ग्राउंड रिपोर्ट: 8 घंटे काम, 250 रुपये कमाई! चाय की खुशबू के पीछे छिपा बागान मजदूरों का संघर्ष

डिब्रूगढ़ के चाय बागानों में काम करने वाली महिलाओं की जिंदगी संघर्ष से भरी है. रोजाना सुबह 7 बजे से शाम 4 बजे तक वो बागानों में काम करती हैं, लेकिन उनकी मजदूरी बेहद कम है. वो सरकार से मजदूरी बढ़ाने, जमीन के पट्टे और ST दर्जा देने की मांग करती हैं और उन्हें उम्मीद है कि उनकी आवाज सुनी जाएगी और जीवन बेहतर होगा.

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डिब्रूगढ़ के चाय बागानों में काम करने वाली महिलाओं की कहानी. (photo: ITG) डिब्रूगढ़ के चाय बागानों में काम करने वाली महिलाओं की कहानी. (photo: ITG)

पीयूष मिश्रा

  • डिब्रूगढ़,
  • 01 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:39 AM IST

सुबह के करीब 6 बजे, जब मैं डिब्रूगढ़ के जामिरा पहुंचा, तो सबसे पहले मेरा स्वागत हरे-भरे, खुशबू से महकते चाय बागानों ने किया. चारों तरफ लहलहाती चाय की पत्तियां, ठंडी हवा और उसमें घुली चाय की भीनी-भीनी महक ने मन मोह लिया. 

थोड़ा आगे बढ़ने पर रास्ते में एक ब्रेकर आया, ब्रेकर पार करते ही दाहिनी ओर दो गायें खड़ी दिखाई दीं. वहीं से जब हमने बाईं ओर रुख किया, तो हमारी मुलाकात दो महिलाओं से हुई, जो चाय बागान जाने की तैयारी कर रही थीं. मैंने उनसे पूछा, दीदी क्या आप चाय बागान में काम करती हैं?

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उन्होंने टूटी-फूटी हिंदी में जवाब दिया, हां, हम लोग पिछले 21 साल से यहां के चाय बागान में काम कर रहे हैं. इसके बाद मैंने उनसे जानना चाहा कि इतनी सुबह-सुबह महिलाएं तैयार होकर चाय बागान क्यों पहुंच जाती हैं?

इस पर उन्होंने बेहद सादगी से जवाब दिया, 'यहां सूरज जल्दी निकल जाता है और अंधेरा भी जल्दी हो जाता है. इसलिए सुबह-सुबह उठकर करीब 7 बजे तक सभी महिलाएं चाय बागान पहुंच जाते हैं, ताकि समय पर अपना काम पूरा कर सकें.' इतना कहने के बाद करीब 45 साल की वो महिला मुस्कुराईं और बोलीं, 'अब हमें निकलना है, नहीं तो देर हो जाएगी.' और फिर वह अपने घर के अंदर चली गईं.

थोड़ा और आगे बढ़ने पर हमें एक घर के बाहर दो छोटी बच्चियां खेलती हुई नजर आईं. हमने उनसे पूछा, 'बेटा, मम्मी घर पर हैं?' बच्चियों ने जवाब दिया, 'हां, मम्मी घर का काम कर रही हैं.' इसके बाद मैंने और मेरे सहयोगी अंकित सिंह ने बच्चियों से कहा कि वो अपनी मां को बुला दें, तो हमें उनसे असम चुनाव और चाय बागान में काम करने वालों के मुद्दों पर कुछ बातचीत करनी है.

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(Photo- ITG)

घर के बाहर हमारी आवाज सुनते ही दोनों बच्चियों की मां सुमारी मेधा बाहर आ गईं. उन्होंने पूछा, 'बेटा, कौन आया है?' तभी मैंने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और कहा, 'हमें चाय बागान में काम करने वाले लोगों की जिंदगी और उनके मुद्दों पर एक स्टोरी करनी है. असम में चुनाव हैं और हम जानना चाहते हैं कि इस चुनाव को चाय बागान के श्रमिक किस नजर से देखते हैं. 

