पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के इनकार के बाद कांग्रेस अब अकेले सियासी मैदान किस्मत आजमाएगी. कांग्रेस ने यह फैसला मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी से साथ वरिष्ठ नेताओं की बैठक के बाद लिया है. इस तरह से बंगाल में टीएमसी, बीजेपी, कांग्रेस और लेफ्ट सभी एक दूसरे के खिलाफ ताल ठोकते नजर आएंगे.
कांग्रेस ने गुरुवार को फैसला किया है कि बंगाल की सभी 294 सीटों पर वह अपने उम्मीदवार उतारेगी. कांग्रेस नेतृत्व ने पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी नेताओं के साथ हुई बैठक के बाद यह कदम उठाया है.
पश्चिम बंगाल के कांग्रेस प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने कहा कि बैठक में पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनाव को लेकर चर्चा हुई. ऐसे में सामूहिक रूप से तय किया गया है कि इस बार कांग्रेस बंगाल में अकेले चुनावी मैदान में उतरेगी. ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस एकला चलो की राह पर कदम बढ़ाकर क्या हासिल कर पाएगी, राहुल गांधी 2021 की तरह कहीं ममता बनर्जी को वॉकओवर तो नहीं दे देंगे?
बंगाल में कांग्रेस की ममता से नहीं बनी बात
पश्चिम बंगाल में इस बार कांग्रेस की कोशिश टीएमसी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने की थी. इसके लिए टीएमसी के साथ बातचीत भी शुरू हुई थी, लेकिन सूत्रों की मानें तो ममता बनर्जी ने बहुत ज्यादा सियासी भाव नहीं दिया. सूत्रों की मानें तो टीएमसी की तरफ से कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें देने का प्रस्ताव दिया गया था, जिसे लेकर कांग्रेस तैयार नहीं हुई.
ममता बनर्जी बंगाल में कांग्रेस को बहुत ज्यादा सियासी अहमियत नहीं दे रही है, क्योंकि दोनों ही पार्टियों का सियासी आधार एक ही रहा है. ऐसे में कांग्रेस को तवज्जे देकर उसे दोबारा से खड़े होने का मौका नहीं रही है. इसके चलते ही कांग्रेस की टीएमसी से बात फाइनल नहीं हो सकी और अब उसे अकेले चुनावी मैदान में उतरना पड़ रहा.
वहीं, कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व बैठक में कांग्रेस की सीटों की संख्या पर भी चर्चा हुई. दावा किया गया है कि कांग्रेस लगभग 65 सीटों पर अच्छा प्रदर्शन कर सकती है और कम से कम 5 से 7 सीटें जीत सकती है. हालांकि, अगर नतीजे बहुत खराब रहे तो आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 25 से 30 सीटें ही जीत पाएगी. दूसरे शब्दों में कहें तो, यह कांग्रेस का समग्र लक्ष्य है. वे इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ेंगे.
लेफ्ट से कांग्रेस का नहीं हो सका गठबंधन
बंगाल में कांग्रेस पिछले कई चुनाव से लेफ्ट के साथ मिलकर किस्मत आजमा रही थी, लेकिन इस बार लेफ्ट के साथ भी बात नहीं बन सकी. इसकी वजह बंगाल और केरल का साथ विधानसभा चुनाव होना है, क्योंकि बंगाल में कांग्रेस की लड़ाई लेफ्ट से है.
कांग्रेस के नेता सुदीप रॉय बर्मन ने मीडिया से कहा कि अकेले चुनाव लड़ने का फैसला भविष्य को ध्यान में रखकर लिया गया है. 2021 में लेफ्ट के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सके. इससे बुरा कुछ नहीं हो सका. इसीलिए अकेले लड़ने का फैसला किया गया है.
वहीं, सीपीएम के नेता मोहम्मद सलीम ने कहा कि लेफ्ट का शुरू से ही स्टैंड रहा है कि टीएमसी और बीजेपी विरोधी सभी ताकतें एक साथ आएं, लेकिन हमें पता चला था कि कांग्रेस की टीएमसी से गठबंधन की बातचीत चल रही है. इसीलिए कांग्रेस के साथ हम गठबंधन की उम्मीद नहीं कर रहे थे. लेफ्ट बंगाल में अपने दम पर चुनाव लड़ने का प्लान किया है.
कांग्रेस अकेले लड़कर क्या हासिल कर पाएगी
बंगाल में लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हर बार खराब होती गई है और वह अब शून्य के करीब पहुंच गई है. 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में लेफ्ट के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस एक भी सीट पर चुनाव नहीं जीत पाई थी. 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ एक सीट सीट सकी थी.
2016 में कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ गठबंधन कर किस्मत आजमाया था, उस समय कांग्रेस ने 92 सीटों पर चुनाव लड़कर 12.25 फीसदी वोट शेयर के साथ 44 विधायक जीतने में कामयाब रही थी, लेकिन पांच साल में सारा गेम बदल गया. कांग्रेस सिर्फ 3 फीसदी वोट शेयर पर सिमट गई और अपना खाता तक नहीं खोल सकी. ऐसे में कांग्रेस बंगाल में अकेले चुनाव लड़कर क्या हासिल कर पाएगी, क्योंकि पार्टी के पास न ही सियासी जनाधार बचा है और न ही पार्टी संगठन है.
बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और टीएमसी की सीधी लड़ाई में कांग्रेस का वोट भी पूरी खिसक गया. मुस्लिम वोट ममता बनर्जी के साथ चले गए तो हिंदू वोट बंट गए. इस बार का चुनाव भी बीजेपी और टीएमसी के बीच सिमटता नजर आ रहा है. बंगाल के पिछले दो चुनाव के वोटिंग पैटर्न बता रहे हैं कि मतदाता बीजेपी के साथ खड़ा है या फिर ममता बनर्जी के साथ. इसी का नतीजा है कि कांग्रेस और लेफ्ट दोनों सियासी हाशिए पर पहुंच गई है.
बंगाल में कांग्रेस का सिमटता सियासी जनाधार
पश्चम बंगाल में आजादी के बाद से लेकर सत्तर के दशक तक कांग्रेस का एकछत्र राज कायम था, लेकिन उससे बाद से उसका सियासी जनाधार लगातार घटा है. सूबे में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे थे और उनका कार्यकाल 20 मार्च 1972 से 30 अप्रैल 1977 तक था. बंगाल में लेफ्ट के उदय के साथ ही कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन खोती गई.
ज्योति बसु की सरकार थी और तब कांग्रेस की नेता रहीं ममता बनर्जी की इच्छा थी कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को खुली चुनौती देकर लड़ा जाए. हालांकि, कांग्रेस तब भी ऊहोपाह की स्थिति में थी.नतीजतन ममता बनर्जी ने 1997 में कांग्रेस छोड़ दी और 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस का गठन कर लिया. यहां से कांग्रेस दोफाड़ हो गई और ममता बनर्जी के समर्थक और लेफ्ट के विरोधी सभी लोग टीएमसी के साथ हो गए
ममता बनर्जी ने नई पार्टी बनाकर सिर्फ 14 साल में ही लेफ्ट को पश्चिम बंगाल से बाहर कर दिया लेकिन सैकड़ों साल पुरानी कांग्रेस यहां चूक गई. सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने न सिर्फ लेफ्ट को लगभग खत्म सा कर दिया बल्कि उनके चलते ही कांग्रेस भी पश्चिम बंगाल में नहीं पनप पाई. कांग्रेस ने 2001 के विधानसभा चुनाव में 26 सीटें जीती, 2005 में 21 सीटें, 2011 में 42 सीटें, 2016 में 44 सीटें और 2021 में एक भी सीट नहीं जीत सकी. ऐसा ही हाल कांग्रेस का लोकसभा चुनाव में भी रहा, 25 सालों से दहाई के अंक में भी नहीं पहुंच सकी और 2024 में एक सीट हासिल कर सकी.
ममता को वॉकओवर तो नहीं दे रही कांग्रेस
2021 के बंगाल चुनाव में कांग्रेस-लेफ्ट-आईएसएफ मिलकर चुनाव लड़ रही थी. कांग्रेस ने 92 सीट पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. इसके बाद भी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने चुनाव प्रचार से दूरी बना ली थी. राहुल गांधी सिर्फ एक रैली की थी जबकि स्टार प्रचारकों में शामिल प्रियंका गांधी ने कोई भी जनसभा नहीं की थी. बंगाल की कांग्रेस ईकाई की ओर से राहुल गांधी की टीम को राज्य में कम से कम आधा दर्जन रैलियां करने का प्लान भेजा गया था, लेकिन राहुल सिर्फ एक जनसभा तक खुद को सीमित रखा था.
राहुल गांधी के पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार में नहीं उतरने की कई अहम वजहें मानी गई थी. राहुल गांधी ने बंगाल के बजाय अपना पूरा जोर केरल और असम में लगा रखा था, केरल में लेफ्ट के खिलाफ कांग्रेस चुनाव लड़ रही थी.लेफ्ट की अगुवाई वाले एलडीएफ के खिलाफ आक्रमक रुख अपना रखा था और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के लिए वोट मांग रहे थे.
राहुल गांधी बंगाल में बीजेपी से लड़ रही ममता बनर्जी के खिलाफ प्रचार कर उनको कमजोर करने के आरोप लेकर केंद्रीय राजनीति में सहयोगी दलों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहते थे. सपा से लेकर आरजेडी और शिवसेना तक ममता के साथ खड़े थे. यही स्थिति इस बार भी है. बंगाल चुनाव की दशा और दिशा बता रही है कि मुख्य मुकाबला बीजेपी और टीएमसी के बीच है.
सपा से लेकर आरजेडी तक समर्थन ममता बनर्जी के साथ है. ऐसे में राहुल गांधी एक बार फिर से कहीं वॉकओवर तो नहीं दे देंगे, क्योंकि इस बार कांग्रेस अकेले ही किस्मत आजमा रही है. ऐसे में देखना होगा कि कांग्रेस बंगाल में किस तरह से अपने चुनावी अभियान को परवान देती है?
कुबूल अहमद