यूपी में अखिलेश लगा रहे 'समाजवाद' में 'हिंदुत्व' का तड़का, 2027 में सत्ता के वनवास खत्म करने का दांव

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव अभी से ही सियासी बिसात बिछाने में जुटे हैं. सपा के समाजवाद पर इन दिनों अखिलेश हिंदुत्व का रंग चढ़ा रहे हैं ताकि बीजेपी धार्मिक ध्रुवीकरण करने में कामयाब न हो सके.

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 हिंदुत्व के रंग में अखिलेश यादव (Photo-ITG) हिंदुत्व के रंग में अखिलेश यादव (Photo-ITG)

कुमार अभिषेक

  • लखनऊ,
  • 07 मई 2026,
  • अपडेटेड 2:29 PM IST

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने ममता बनर्जी के सियासी दुर्ग को ध्वस्त कर कमल खिलाने में कामयाब रही. बंगाल के चुनाव नतीजों ने उत्तर प्रदेश की सियासत को भी हिलाकर रख दिया है. बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के हौसले बुलंद है तो सपा की टेंशन बढ़ गई है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी सियासी चाल को पूरी तरह बदल दिया है और एक नई सोशल ईंजीनियरिंग को गढ़ने में जुटे है, जिससे बीजेपी को 2027 में मात दे सकें. 

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उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाना चाहती है तो सपा अपने सियासी वनवास को खत्म करने की कवायद में है. ऐसे में अखिलेश यादव ने अपने सियासी एजेंडे में बड़ा बदलाव किया है और अपनी पारंपरिक समाजवादी राजनीति में हिंदुत्व का तड़का लगे रहे हैं. 

अखिलेश यादव इन दिनों अपने सियासी आधार वाले वोटबैंक पर पकड़ बनाए रखते हुए अपनी पारंपरिक राजनीति के साथ-साथ धर्म, आध्यात्म और ज्योतिष को जोड़ रहे हैं. इसे राजनीति के जानकार अखिलेश के 'सॉफ्ट हिंदुत्व' वाले नए नैरेटिव के रूप में देख रहे हैं. मिशन-2027 को ध्यान में रखते हुए अखिलेश अभी से बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड की काट खोजने में जुटे हैं? 

ज्योतिष के शरणागत में अखिलेश यादव
उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अखिलेश यादव बहुत फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं. बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अखिलेश यादव ने उस समय सबको चौंका दिया, जब उन्होंने खुद को पूरी तरह ज्योतिष की सलाह पर निर्भर बताया. उन्होंने कहा कि अब वे 'नए-समाजवादी हैं और भविष्य की हर चाल ज्योतिष के मुताबिक ही तय करेंगे. 

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अखिलेश यादव ने भले ही मजाकिया लहजे में बात कही हो, लेकिन उसके सियासी मायने बहुत ही गंभीर हैं. उन्होंने कहा कि अगर उनके पंडित जी कहेंगे कि बाल कटाने हैं या दाएं पैर से घर से बाहर निकलना है, तो वे वही करेंगे. 

सपा प्रमुख ने ये दावा किया कि उनके संपर्क में ऐसे सिद्ध ज्योतिष हैं, जो मन की बात पढ़ लेते हैं. उन्होंने ही साल 2012 के चुनाव में जीत का श्रेय भी ज्योतिषीय सलाह को ही दिया. इस तरह से अखिलेश यादव ने ज्योतिष के सलाह पर भी आगे बढ़ने की बात कही है. 

सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर अखिलेश यादव
अखिलेश यादव सिर्फ ज्योतिष की सलाह पर अपने क्रिया क्लाप करने की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि इन दिनों हिंदुत्व की राह पर चलते हुए नजर आ रहे हैं. अखिलेश यादव अपनी छवि को कुछ खास वर्ग के नेता तक सीमित नहीं रखना चाहते बल्कि उसे बहुसंख्यक समुदाय के बीच मजबूत पकड़ बनाए रखने की है. 

दरअसल, बंगाल में बीजेपी की जीत में धार्मिक ध्रुवीकरण और कुछ क्षेत्रों में अल्पसंख्यक वोटों के बंटवारे का भी योगदान रहा. यूपी में विपक्ष इसको लेकर पहले ही सतर्क है. सपा मुखिया ने खासतौर पर अपने नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को इसके लिए ताकीद दी है कि कोई ऐसा बयान या आचरण न करे, जिससे भाजपा की मौका मिले.

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हनुमान चालीसा से केदारेश्वर मंदिर का दांव
अखिलेश यादव कोई भी मौका बीजेपी को नहीं देना चाहते हैं, जिससे उनका बना माहौल बिगड़े. इसीलिए मंगलवार को सुबह ही अखिलेश के सोशल मीडिया अकाउंट पर बड़े मंगल के अवसर पर हनुमान चालीसा को पंक्तियां साझा कर अपने सियासी संदेश दे दिए हैं.

अखिलेश याद के गृह जनपद इटावा में बने रहे केदारेश्वर मंदिर का सावन में भव्य लोकार्पण की तैयारी है ताकि बीजेपी धार्मिक ध्रुवीकरण न कर सके. अखिलेश यह संदेश दे रहे हैं कि वे भी उतने ही बड़े सनातनी हैं जितने उनके प्रतिद्वंद्वी। इसके पीछे का मुख्य उद्देश्य बीजेपी द्वारा किए जाने वाले 'काउंटर पोलराइजेशन' (विपरीत ध्रुवीकरण) को रोकना है. वे चाहते हैं कि 2027 में हिंदू मतदाता धर्म के नाम पर उनसे दूर न जाएं.

समाजवाद पर हिंदुत्व का तड़का लगा रहे
अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के नेताओं को पत्रकारों के साथ अत्यधिक घुलने-मिलने के प्रति आगाह किया है. उन्होंने नसीहत दी कि पत्रकारों के साथ कभी भी 'ऑफ द रिकॉर्ड' (बिना रिकॉर्डिंग के अनौपचारिक बात) नहीं करनी चाहिए. 

दरअसल, यह नाराजगी उस फीडबैक के लीक होने से उपजी है ,जिसमें सपा के ही एक नेता ने कथित तौर पर बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की हार की आशंका जताई थी. अखिलेश का मानना है कि ऐसी बातें पार्टी के अनुशासन को कमजोर करती हैं और विरोधियों को मौका देती हैं. 

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अखिलेश यादव की मौजूदा राजनीति स्टैंड बता रहा है कि 'पीडीए' के सामाजिक समीकरण और 'हिंदुत्व' के सांस्कृतिक प्रभाव के एक अनूठा मिश्रण बनाना चाहते हैं. वे आधुनिकता (लैपटॉप/एआई) और प्राचीन परंपरा (ज्योतिष) दोनों को साथ लेकर चलने का दावा कर रहे हैं. 2027 के रण में यह 'नियो-समाजवाद' कितना कारगर होगा, यह देखना दिलचस्प होगा. 

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