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सुमारी मेधा ने बताया कि वो इस समय घर का काम निपटा रही हैं, क्योंकि थोड़ी ही देर में उन्हें चाय बागान जाना है और पत्तियां तोड़नी हैं. मैंने उनसे विनम्रता से पूछा कि क्या वो जो काम कर रही हैं, उसे हम शूट कर सकते हैं? ये सुनते ही उन्होंने हामी भर दी और हमें अपने घर के अंदर बुला लिया. कुछ देर हम बाहर बैठे रहे. इस दौरान सुमारी मेधा ने अपने आंगन में झाड़ू लगाया, फिर हमें इशारे से घर के अंदर आने को कहा.

जैसे ही हम घर में दाखिल हुए, सबसे पहले हमारी नजर एक बड़े बक्से पर पड़ी. उस बक्से के ऊपर चाय की पत्तियां भरने वाली टोकरी की रस्सी रखी हुई थी. उसे देखकर साफ अंदाजा हो गया कि वो काम पर निकलने की तैयारी में थीं. वहीं पास में कुछ बिखरे हुए बर्तन भी रखे थे. उनमें से दो गिलास बीच से टूटे हुए थे और जिस डिब्बे में चाय पत्ती रखी जाती है, उसके ऊपर लगा लाल रंग का ढक्कन भी बीच से टूटा हुआ था. 

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घर के अंदर का ये दृश्य बहुत कुछ कह रहा था- एक ऐसी जिंदगी की कहानी, जहां सुबह की शुरुआत संघर्ष से होती है और शाम तक मेहनत ही सहारा बनती है. तभी हमारी नजर कमरे की छत की ओर गई. ऊपर टीन की छत से एक बहुत पुराना पंखा लटका हुआ था. पंखे पर काली धूल की मोटी परत जमी हुई थी. जिस लकड़ी के सहारे वो पंखा टंगा था, उसी लकड़ी के बीचों-बीच एक बिजली का तार गुजर रहा था. उसी तार से जुड़ा एक बल्ब, ठीक सामने रखी अलमारी के पास लटक रहा था.

सुमारी को भी थोड़ी ही देर में काम पर निकलना था, इसलिए वो जल्दी-जल्दी तैयार होती हुई नजर आईं. अलमारी के नीचे रखे एक छोटे से सामान में से उन्होंने कंघी निकाली, जल्दी-जल्दी बाल संवारे, एक बिंदी लगाई और फिर मुस्कुराते हुए बोलीं- 'आप लोगों के लिए एक कप चाय बना देती हूं.'

इसके बाद वो उसी कमरे से सटे छोटे से रसोईघर की ओर तेजी से बढ़ीं. उन्होंने एक पतीले में पानी भरा और उसे मिट्टी के चूल्हे पर रख दिया. तभी सुमारी ने अपनी छोटी बेटी को आवाज लगाई और कहा- 'सोनू, चायपत्ती का डिब्बा रखा है, जल्दी लेकर आओ.' सुमारी की बेटी सिर्फ चायपत्ती ही नहीं लाई, बल्कि उसके साथ लकड़ियां, कुछ कागज और सूखे पत्ते भी लेकर आई, ताकि चूल्हे में आग जलाई जा सके. 

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सुमारी ने लकड़ियों को एक साथ इकट्ठा किया, कागजों को नीचे लगाया और फिर माचिस जलाकर चूल्हे में आग सुलगा दी. कुछ ही देर में मिट्टी का चूल्हा जल उठा. चूल्हे पर रखे पानी में उन्होंने थोड़ी सी चायपत्ती डाली और चाय बननी शुरू हो गई. इसी बीच हमने उनसे बातचीत और इंटरव्यू की इजाजत मांगी और उनके साथ एक छोटे से पीढ़े पर बैठ गए. हमने उनसे पूछा कि वो सुबह कितने बजे उठती हैं. ॉ

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उन्होंने बताया कि वो रोज सुबह करीब 4 बजे उठ जाती हैं. सबसे पहले घर का सारा काम निपटाती हैं और उसके बाद करीब 7 बजे चाय बागान के लिए निकल जाती हैं. उन्होंने बताया कि दिन में दोपहर का खाना होता है और फिर शाम करीब 4 बजे वो वापस घर लौटती हैं. सुमारी ने कहा कि वो करीब 20 साल की उम्र से यही काम कर रही हैं. 

