असम विधानसभा चुनाव का भले ही ऐलान न हुआ हो, लेकिन सियासी सरगर्मी तेज है. बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने की लिए पूरी ताकत झोंक दी है तो कांग्रेस 10 साल के सियासी वनवास को खत्म करने के लिए जोर लगा रही है. ऐसे में बीजेपी ने असम के चुनावी मैदान में ऐसा चक्रव्यूह रचा है, जिसमें कांग्रेस पूरी तरह से उलझ गई है. सवाल यही है कि इस सियासी उलझन को कांग्रेस कैसे खत्म कर पाएगी?
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी असम के दो दिवसीय दौरे पर पहुंची है. प्रियंका ने असम चुनाव अभियान की शुरुआत नीलाचल पहाड़ी पर स्थित शक्तिपीठ मां कामाख्या देवी के दर्शन और पूजा-अर्चना के साथ किया.
प्रियंका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब कांग्रेस को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जब एक के बाद एक नेता कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस नेताओं संभालकर रखने का है तो दूसरी तरफ पार्टी के लिए जीते की उम्मीद को जगाने की है.
प्रियंका के असम दौरे से पहले बीजेपी ने दिया झटका
प्रियंका गांधी असम पहुंचकर सियासी माहौल बनाती, उससे पहले ही मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा को अपने साथ मिलाकर तगड़ा सियासी झटका दे दिया. असम में हुए परिसीमन से सीटों का समीकरण बदल गया है, जिससे कांग्रेस का चुनावी गेम खराब हो सकता है. अब बीजेपी के द्वारा मुस्लिम परस्त वाली बनाई जा रही छवि चिंता का सबब बनती जा रही है. ऐसे में प्रियंका गांधी असम में कांग्रेस के सियासी वनवास को कैसे खत्म कर पाएंगी?
चुनावी तपिश के बीच कांग्रेस में मची भगदड़
प्रियंका गांधी के सामने सबसे बड़ा चैलेंज कांग्रेस नेताओं के पार्टी छोड़ने के सिलसिले को रोकना है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे चुके भूपेन बोरा ने अपने तमाम पदों से इस्तीफा दे दिया है, पार्टी की तमाम कोशिशों के बाद भी नहीं माने. भूपेन बोरा उसी तरह से बीजेपी का दामन थामने जा रहे हैं, जैसे ठीक चुनाव से पहले 2015 में हिमंत बिस्वा सरमा ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी की सदस्यता ले थी. इस तरह हिमंत और भूपेन बोरा की जोड़ी का सामना कांग्रेस को करना होगा.
भूपेन बोरा के बाद तीन बार के कांग्रेस विधायक अब्दुर राशिद मंडल ने भी पार्टी छोड़ दी है. राशिद मंडल ने अखिल गोगोई की रायजोर दल का दामन थाम लिया है. अब्दुर राशिद मंडल असम के गोलपाड़ा पश्चिम विधानसभा तीन बार विधायक रह चुके और गुवाहाटी के आसपास मजबूत पकड़ मानी जाती है.
भूपेन बोरा के साथ लखीमपुर इलाके के कई कांग्रेस नेता भी पार्टी छोड़ सकते हैं. सीएम हिमंत सरमा दावा करते हैं कि कई और ऐसे नेता हैं जो असम में कांग्रेस का साथ थोड़ सकते हैं. ऐसे में उनका इशारा विधानसभा में विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया की तरफ है. हालांकि, सैकिया ने कांग्रेस छोड़ने की अटकलों को पूरी तरह से नकार दिया है. इसके अलावा कई नेता है, जिनके कांग्रेस छोड़ने की चर्चा है. ऐसे में प्रियंका गांधी के सामने कांग्रेस में मची भगदड़ को रोकने की है.
परिसीमन से बदला असम का चुनावी गेम
असम में करीब साढ़े चार दशक के बाद सीटों का परिसीमन हुई, जिससे सियासी सीन ही पूरी तरह से बदल गया है. सूबे में विधानसभा की कुल 126 सीटें अभी भी हैं, लेकिन नए परिसीमन से मौजूदा विधानसभा सीटों की संरचना में बड़े पैमाने पर बदलाव हो गए हैं.असम में मुस्लिम बहुल सीटें अभी तक 35 से 36 हुआ करती थी, लेकिन अब परिसीमने के बाद सिर्फ 22 सीटें ही रह गई हैं. एससी रिजर्व सीटें 8 से बढ़कर 9 हो गए है तो एसटी 16 सीट से बढ़कर 19 हो गई हैं.
2021 के चुनाव में 31 मुस्लिम विधायक जीतकर आए थे, जो अब नए परिसीमन के बाद दो दर्जन ही रह जाएंगे. इन सीटों पर कांग्रेस की पकड़ मानी जाती है. परिसीमन का सीधा असर कांग्रेस के प्रदर्शन पर पड़ सकता है. असम में हिंदू बहुल सीटें 10 बढ़ गई हैं. असम की 126 सीटों में से कांग्रेस को अगर सत्ता में आना है तो मुस्लिम बहुल सीटों के साथ-साथ दूसरी अन्य सीटों पर जीत दर्ज करनी होगी.
मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस को चुनौती
असम में 27 फीसदी मुस्लिम मतदाता है, जो अब करीब 2 दर्जन विधानसभ सीट पर अहम भूमिका में है. कांग्रेस को असम की मुस्लिम बहुल इलाके में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF और अखिल गोगोई की रायजोर दल से भी पार पाना होगा. बदरुद्दीन अजमल की मुस्लिम इलाक में तगड़ी पकड़ मानी जाती है और 2021 में कांग्रेस का उनके साथ गठबंधन था, लेकिन इस बार दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं.
