कड़क है नॉर्थ बंगाल की चुनावी चाय! 54 सीटों में छुपा सत्ता का स्वाद, स्विंग वोटर्स करेंगे असली फैसला

उत्तर बंगाल की 54 सीटें पश्चिम बंगाल की सत्ता की चाबी मानी जाती हैं, जहां चुनावी ‘चाय’ का स्वाद हर बार बदलता है. टीएमसी और बीजेपी के बीच सीधी टक्कर में यह इलाका स्विंग जोन की भूमिका निभाता है. चाय बागान, पहाड़ी राजनीति, आदिवासी और राजवंशी वोटबैंक जैसे कई फैक्टर नतीजों को प्रभावित करते हैं. छोटे वोट शिफ्ट भी यहां बड़ा असर डाल सकते हैं, जिससे तय होगा कि राज्य की सत्ता किसके हाथ जाएगी.

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उत्तर बंगाल की 54 सीटें तय करेंगी राज्य की सत्ता की ‘चाय’ का स्वाद. (Photo: ITG/@GFX) उत्तर बंगाल की 54 सीटें तय करेंगी राज्य की सत्ता की ‘चाय’ का स्वाद. (Photo: ITG/@GFX)

केशवानंद धर दुबे

  • नई दिल्ली,
  • 26 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:29 AM IST

उत्तर बंगाल में चुनावी चाय का स्वाद हमेशा बदलता रहा है. किसका स्वाद मीठा रहेगा, किसके नसीब में फीकी चाय आएगी ये कई फैक्टर्स पर निर्भर होता है. ठीक उसी तरह जैसे चाय की खेती, कटाई और उसके उत्पादन पर निर्भर करता है कि आपके कप की चाय का स्वाद कैसा होगा? 

जिस तरह आपकी चाय का स्वाद बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वो किस फ्लश की चाय है, ठीक उसी तरह उत्तर बंगाल की 54 सीटें काफी हद तक डिसाइड करती हैं कि कोलकाता में किसकी चाय सुगंधित और मीठी होगी. यानी किसकी सरकार बनेगी और कितनी मजबूती से? 

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आइए अब उत्तर बंगाल की चाय, राजनीति और चुनावी रिश्तों में घुले मिले फैक्टर्स को समझते हैं. समझते और समझाते हैं कि कैसे उत्तर बंगाल को आप स्विंग जोन कह सकते हैं, कैसे टीएमसी और बीजेपी दोनों पार्टियों के लिए सीट के लिहाज से ये एक अहम जोन है.

राजनीतिक गणित समझें उससे पहले मोटे तौर पर चाय को समझ लें. उत्तर बंगाल के चाय बागानों से पत्तियों को आपके कप तक पहुंचाने का काम चार दौर में होता है. इसे फ्लश कहा जाता है, जिसका पूरा दौर फरवरी से लेकर नवंबर तक होता है. इसमें सबसे अच्छी चाय फरवरी और अप्रैल के बीच निकलती है जिसे फर्स्ट फ्लश कहते है. इसकी खासियत सुगंध होती है. अभी उत्तर बंगाल के चाय बागानों में फर्स्ट फ्लश चाय के साथ चुनावी चाय की महक भी है.

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उत्तर बंगाल की अहमियत

अगर उत्तर बंगाल के राजनीतिक इतिहास को देखें तो लंबे समय से ये इलाका लेफ्ट का गढ़ रहा है. पर 2011 में पूरे राज्य के साथ यहां की राजनीतिक तस्वीर भी बदली. मां, माटी, मानुष और परिवर्तन के नारे के साथ टीएमसी ने 54 में से 28 सीटें जीत ली थीं. सीएम बनते ही ममता बनर्जी ने सिलीगुड़ी में मिनी सचिवालय बनाने का ऐलान किया, उत्तर बंगाल के लिए अलग मंत्रालय बनाया गया और मंत्री पद की जिम्मेदारी गौतम देब को दी गई.

चाय बागान, डुआर्स के इलाके, पहाड़ और हरियाली से भरे इस इलाके में टीएमसी की बढ़त 2016 में भी कायम रही और 23 से ज्यादा सीटों पर काबिज हो गई लेकिन यहीं बंगाल की पॉलिटिक्स में प्रभावी तरीके से एंट्री होती है बीजेपी की. इसकी एक झलक उत्तर बंगाल में देखने को मिलती है और बीजेपी यहां जीरो से बढ़कर 7 सीटों तक पहुंच जाती है. लेफ्ट लगातार कम होते गई और कांग्रेस ने भी यहां अपनी पकड़ खो दी.