जब हमने उनसे पूछा कि वो इतनी मेहनत क्यों करती हैं, तो उन्होंने बेहद भावुक होकर कहा- 'हमारा बस एक ही मकसद है कि हमारे बच्चे पढ़-लिख जाएं. वो चाय बागान में पत्तियां तोड़ने न आएं, बल्कि कहीं अच्छी जगह नौकरी करें.' उन्होंने अपनी मांग रखते हुए कहा कि सरकार को मजदूरी बढ़ानी चाहिए, क्योंकि अभी उन्हें सिर्फ 250 रुपए मिलते हैं. अगर मजदूरी बढ़ेगी, तो उनका और उनके परिवार का जीवन थोड़ा बेहतर हो सकेगा.

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सुमारी ने आगे कहा- 'बहुत मुश्किल से हम अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं. मैं नहीं चाहती कि मेरे बच्चे बड़े होकर बागान में पत्तियां तोड़ें. मैं चाहती हूं कि उनका भविष्य बेहतर हो, वो पढ़ें-लिखें और अच्छी नौकरी करें. मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि मेरे बच्चे अच्छे से पढ़ जाएं, ताकि जो तकलीफ मैं आज झेल रही हूं, उसका कुछ तो फायदा उन्हें मिले.'

काम की मुश्किलों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि चाय की पत्तियां तोड़ते-तोड़ते टोकरी का वजन करीब 20 किलो तक पहुंच जाता है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें लगातार काम करते रहना पड़ता है, ताकि ज्यादा से ज्यादा पत्तियां जमा हो सकें. उन्होंने कहा, 'जैसे-जैसे हम पत्तियां तोड़ते जाते हैं, उन्हें उसी टोकरी में डालते जाते हैं. उस समय हम ये नहीं सोचते कि टोकरी का वजन कितना बढ़ रहा है. बस काम करते जाना होता है.'

(Photo- ITG)

जब हमने उनसे सरकार और राजनीति को लेकर सवाल किया, तो सुमारी ने कहा कि बीजेपी सरकार आने के बाद उनके जीवन में कुछ बदलाव जरूर आया है. उन्होंने बताया कि अब उन्हें राशन मिलता है. तेल, चीनी और दूसरी जरूरी चीजें भी मिलती हैं. साथ ही जमीन के पट्टे को लेकर भी बात हुई है. उन्होंने कहा कि फॉर्म भरने के लिए दिया गया है और अगर उन्हें अपने घर की जमीन का पट्टा मिल जाए, तो ये उनके लिए बहुत बड़ी राहत होगी. 

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हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि 280 रुपये मजदूरी देने का वादा किया गया था, लेकिन उनके मुताबिक ये भी बहुत ज्यादा नहीं है. सुमारी ने एक कड़वी सच्चाई बयां करते हुए कहा- 'लेकिन क्या करें… जितना मिलेगा, उतना ही लेना पड़ेगा. हमारी कमाई में से ज्यादा पैसा बच ही नहीं पाता.' 

इतनी बातचीत के बाद सुमारी ने चाय बागान जाने की अंतिम तैयारी शुरू कर दी. उन्होंने अपने सिर पर टोकरी बांधी, घर पर एक आखिरी नजर डाली और फिर धीरे-धीरे अपने घर से निकलकर चाय बागान की ओर बढ़ गईं. उनके कदमों में रोज की मजबूरी थी, लेकिन आंखों में अब भी अपने बच्चों के लिए एक बेहतर भविष्य का सपना साफ दिखाई दे रहा था.

