को ट्रिब्यूनल में अपील दाखिल करने में मदद करती है.
मेरा निष्कर्ष
मस्जिद में बना यह हेल्प डेस्क धर्म से परे सभी की मदद करता है. अजीजुर ने कहा, 'हम पहले भारतीय हैं'. यह दिखाता है कि देबीपुर के युवा धार्मिक और सांप्रदायिक सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रीय पहचान को तवज्जो देते हैं. मुझे यहां आकर लगा कि अल्पसंख्यकों को लालच या डर के जरिए साधने की पारंपरिक राजनीति अब अपनी प्रासंगिकता खो रही है. सैनिक से लेकर वकील तक, सभी की मांग एक है- शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार.
बदलती तस्वीर
देबीपुर से लौटते वक्त मेरे दिमाग में यह बात स्पष्ट हो गई थी कि यहां की जनता अब सिर्फ वोट बैंक बनकर नहीं रहना चाहती. एसआईआर ने अनजाने में एक नई नागरिक चेतना को जन्म दिया है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की मांग कर रही है. अगर राजनीति ने इस बदलाव को नहीं समझा, तो यह इलाका चुपचाप अपनी राह खुद तय कर लेगा.
तपस सेनगुप्ता