2016 में बीजेपी अपने अच्छे प्रदर्शन को और बढ़ाते हुए 2019 लोकसभा चुनाव में कमाल के दर्जे तक पहुंच गई. 8 में से 7 लोकसभा सीटों पर बीजेपी ने शानदार जीत हासिल करते हुए यहां की राजनीतिक पिक्चर ही बदल दी. और ममता बनर्जी ने इसका अनुमान समय रहते हुए लगा लिया. टीएमसी पर हमेशा सिर्फ साउथ बंगाल की पार्टी होने का जो टैग लगता था इन आंकड़ों ने इसे और मजबूत किया.

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इसलिए टीएमसी ने मेहनत शुरू की और 2021 में फिर 23 सीटों तक पहुंच गई. पर असली खेल तो बीजेपी ने किया. 2021 में बीजेपी भले ही सत्ता से दूर रही लेकिन उत्तर बंगाल में उसने 30 सीटें हासिल करके बता और जता दिया कि इस हिस्से में उसकी पकड़ कितनी मजबूत हो चली है. यहां लेफ्ट और कांग्रेस एकदम हाशिए पर चले गए.

उत्तर बंगाल में क्यों कामयाब हुई बीजेपी?

राज्य एक होने के बाद भी साउथ और नॉर्थ बंगाल में काफी फर्क है. ये फर्क कई पहलुओं में है. खासकर राजनीतिक और राजनीति के उद्देश्य में तो कहीं ज्यादा. यही कारण है कि यहां अलग राज्य की मांग लंबे समय से होती रही है. बंगाल की राजधानी कोलकाता से इसकी दूरी एक बड़ा कारण रहा है जिसके कारण यहां छोटी-छोटी राजनीतिक पार्टियों, समुदायों की मांगों ने जोर पकड़ा, दार्जिलिंग में अलग गोरखालैंड की मांग बढ़ती चली गई. चाय बागानों और आदिवासी इलाकों के जरिए बीजेपी ने यहां अपनी पकड़ बनाई. इसी तरह कूचबिहार और दिनाजपुर जिलों के लिए बीजेपी ने स्थानीय मुद्दों के साथ राजवंशी समुदाय को पकड़ा और सीटें भी हासिल कीं.

हालांकि, इस बार उत्तर बंगाल में बीजेपी के लिए मुश्किलें भी कम नहीं है. बीजेपी के चार विधायक पहले ही टीएमसी ज्वाइन कर चुके हैं. सिलीगुड़ी और आसपास विधानसभा क्षेत्र में टीएमसी लगातार मजबूत होते चली गई है. इसका सबसे बड़ा असर निकाय चुनावों में देखने को मिला है. पहली बार सिलीगुड़ी नगर निगम पर टीएमसी का पूरी तरह से कब्जा है, यहां तक कि सिलीगुड़ी महकमा परिषद जो कभी भी टीएमसी के पास नहीं रहा, उस पर भी ममता की पार्टी को जीत मिली है.

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बीजेपी इस इलाके में आदिवासी वोट के भरोसे रही है. यहां से जीतने वाले आदिवासी नेता जॉन बारला को बीजेपी ने केंद्र में मंत्री बनाया था, लेकिन आज की तारीख में वो टीएमसी के साथ हैं. इससे आदिवासी वोटबैंक किस तरफ जाएगा ये कह पाना मुश्किल है. हालांकि, बीजेपी अभी भी कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग की विधानसभा सीटों पर मजबूत है. इसका कारण यहां मिक्स वोटर हैं.

टीएमसी के लिए उत्तर बंगाल अहम क्यों?

हमेशा की तरह उत्तर बंगाल के वोटर्स शिफ्ट होते रहते हैं. ये पैटर्न 12-15 साल में जरूर बदलता है. इस बार सीधे लड़ाई टीएमसी और बीजेपी के बीच है. ये बात ममता बनर्जी बखूबी समझती हैं. इसीलिए इस बार ममता बनर्जी ने टीएमसी के लिए उत्तर बंगाल से पूरा जोर लगा दिया है. मंगलवार को ममता बनर्जी अपने चुनावी दौरे की शुरुआत अलीपुरद्वार से कर रही हैं. मयनागुड़ी और माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी में भी उनकी मौजूदगी दिखी. सिलीगुड़ी से सटे इस तराई क्षेत्र में कभी लेफ्ट का बोलबाला हुआ करता था. पर इसके बाद यहां बीजेपी ने भी अपनी पैठ जमाई. टीएमसी ने इस बार कई सीटों पर नए चेहरे उतारे हैं. इसका कारण है कि दिनाजपुर जोन में टीएमसी के कई नेताओं पर करप्शन के आरोप थे.