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थोड़ा आगे बढ़ने पर मेरी नजर चाय बागान में काम करने वाली संगीता दास पर पड़ी. वो अपने घर के भीतर भगवान की पूजा करती हुई दिखाई दीं. मैंने उनसे पूछा, 'क्या आप भी चाय बागान जाने की तैयारी कर रही हैं?'कैमरा और माइक देखते ही उन्होंने उत्सुकता से पूछा, 'क्या आप लोग मीडिया से हैं?' हम मुस्कुराए और कहा,'जी हां, हम दिल्ली से असम चुनाव कवर करने के लिए डिब्रूगढ़ आए हैं.' 

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इतना सुनते ही संगीता दास ने कहा, 'आइए, मैं बस निकलने की तैयारी कर रही हूं.' उन्होंने हमें अपने घर के आंगन में कुछ देर बैठाया और फिर वो दोबारा भगवान की पूजा में लग गईं. उनके हाथ में एक पूजा की थाली थी, जिसमें दीया जल रहा था. वो उसी थाली से भगवान की आरती उतारती हुई दिखाई दीं और फिर भगवान के आगे सिर झुकाकर अपने दिन की शुरुआत करती नजर आईं.

(Photo- ITG)

घर के भीतर की तस्वीर

जब हम उनके घर के अंदर पहुंचे, तो वहां एक छोटा सा कमरा दिखाई दिया. उस कमरे की छत लकड़ी और टीन के सहारे बनी हुई थी. कमरे के भीतर दो छोटी-छोटी अलमारियां रखी थीं. पास ही एक छोटा सा मटका रखा था और कुछ तीन-चार बर्तन भी दिखाई दिए. इसी कमरे के साथ एक और छोटा सा कमरा था, जिसका दरवाजा बीच से टूटा हुआ था. उसे ढकने के लिए वहां पर्दे का सहारा लिया गया था.

जब हमारी नजर ऊपर टीन की छत पर गई, तो पता चला कि उसमें बीचों-बीच एक बड़ा छेद था. हमने संगीता जी से पूछा, 'बारिश के समय आप इस पानी को कैसे रोकती हैं? ये तो मिट्टी का घर है… अगर पानी अंदर आ जाए, तो घर को नुकसान होता होगा?' इस पर संगीता ने बताया, 'जैसे ही बारिश शुरू होती है, हम यहां बीच में एक बड़ा बर्तन रख देते हैं, ताकि पानी पूरे घर में न फैले और बाकी कोनों तक न पहुंचे.'

संगीता दास की कहानी- मेहनत, अकेलापन और कर्ज

संगीता ने बताया कि वो पिछले 17 साल से चाय बागान में काम कर रही हैं. उन्होंने कहा, 'पहले मैं अपने पति के साथ रहती थी, लेकिन उनके गुजर जाने के बाद अब मैं अपने मां-बाप के साथ रहती हूं.' उन्होंने आगे बताया, 'मेरे घर में और कोई कमाने वाला नहीं है. मेरे भाई का भी एक छोटा सा काम था, लेकिन उसमें बहुत कमाई नहीं हो पाती. इसलिए पूरे घर की जिम्मेदारी अब मेरे कंधों पर है.'

संगीता कहती हैं कि वो रोज सुबह 4 बजे उठ जाती हैं. उसके बाद घर का काम करती हैं और फिर करीब 7 बजे चाय बागान के लिए निकल जाती हैं. पूरा दिन बागान में गुजरता है और करीब 3:30 बजे तक वो वापस घर लौटती हैंय लेकिन सबसे दर्दनाक बात तब सामने आई, जब उन्होंने अपनी कमाई और घर के खर्च का जिक्र किया.