कांग्रेस को इस बार अजमल के साथ अखिल गोगोई से भी मुकाबला करना होगा, क्योंकि उनकी नजर भी मुस्लिम बहुल सीटों पर है. कांग्रेस के कई मुस्लिम नेताओं को अपने साथ मिलाने में जुटे हैं. मुस्लिम बहुल सीटों पर अगर वोटों का बिखराव होता है तो बीजेपी के लिए ये सीटें आसान हो सकती है. ऐसे में कांग्रेस ने इमरान मसूद को ज्यादातर मुस्लिम आबादी वाले जिले दिए गए हैं, जबकि उलाका को आदिवासी समुदायों की बड़ी आबादी वाले कुछ जिले दिए गए हैं, क्योंकि वह खुद एक आदिवासी नेता हैं.
धार्मिक ध्रुवीकरण से कैसे निपटेंगी प्रियंका
बीजेपी मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को आगे कर के चुनावी मैदान में सत्ता की हैट्रिक लगाना चाहती है. हिमंत सरमा हिंदुत्व का दांव खुलकर खेल रहे हैं और कांग्रेस को मुस्लिम परस्त बताने में जुटे हैं. असम में मदरसों पर एक्शन लेने से लेकर घुसपैठ के मुद्दे पर आक्रामक है. असम विधानसभा में शुक्रवार के दिन जुमे की नमाज़ के लिए तीन घंटे का ब्रेक दिया जाता था,जिसे उन्होंने ख़त्म कर दिया.
'स्वदेशी मुसलमानों' के सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण को मंज़ूरी. हिमंत सरकार ने गोरिया, मोरिया, जोलाह, देसी और सैयद समुदाय को 'स्वदेशी मुसलमान' घोषित किया है. इसके अलावा 'असम मुस्लिम मैरिज बिल' पारित- मुस्लिमों को मौलवी के पास शादी का रजिस्ट्रेशन कराना ज़रूरी नहीं होगा. विवाह और तलाक़ का सरकारी तरीक़े से पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है.सरकारी सहायता प्राप्त क़रीब 1200 मदरसों को सरकारी स्कूल में बदल दिया गया.
हिमंत बिस्वा सरमा लगातार कहते हैं कि असम में बड़े पैमाने पर अवैध रूप से बांग्लादेश से मुसलमान आकर बस रहे हैं. वह कहत हैं कि असम में मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत हो चुकी है. ऐसे में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी मुस्लिमों को बाहर करके ही रहेंगे. हिमंत कहते हैं कि जब तक मैं असम में हूं, वे (मुस्लिम) परेशानियां झेलेंगे. वे यहां शांति से नहीं रह सकते. अगर हम उनके लिए मुश्किलें पैदा करेंगे, तभी वे यहां से जाएंगे.मुख्यमंत्री ने 'मियां' को अवैध बांग्लादेशी करार देते हुए कहा कि उन्हें असम में काम करने की अनुमति नहीं मिलेगी. इस तरह हिमंत खुलकर हिंदू-मुस्लिम का दांव चल रहे हैं. ऐसे में कांग्रेस कैसे निपटेगी?
प्रियंका का सियासी प्रयोग क्या सफल होगा?
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी असम चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष हैं. कांग्रेस के सत्ता के वनवास को खत्म करने के लिए दो दिन के दौरे पर असम पहुंची है. मां कामाख्या देवी की मंदिर में दर्शन करने से लेकर कांग्रेस के चुनावी एजेंडे को धार देने की स्टैटेजी है.
कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, उनके इस दौरे का मुख्य उद्देश्य स्थानीय नेताओं का उत्साह बढ़ाना और पार्टी में एकजुटता लाना है. पिछले कुछ महीनों में प्रियंका गांधी का यह पहला असम दौरा होगा. पार्टी को उम्मीद है कि उनके आने से कार्यकर्ताओं में नया जोश भरेगा. इससे चुनाव के लिए बेहतर रणनीति बनाने में मदद मिलेगी.
प्रियंका को अपने इस दौरे में पार्टी के नेताओं को तो संभालना है ही साथ वह यहां पर एक नया प्रयोग भी करने जा रही हैं. प्रियंका ने असम में नया सिस्टम लागू किया है,जिसमें कमेटी के सदस्यों को संभावित उम्मीदवारों पर फीडबैक लेने के लिए राज्य में बहुत ज़्यादा घूमना पड़ता है. कमेटी के सदस्यों में सांसद सप्तगिरी शंकर उलाका, इमरान मसूद और सीनियर नेता सिरिवेल्ला प्रसाद हैं. उन्हें उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करने और चुनाव से पहले अंदरूनी बातचीत को आगे बढ़ाने का काम सौंपा गया है.
प्रियंका ने जो किया है, वह यह है कि उन्होंने कमेटी के तीन सदस्यों को पांच-पांच जिले दिए हैं और उन्हें लोकल नेताओं और दूसरे स्टेकहोल्डर्स से फीडबैक लेने के लिए इन जिलों में जाने का निर्देश दिया है. इन तीनों नेता पहले से ही तीनों जिलों में घूम रहे हैं और वे लोकल कैडर, सिविल सोसाइटी के सदस्यों से मिल रहे हैं. कांग्रेस का यह काम अभी ऊपरी असम में चल रहा है,यह बंटवारा जिलों की सोशल इंजीनियरिंग के आधार पर भी किया गया है.ऐसे में देखना है कि प्रियंका गांधी कैसे असम की चुनावी जंग फतह करती हैं?
कुबूल अहमद