पांच राज्यों के साथ आज बंगाल में भी 293 सीटों पर काउंटिग जारी है. अभी तक जो रुझान सामने आ रहे हैं वो एक ऐसी तस्वीर पेश कर रहे हैं, जो किसी रोमांचक फिल्म के क्लाइमेक्स से कम नहीं है. कभी भाजपा की 'भगवा लहर' बढ़त बनाती दिखती है, तो कभी ममता बनर्जी का 'खेला' उन्हें वापस रेस में ले आता है.
ताजा रुझान में बीजेपी ने बहुमत के आंकड़े को पार कर लिया है और ये रुझान अगर नतीजों में तब्दील हुए तो न केवल भाजपा के लिए यह एक ऐतिहासिक जीत होगी, बल्कि उन एग्जिट पोल्स पर भी मुहर लग जाएगी जिन्होंने पहले ही बंगाल में बदलाव की भविष्यवाणी कर दी थी.
इस चुनाव की असली कहानी सिर्फ सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि 'M फैक्टर' की भी है. इस बार बंगाल की राजनीति केवल ध्रुवीकरण या विकास के दावों तक सीमित नहीं रही. आइए समझते हैं कि ये सात 'M' कैसे बंगाल का भविष्य तय कर रहे हैं:
1- सबसे पहले बात ‘मुस्लिम फैक्टर’ की. पश्चिम बंगाल की कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं. बंगाल की लगभग 30% मुस्लिम आबादी 'M' फैक्टर का सबसे अहम हिस्सा है. परंपरागत रूप से इसे टीएमसी का वोट बैंक माना जाता है. इस बार टीएमसी से अलग होकर नई पार्टी- 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) बनाने वाले हुमायूं कबीर ने इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश की और भाजपा के आक्रामक ध्रुवीकरण ने इस वोट बैंक में नए समीकरण पैदा कर दिए.
2- दूसरा अहम पहलू ‘महिला वोट’ रहा. ममता बनर्जी की लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने महिला मतदाताओं को काफी हद तक आकर्षित किया. वहीं मोदी सरकार की केंद्रीय योजनाओं और महिला सुरक्षा के मुद्दों ने बीजेपी को भी इस वर्ग में समर्थन दिलाने की कोशिश की. भाजपा ने संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं को मुद्दा बनाकर महिलाओं की सुरक्षा और उनके सम्मान को चुनावी हथियार बनाया. कुल मिलाकर महिला वोटर्स इस बार ‘किंगमेकर’ की भूमिका में हैं.
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3- तीसरा ‘माइग्रेंट (प्रवासी)’ फैक्टर रहा. बंगाल से बाहर काम करने वाले लाखों प्रवासी मजदूर और उनका परिवार इस चुनाव में अहम बनकर उभरा. दिल्ली-एनसीआर ही नहीं अन्य शहरों से भी ऐसी खबरें आई कि प्रवासी बंगाली श्रमिक वर्ग बड़ी तादाद में वोट करने बंगाल गया है. नोएडा की कई सोसाइटियों में घरेलू सहायिकाओं के चुनाव में बंगाल जाने के कारण एक अलग संकट पैदा हो गया था. इस फैक्टर का असर वोटिंग पैटर्न पर साफ दिखाई दिया. रोजगार की कमी के कारण पलायन करने वाले इन युवाओं और उनके परिवार भी वोट देने बंगाल आए. भाजपा ने इसे 'सोनार बांग्ला' के सपने से जोड़ा, जबकि टीएमसी ने केंद्र के असहयोग को इसकी वजह बताया.
4- चौथा ‘मतुआ फैक्टर’- उत्तर 24 परगना और आसपास के इलाकों में मतुआ समुदाय का वोट बेहद अहम है. नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर इस समुदाय में लंबे समय से उम्मीदें रही हैं. पारंपरिक रूप से यह समुदाय बीजेपी का वोट बैंक माना जाता रहा है. इस बार भी बीजेपी ने इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश की है जबकि टीएमसी ने स्थानीय मुद्दों और भरोसे के जरिए यहां संतुलन साधने की रणनीति अपनाई.
5- पांचवां ‘मशीनरी’ फैक्टर- यहां मशीनरी का मतलब सिर्फ चुनावी संसाधनों से नहीं, बल्कि संगठनात्मक ताकत, बूथ मैनेजमेंट और ग्राउंड कैडर से है. भाजपा ने बीते कुछ सालों के दौरान बंगाल में अपना संगठन काफी मजबूत किया है, वहीं टीएमसी का जमीनी नेटवर्क पहले से ही मजबूत रहा है. इस बार इस टक्कर ने चुनाव को और रोमांचक बना दिया. इसके अलावा इस बार चुनाव आयोग ने जिस तरह से सुरक्षा बलों की तैनाती की और फर्जी वोटिंग रोकने के लिए कड़े कदम उठाए वो भी ऐतिहासिक रहे. विशेष रूप से 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के जरिए वोटर लिस्ट के शुद्धिकरण ने कई फर्जी नामों को हटाया जिससे चुनाव का गणित काफी हद तक बदल गया.
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6- छठा ‘ममता फैक्टर’- ममता बनर्जी की व्यक्तिगत छवि और उनकी जुझारू राजनीति टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत रही है. उनके समर्थकों के लिए यह चुनाव ‘दीदी बनाम बाकी’ जैसा बन गया, जिसने भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत किया. इस बार बीजेपी ने एक खास रणनीति अपनाई थी कि वह ममता बनर्जी पर पिछली बार की तरह सीधे हमला नहीं करेगी और इसका असर भी दिखा किसी भी नेता ने ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत हमला नहीं किया.
7- आखिरी और बेहद अहम ‘मोदी फैक्टर’- पीएम मोदी की रैलियां, केंद्रीय योजनाएं और राष्ट्रीय मुद्दों पर फोकस ने बीजेपी को बंगाल में नई ऊर्जा दी. मोदी की लोकप्रियता ने पार्टी के लिए नए वोटर्स जोड़ने में अहम भूमिका निभाई. खुद मोदी ने रोड शो कर लोगों के साथ व्यक्तिगत रूप से जुड़ने की कोशिश की और इसका एक नजारा तब देखने को मिला जब वो झाड़ग्राम में रोडशो के दौरान एक दुकान पर झालमुरी खाने पहुंच गए थे.
कुल मिलाकर देखा जाए तो ये सात फैक्टर ही वो फैक्टर हैं जो इस चुनाव में अहम रहे और नतीजों में भी इनकी छाप साफ देखने को मिलेगी.
किशोर जोशी