संगीता ने कहा, 'जो मैं कमाती हूं, उससे मेरा घर नहीं चल पाता. इसीलिए मुझे लोगों से कर्ज मांगकर अपना जीवन चलाना पड़ता है. अभी मेरे ऊपर करीब 10,000 रुपये का कर्ज है.' उन्होंने बताया कि जब कर्ज चुकाने की बारी आती है, तो वो अपने मैनेजर से कहती हैं और फिर उनकी तनख्वाह से पैसे काट लिए जाते हैं. उन्होंने कहा, 'अगर किसी और से उधार लेती हूं, तो वो लोग हमसे ब्याज भी लेते हैं. ऐसे में महीने के आखिर तक पैसा कुछ बचता ही नहीं.'

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सरकार को लेकर संगीता की राय

जब हमने संगीता से पूछा कि  सरकार ने उनके लिए क्या किया,तो संगीता ने कहा, 'बीजेपी सरकार ने हम लोगों के लिए काम किया है. हम लोगों को 5,000-5,000 रुपये भी मिले हैं. मुझे मोदी सरकार का काम अच्छा लगता है. सरकार की तरफ से पैसा भी मिला है, घर का सर्वे भी हुआ है और कुछ लोगों को सर्वे के बाद घर भी दिया गया है.'

अपनी जिंदगी की हकीकत बताते हुए उन्होंने कहा, ये घर मैंने लोन लेकर बनवाया है, क्योंकि मेरे पास पैसे नहीं थे और आज भी मेरे ऊपर बड़ा कर्ज़ चढ़ा हुआ है.' इतनी बातचीत के बीच अचानक संगीता दास को एहसास हुआ कि हमसे बात करते-करते काफी देर कर चुकी हैं और अब उन्हें तुरंत बागान के लिए निकलना चाहिए. वो फुर्ती से उठीं और चाय बागान की ओर चल पड़ीं. उनके पीछे-पीछे मैं भी चाय बागान की तरफ बढ़ चला.

रास्ते में कई महिलाएं बागान की ओर जाती हुई दिखाई दीं. किसी के सिर पर टोकरी बंधी थी, किसी के हाथ में छाता था और लगभग हर चेहरे पर थकान के बीच भी एक हल्की सी मुस्कान थी. 

बागान के भीतर- मेहनत की असली तस्वीर

धीरे-धीरे सभी महिलाएं चाय बागान के भीतर पहुंचीं और फिर काम शुरू हो गया. काम शुरू करने से पहले उन्होंने अपने सिर पर एक छोटा सा गमछा बांधा. उस गमछे की एक गांठ बनाई गई और उसी गांठ के ऊपर चाय की पत्तियां भरने वाली टोकरी कसकर बांध दी गई. टोकरी बंधते ही चाय की पत्तियां तोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया.

इसी बीच हमें संगीता दास भी बागान में दिखाई दीं. उन्होंने हंसते हुए कहा, 'आज आप लोगों से बात करने के चक्कर में मैं सुबह का खाना भी नहीं खा पाई.' जहां एक ओर महिलाएं चाय की पत्तियां तोड़ रही थीं, वहीं दूसरी ओर उनके बीच हल्की-फुल्की बातचीत भी चल रही थी. संगीता और सुमारी एक साथ खड़ी होकर पत्तियां तोड़ती हुई दिखाई दीं. 

दोनों आपस में बात कर रही थीं कि आज दिल्ली से मीडिया वाले आए हैं और उनका इंटरव्यू लिया है. तभी पीछे से उनकी एक सहकर्मी खुमारी ने हंसते हुए आवाज लगाई- 'अरे संगीता, आज तो तू हीरोइन बन गई!' ये सुनते ही संगीता खिलखिलाकर हंस पड़ींऔर बोलीं, 'जल्दी-जल्दी पत्तियां तोड़, मैनेजर आता होगा.' 

इसी बीच हमारी बातचीत पिंकी नाम की एक महिला श्रमिक से हुई. उन्होंने बताया कि वो साल 2000 से लगातार काम कर रही हैं. यानी करीब 26 साल से चाय बागान में मेहनत कर रही हैं. पिंकी ने कहा,'हम लोग सुबह 7 बजे आ जाते हैं. उसके बाद करीब 12 बजे लंच करते हैं और फिर शाम 4 बजे के आसपास छुट्टी हो जाती है.'

