हुमायूं कबीर की जेब में कैसे आ गए ओवैसी? यूपी से बंगाल आते-आते क्या खत्म हो गया टसल

हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखी तो उत्तर प्रदेश में AIMIM के नेताओं ने सबसे ज्यादा विरोध किया था, लेकिन तीन महीने के बाद ही उनके तेवर बदल गए हैं. असदुद्दीन ओवैसी ने अब उन्हीं हुमायूं कबीर के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. ऐसे में आखिर क्या मजबूरी रही?

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बंगाल में असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर की केमिस्ट्री (Photo-AIMIM) बंगाल में असदुद्दीन ओवैसी और हुमायूं कबीर की केमिस्ट्री (Photo-AIMIM)

कुबूल अहमद

  • नई दिल्ली,
  • 27 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 4:19 PM IST

पश्चिम बंगाल में बाबरी मस्जिद बनाने के ऐलान के साथ चर्चा में आए हुमायूं कबीर ने विधानसभा चुनाव के लिए असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ गठबंधन किया है.  दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा हो चुका है, लेकिन सवाल यही है कि असदुद्दीन ओवैसी के नेता जिस हुमायूं कबीर को बीजेपी का नेता बता रहे थे, उसके साथ हाथ मिलाने के लिए क्यों मजबूर हुए? 

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हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद बनाने के लिए बुनियाद रखी तो बिहार के AIMIM नेता शिरकत किए थे, लेकिन उत्तर प्रदेश में ओवैसी के मजबूत सिपहसलार माने जाने वाले सैय्यद आसिम वकार ने पुरजोर तरीके से विरोध किया था. उन्होंने हुमायूं कबीर को बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी का राइट हैंड तक बता रहे थे. अब उसी नेता के साथ ओवैसी ने मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. 

बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए हुमायूं कबीर ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के साथ गठबंधन किया है. हुमायूं कबीर की पार्टी (AJUP) 182 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि 8 सीटों पर AIMIM किस्मत आजमाएगी. इस तरह हुमायूं कबीर और असदुद्दीन ओवैसी मुस्लिम वोटबैंक को साधने के लिए हाथ मिलाया है. 

हुमायूं कबीर से ओवैसी ने क्यों मिलाया हाथ
हुमायूं कबीर बंगाल में मुस्लिम चेहरा बनकर उभरे हैं, जिनकी लोकप्रियता के बहाने ओवैसी भी अपनी सियासी नैया पार लगाना चाहते हैं. यही वजह है हुमायूं कबीर पर बीजेपी के आदमी होने का आरोप उनकी पार्टी के द्वारा लगाए जाने के बाद भी हाथ मिला लिया है. बंगाल में औवैसी ने अपने दम पर लड़कर पिछले चुनाव में सियासी हश्र देख लिया है. यही वजह है कि इस बार आसिम वकार के तमाम विरोध के बाद भी ओवैसी ने हुमायूं कबीर के साथ गठबंधन किया. 

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बंगाल में क्या सफल हो पाएगी ये जोड़ी?
असदुद्दीन ओवैसी ने पहले महाराष्ट्र और फिर बिहार चुनाव में भले ही चंद सीटें जीती हों, लेकिन मुस्लिमों को एक राजनीतिक विकल्प देने की कोशिश की.नतीजे बताते हैं कि उनकी इस कोशिश को हाथोहाथ लिया जा रहा है. बिहार चुनाव में मुस्लिम बहुल सीमांचल बेल्ट में मुसलमानों ने अपनी परंपरागत पार्टियों वाले महागठबंधन के बजाय ओवैसी की AIMIM को दूसरी बार तवज्जो दी. 

AIMIM ने बिहार में भले ही 5 सीटें जीती हों, लेकिन इसे मुस्लिम सियासत के उदय के तौर पर देखा जा रहा है. इसी सीमांचल से बंगाल की सीमा लगी हुई है, जहां पर मुस्लिम वोटर काफी अहम है. इसी इलाके पर हुमायूं कबीर और ओवैसी दोनों की नजर है. इसीलिए मुसलमानों की राजनीति की बात दोनों ही नेता कर रहे हैं. 

ओवैसी की पार्टी ने मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में धीरे-धीरे अपनी पकड़ मजबूत की है. बिहार में मिली सफलता के बाद अब उनका फोकस बंगाल पर है, लेकिन यह इसी जीत में बदलने के लिए हुमायूं कबीर से हाथ मिलाया है. इसके लिए ओवैसी ने अपने नेताओं के विरोध को भी दरकिनार कर दिया है, क्योंकि उन्हें पता है कि अकेले चुनाव लड़कर भी कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे? 

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ओवैसी का गठबंधन मजबूरी है? 
असदुद्दीन ओवैसी अपनी पार्टी को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन अकेले चुनाव लड़कर बेसर रहे हैं. महाराष्ट्र से लेकर बिहार और यूपी तक में उन्हें अगर सफलता मिली है तो गठबंधन के सहारे हुआ. महाराष्ट्र में प्रकाश आंबेडकर की पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़े तो औरंगाबाद लोकसभा सीट जीतने में सफल रहे थे.

बिहार में 2020 के विधानसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा और बसपा के संग गठबंधन किया था, जिसके बाद उन्हें पांच सीटों की सफलता मिली थी. 2025 के विधानसभा चुनाव में ओवैसी ने स्वामी प्रसाद मौर्य और चंद्रशेखर आजाद की पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़े थे. गुजरात के निकाय चुनाव में आदिवासी समुदाय के बीच आधार रखने वाली क्षेत्रीय पार्टी के साथ गठबंधन किया था. इसी तरह यूपी में भी गठबंधन के लिए कई दांव चल चुके हैं. 

असदुद्दीन ओवैसी मौजूदा वक्त की सियासत को बाखूबी समझते हैं, जिसे देखते हुए उन्होंने बंगाल में हुमायूं कबीर के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फॉर्मूला बनाया है. ओवैसी की पार्टी का न ही संगठन है और न ही सियासी जनाधार. ऐसे में मुस्लिम जज्बात के सहारे अपनी राजनीति नैया पार लगाना चाहते हैं. इसीलिए गठबंधन करना ओवैसी की सियासी मजबूरी है, क्योंकि उन्हें पता है कि अकेले चुनाव लड़कर कोई करिश्मा नहीं दिखा सकते हैं?

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