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यही नहीं, टीएमसी ने फिलहाल दक्षिण दिनाजपुर, उत्तर दिनाजपुर और माल्दा में अपनी पकड़ बनाए रखी है. इस बार माल्दा में लड़ाई दिलचस्प होने वाली है. हाल में ही सांसद रहीं मौसम नूर फिर से कांग्रेस में शामिल हो गई हैं. वो टीएमसी से राज्यसभा सांसद थीं. मौसम गनी खान के परिवार से आती हैं. इस परिवार का लंबे समय तक माल्दा की राजनीति पर एक तरह से कब्जा रहा है. इसी कारण इसे कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, हालांकि, पिछले दो चुनावों में कांग्रेस यहां कोई कमाल नहीं कर पाई थी.

चुनावी दिशा बदलने वाले फैक्टर

यहां कई बड़े फैक्टर हैं जो चुनावी दिशा बदल सकते हैं. पहाड़ की पॉलिटिक्स की बात करें तो उत्तर बंगाल को करीब से जानने-समझने वाले राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यहां अब वैसी एकजुटता नहीं है. गोरखालैंड की मांग को लेकर जो 15-20 साल पहले आंदोलन बड़े पैमाने पर चल रहे थे उनका वेग अब धीमा हो गया है. हिल्स की राजनीतिक पार्टियां दो-तीन गुटों में बंट गई हैं, इसलिए टीएमसी ने सीधे इस बार यहां अपने प्रत्याशी ना उतारकर गठबंधन किया है. टीएमसी ने अनिता थापा की अगुआई में दार्जिलिंग की तीन सीटें भारतीय जनमुक्ति मोर्चा को दे दी है. बीजेपी भी यहां की आंचलिक पार्टियों के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ने जा रही है. क्योंकि बीजेपी को दार्जिलिंग लोकसभा सीट पर जसवंत सिंह के जमाने से जीत हासिल होती रही है. इसका कारण पहाड़ की आंचलिक पार्टियां बीजेपी का साथ देते आई हैं. SIR और कम मार्जिन वाली सीटों पर फैसला भी अहम हो सकता है. इसे एक मुद्दे के तौर पर देखा जा सकता है. चूंकि उत्तर बंगाल में कई सीटों पर पिछले 15 साल से काफी क्लोज फाइट होती रही है. इसलिए वोटिंग पैटर्न में थोड़ा भी शिफ्ट बड़ा असर डाल सकती है.

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जलपाईगुड़ी में खेल करता रहा है स्विंग वोटर

इस जिले में आने वाले विधानसभा सीटों में सबसे बड़ा फैक्टर होते हैं स्विंग वोटर्स, यानी यहां के मतदाता किसी एक पैटर्न में वोट नहीं करते. इसका सबसे बड़ा कारण है यहां की मिक्स पॉपुलेशन. यहां शहरी वोटर्स के साथ-साथ ग्रामीण वोटर्स भी बड़ी तादाद में हैं. यहां शहर में ट्रैफिक जाम, साफ सफाई जैसे मुद्दे भी बड़े हो जाते हैं. यहां एक तरफ राजवंशी वोटबैंक का बोलबाला है तो दूसरी तरफ चाय बागानों में काम करने वाले मजदूर भी बड़ी संख्या में हैं. उनकी चिंता आज भी बागान के बाहर पक्का घर, बिजली, मेहनताना आदि है.

जलपाईगुड़ी के अलावा कूचबिहार और दिनाजपुर जोन में राजवंशी और कमतापुरी एक अहम मुद्दा रहा है. कम से कम 12-15 सीटों पर इनका अच्छा खासा असर होता है. लंबे समय से इनकी बड़ी डिमांड अलग राज्य की रही है, जिसे कई बार कुछ पार्टियों ने तवज्जो भी दी, लेकिन आज भी इन्हें पूरा हल नहीं मिल पाया है. अलग पहचान के साथ-साथ विकास की मांग लंबे समय से रही है. यहां लंबे समय से ग्रेटर कूचबिहार (Greater Cooch Behar) राज्य की मांग उठती रही है. सिर्फ इसी इलाके में ही नहीं, राजवंशी समुदाय का फैलाव असम और पड़ोसी देश नेपाल तक भी है.

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बीजेपी से राज्यसभा सांसद रहे अनंत महाराज हाल के दिनों में टीएमसी के करीब हो गए हैं तो टीएमसी में रहे विधायक अर्घा राय बर्धन और राजवंशी नेता बंसी बदन बर्मन बीजेपी के पाले में आ चुके हैं. चुनावी चाय किसके लिए कड़क होगी ये काफी हद तक तय करेगा कि वोटर्स इस बार किस पैटर्न में वोट करते हैं. टीएमसी अपना खोया रुतबा हासिल करती है या बीजेपी फिर से एक बार उत्तर बंगाल का दुर्ग बचाए रखती है.

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