उन्होंने कहा, 'फिलहाल हमें कोई खास दिक्कत नहीं है और हमारा काम ठीक-ठाक चल रहा है. हमारे साहब भी बहुत अच्छे हैं और हमारी मदद करते हैं. पिंकी ने बताया कि अब वो घर और बागान, दोनों की जिम्मेदारी संभाल लेती हैं. उन्होंने कहा, 'सुबह उठकर पहले घर का काम करते हैं, फिर यहां आते हैं. चाहे धूल हो, मिट्टी हो या बारिश, हम रोज यहां काम करने आते हैं, क्योंकि हमारे लिए हमारी दिहाड़ी बहुत जरूरी है.'

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काम करते-करते दोपहर के 12 बज जाते हैं. तभी वहां महिला श्रमिकों का मैनेजर पहुंचता है और सभी से कहा जाता है कि अपनी-अपनी टोकरियां लेकर एक जगह इकट्ठा हो जाएं. करीब 12:15 बजे एक लंबी लाइन लग जाती है. सभी महिलाएं एक-एक कर अपनी टोकरी लेकर वहां पहुंचती हैं. कुछ ही देर बाद वहां एक मशीन लाई जाती है, जिसके जरिए हर महिला की टोकरी का वजन किया जाता है. तौली गई पत्तियों को फिर एक ट्रक में भर दिया जाता है. 

जब हमने मैनेजर से पूरी प्रक्रिया के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया, 'महिलाएं रोज जितनी भी पत्तियां तोड़ती हैं, उन्हें ट्रक में भरकर फैक्ट्री भेज दिया जाता है, जहां उनसे चाय तैयार की जाती है.' धीरे-धीरे सभी महिलाएं अपनी-अपनी टोकरी का वजन कराती हैं और फिर खाना खाने के लिए एक कोने में इकट्ठा हो जाती हैं.

छाते के भीतर दोपहर का खाना

जैसे ही तोड़ी गई चाय की पत्तियां फैक्ट्री के लिए रवाना होती हैं, वैसे ही महिलाएं एक साथ लाइन में बैठकर खाना खाने लगती हैं. लेकिन खाने से पहले वो एक दिलचस्प और बेहद व्यावहारिक तरीका अपनाती हैं. उनके हाथ में जो छाता होता है, उसी से वो अपने चारों ओर एक तरह की ढाल बना लेती हैं.

जब हमने उनसे पूछा, 'आप लोग खाने को इस तरह छाते से क्यों ढक लेती हैं?' तो उन्होंने बताया, 'चाय बागान में कई बार खाना खाते-खाते कीड़े-मकोड़े आ जाते हैं और कई बार अचानक बारिश भी शुरू हो जाती है. इसलिए ताकि खाना खराब न हो और उसमें कोई कीड़ा न गिर जाए, हम छाते से उसे चारों तरफ से ढक लेते हैं.'

मैंने एक महिला से पूछा, 'आज खाने में क्या लाई हैं?' उन्होंने जवाब दिया, 'सांभर-चावल लाई हूं. उन्होंने बताया कि ये खाना वो सुबह उठकर खुद बनाती हैं और फिर टिफिन में भरकर साथ लाती हैं, ताकि बीच में घर वापस जाने की जरूरत न पड़े.

थोड़ा आराम, थोड़ा गीत, थोड़ा जीवन

खाना खाते-खाते दोपहर के 1 बज जाते हैं. इसके बाद महिलाएं एक छोटे से टीन शेड के नीचे बैठकर कुछ देर आराम करती हुई दिखाई देती हैं. इसी दौरान हमने कुछ महिला श्रमिकों से एक गीत गाने की गुजारिश की. पहले तो वे थोड़ा झिझकीं, लेकिन फिर धीरे-धीरे कुछ महिलाओं ने मिलकर एक असमिया गीत गुनगुनाना शुरू कर दिया. 

कुछ महिलाएं शरमाते हुए वहां से उठकर चली गईं, लेकिन जैसे ही कुछ ने गीत शुरू किया, वैसे ही पीछे बैठी दूसरी महिलाएं भी उनका साथ देती दिखाई दीं. धीरे-धीरे पूरा माहौल खुशनुमा हो गया. ये वही जगह थी, जहां कुछ देर पहले तक मेहनत, पसीना और संघर्ष था और अब वहीं थोड़ी देर के लिए हंसी, गीत और अपनापन उतर आया था.

रीता की आवाज- '250 रुपये में क्या होता है?'

इसी बीच हमारी बातचीत रीता से हुई, जो पिछले 16 साल से चाय बागान में काम कर रही हैं. रीता ने कहा, 'हमें 250 रुपये मिलते हैं, जो बहुत कम हैं. इतने कम पैसों में हमें बहुत परेशानी होती है. लेकिन क्या करें… इसी तरह से जीवन चलाना पड़ता है. हम चाहते हैं कि हमारा पैसा बढ़ाया जाए. इतने कम पैसों में हम बच्चों को खाना खिलाएं या स्कूल भेजें?'

रीता के बगल में बैठीं रानी ने तुरंत बात आगे बढ़ाई. उन्होंने कहा, 'सरकार ने कहा है कि 30 रुपये बढ़ाए जाएंगे. लेकिन आप ही बताइए, 30 रुपये बढ़ाने से क्या होगा? हम लोगों ने मांग की थी कि 250 रुपये से बढ़ाकर 500 रुपये किया जाए. अगर 350 भी कर दें, तो भी थोड़ा फायदा होगा. लेकिन सिर्फ 30 रुपये बढ़ाने से हमारे जीवन में कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा.'

स्वास्थ्य ठीक, लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत- कम मजदूरी

रानी और बाकी महिलाओं ने बताया कि स्वास्थ्य सुविधा को लेकर बहुत बड़ी दिक्कत नहीं है. अगर किसी की तबीयत खराब होती है, तो पहले यहीं के निजी अस्पताल में इलाज की सुविधा दी जाती है और अगर हालत ज्यादा खराब हो, तो मरीज को डिब्रूगढ़ शहर भी भेजा जाता है.

लेकिन महिलाओं ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी परेशानी कम मजदूरी है. उन्होंने कहा, 'आप ही सोचिए, महंगाई कितनी बढ़ गई है. चावल 40 रुपये किलो है, आलू, दाल और बाकी खाने-पीने का सामान सब बहुत महंगा हो गया है. अब आप ही बताइए, हम लोग पैसा खाने-पीने में लगाएं या बच्चों की पढ़ाई में? अगर बच्चों को पढ़ाएंगे, तो खाने के लिए पैसा नहीं बचेगा.'

(Photo- ITG) ​

'8 घंटे काम… लेकिन कमाई इतनी कम'

रानी ने आगे कहा, 'हम लोग 8 घंटे ड्यूटी करते हैं, लेकिन पैसा बहुत कम मिलता है. हमने मांग की थी कि हमें मजदूरी बढ़ाकर दी जाए, हमें जमीन का पट्टा दिया जाए, लेकिन सरकार ने कुछ नहीं किया. सरकार सिर्फ वादे करती है. चुनाव के बाद कोई यहां नहीं आता. हम लोगों को पूरी तरह भूल जाते हैं. हम लोगों ने ये भी मांग की थी कि हमें ST का दर्जा दिया जाए, लेकिन उस पर भी कोई चर्चा नहीं हो रही.' 

महिलाओं ने बताया कि आजकल चुनाव प्रचार चल रहा है, इसलिए कई नेता आते हैं, अलग-अलग तरह की बातें करते हैं, वादे करते हैं. लेकिन जैसे ही सरकार बन जाती है, वैसे ही कोई वापस नहीं आता/ उन्होंने कहा, 'फिर कोई हमारा हाल-चाल नहीं पूछता.'

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स्कूल है, लेकिन शिक्षक नहीं

रीता ने आगे एक और अहम मुद्दा उठाया- बच्चों की पढ़ाई. उन्होंने कहा, 'स्कूल तो है, लेकिन उस स्कूल में सिर्फ दो 'टीचर हैं. दो टीचरों से क्या होगा? क्या आपको लगता है कि बच्चे ठीक से पढ़ पाएंगे?' उन्होंने कहा कि बारिश के दिनों में हालात और मुश्किल हो जाते हैं. महिलाओं का कहना था कि यहां के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की रुचि भी बहुत कम है. उन्होंने कहा, 'हमारे यहां कई ऐसे लोग हैं जो BA तक पढ़े हैं, लेकिन फिर भी यहीं बैठे हैं. कुछ लोग तो पढ़ाई करने के बाद भी चाय बागान में पत्तियां तोड़ने आ जाते हैं.'

तीन बड़ी मांगें

महिलाओं ने साफ़ कहा कि उनकी तीन मुख्य मांगें हैं- मजदूरी बढ़ाई जाए, ST का दर्जा दिया जाए और भूमि पट्टा दिया जाए.

और फिर दोबारा काम पर लौटती जिंदगी

जहां एक ओर ये महिलाएं अपनी परेशानियां बता रही थीं, वहीं दूसरी ओर कुछ महिलाएं फिर से काम पर लौटने की तैयारी करने लगीं. मैंने उनसे पूछा, 'कहां जा रही हैं?' उन्होंने जवाब दिया, 'अब फिर से काम का समय शुरू हो गया है.' इसी बीच रानी ने एक और बात कही, जो दिल को चीर देने वाली थी. 

उन्होंने कहा, 'हमें 250 रुपये मिलते हैं. उसमें से 150 रुपये तो मेरे बेटे की पढ़ाई के लिए आने-जाने में ही लग जाते हैं. अब आप ही बताइए, कैसे गुजारा होगा? अगर घर में कोई ज्यादा बीमार पड़ जाए और उसे बड़े अस्पताल ले जाना पड़े, तो हमें दूसरों से उधार लेना पड़ता है.'

दोपहर 1:30- फिर धूप, फिर टोकरी, फिर वही मेहनत

अब दोपहर के 1:30 बज चुके थे. महिलाएं एक बार फिर चाय बागान की ओर लौट पड़ीं. इस बार उनके हाथों में जो छाते थे, वो पूरी तरह खुल चुके थे, क्योंकि अब धूप काफी तेज हो चुकी थी. धूप से बचते हुए वो धीरे-धीरे आगे बढ़ती नजर आईं. तभी महुआ नाम की एक महिला ने मुझसे पूछा, 'आप सुबह से यहां काम कर रहे हैं, आपको भूख नहीं लगती? आप भी जाकर कुछ खा लीजिए.' हमने मुस्कुराकर जवाब दिया, 'काम करते-करते कई बार खाने का एहसास ही नहीं रहता.'

और फिर वही उंगलियां, वही पत्तियां, वही उम्मीद

अब महिलाएं फिर से चाय की पत्तियां तोड़ने में जुट चुकी थीं. उनकी उंगलियां लगातार पत्तियों को तोड़ती हुई दिखाई दे रही थीं. उनके मन में बस एक ही भावना थी कि जल्द से जल्द काम खत्म हो, ताकि शाम को घर लौटकर अपने बच्चों से मिल सकें.

इसी बीच कुछ महिला श्रमिकों ने हमारी ओर देखकर पूछा, 'आप किस चैनल से हैं?' मैंने जवाब दिया 'हम आज तक से हैं.' ये सुनते ही एक दूसरी महिला मुस्कुराते हुए बोली, 'भैया, आपने जो रिकॉर्ड किया है… क्या वो टीवी पर आएगा?' और इस एक सवाल में उनकी जिज्ञासा, उनकी उम्मीद, और शायद कहीं न कहीं ये चाहत भी छिपी थी कि उनकी आवाज इस बार सच में कहीं पहुंचे.

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