अखिलेश की रैली से बढ़ी वेस्ट यूपी की सियासी तपिश, क्या जयंत-BJP की केमिस्ट्री को मुस्लिम-गुर्जर फॉर्मूले से तोड़ पाएंगे

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव का सियासी रणभूमि पश्चिमी यूपी बन रहा है, जहां से दो दिन पहले अखिलेश यादव ने चुनावी हुंकार भरी है. अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी में गुर्जर-मुस्लिम समीकरण के सहारे जयंत चौधरी और योगी आदित्यनाथ की केमिस्ट्री को क्या चुनौती दे पाएंगे?

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पश्चिमी यूपी में अखिलेश यादव क्या योगी-जयंत की जोड़ी को दे पाएंगे चुनौती (Photo-ITG) पश्चिमी यूपी में अखिलेश यादव क्या योगी-जयंत की जोड़ी को दे पाएंगे चुनौती (Photo-ITG)

कुमार अभिषेक

  • लखनऊ,
  • 31 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 10:46 AM IST

गौतमबुद्ध नगर (नोएडा) के दादरी में समाजवादी पार्टी की भाईचारा भागीदारी रैली ने बीजेपी की नींद उड़ा दी है. पिछले 10 सालों में यह पहला मौका है जब समाजवादी पार्टी ने अपने मजबूत गढ़ से इतर जाकर इतनी बड़ी रैली की. यह रैली बीजेपी के मजबूत दुर्ग माने जाने वाले पश्चिमी यूपी में से 2027 की चुनावी हुंकार भरी है, 

यूपी में जब से जयंत चौधरी से अखिलेश यादव का गठबंधन टूटा है, यह कहे जब से जयंत चौधरी ने सपा का साथ छोड़कर बीजेपी के संग केमिस्ट्री बनाई है. इसके चलते समाजवादी पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अकेली और अलग-थलग पड़ गई थी. 

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सपा के पास पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोटो के अलावा कोई अपना पुख्ता वोट बैंक नहीं है, क्योंकि यादव फिरोजाबाद और संभल के बाद वेस्ट यूपी में नहीं है. ऐसे में जयंत साथ थे तो सपा ने जाट-मुस्लिम समीकरण ने सफलता मिली थी, लेकिन आरएलडी के पाला बदलते हुए अखिलेश यादव के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश दूर की कौड़ी बन गया था. यही वजह है कि अखिलेश यादव अभी से नए सियासी फॉर्मूले को अमलीजामा पहनाने में जुट गए हैं? 

सपा की साइकिल पर गुर्जर होंगे सवार?
जयंत चौधरी के जाते ही अखिलेश यादव ने अपना गियर बदला और पश्चिम के समीकरण में जाट मुसलमान की जगह गुर्जर और मुसलमान का समीकरण बनाना तय किया.पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव आबादी बहुत छोटी है ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम यादव कांबिनेशन नहीं चल सकता.यही वजह है कि उन्होंने पश्चिमी यूपी के सियासी समीकरण को देखते हुए गुर्जर वोटों को साधने की कवायद शुरू कर दी है. 

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पहले से ही अखिलेश यादव के पास अतुल प्रधान जैसा जुझारू गुर्जर चेहरा था, जिसका मेरठ के आसपास के गुर्जरों में प्रभाव माना जाता है तो लोकसभा सांसद इकरा हसन जिनकी मुस्लिम गुर्जरों में बड़ी पकड़ बन गई है. इसके बाद भी गुर्जरों को अपने पाले में लाने के लिए अखिलेश यादव ने पार्टी में नए चेहरे माने जाने वाले राजकुमार भाटी को पिछले कुछ समय से सक्रिय किया. 

राजकुमार भाटी अपने बेबाक और नास्तिक विचारों के लिए जाने जाते रहे हैं पिछले काफी समय से इन नेताओं ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को एक नया आधार दिया है. सपा ने अपने इन तीन गुर्जर चेहरों को आगे करके पश्चिमी यूपी में गुर्जर वोटों को अपने साथ जोड़ने की मुहिम शुरू कर दी है, लेकिन क्या अखिलेश यादव की साइकिल पर गुर्जर वोटर्स सवार होंगे?

सपा को आत्मनिर्भर बनाने में जुटे अखिलेश
जाट वोटर लगभग अखिलेश का साथ छोड़कर बीजेपी के साथ चले गए तो अखिलेश यादव ने नया कांबिनेशन खड़ा किया हालांकि आज भी माना जाता है. गुर्जर बिरादरी का बड़ा वोट बैंक भाजपा के साथ है जो पहले कभी बसपा का आधार हुआ करता था. 

वहीं, जाट नेता जयंत चौधरी के मोदी सरकार में मंत्री बनने के बाद कमोबेश से माना जा रहा है की जाट भाजपा के साथ जुड़ गया,लेकिन एक दिन पहले महाराजा सूरजमल की मूर्ति अनावरण के कार्यक्रम से उन्होंने दूरी बनाए रखा. इसे लेकर सियासी चर्चा तेज है, लेकिन सूरजमल की मूर्ती से जाट शब्द को हटाने को लेकर प्रशासन से हुए विवाद के बाद बीजेपी के अपने जाट चेहरे संजीव बालियान भड़क गए. 

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बलियान की बेचैनी का सपा उठाएगी लाभ
संजीव बालियान अपनी ही सरकार को खूब खरी खोटी सुना दिया। कहा" मैं खून का घूंट पीकर रह गया नहीं तो किसी की मां ने दूध नहीं पिलाया है कि मुझे रोक सके.' वहीं, सपा के सांसद हरेंद्र मलिक से लेकर अतुल प्रधान तक महाराजा सूरजमल की मूर्ती अनावरण कार्यक्रम में शिरकत कर राजनीतिक संकेत देते नजर आए. इस तरह गुर्जर के साथ जाट वोटों पर भी सपा नेताओं की नजर है. 

बीजेपी के भीतर उनके अपने जाट नेता भी जयंत के बढ़ते कद से परेशान है. भाजपा के भीतर जाट नेताओं में यह सोच बन रही है कि भाजपा ने अपने जाट वोट बैंक को जयंत चौधरी को आउटसोर्स कर दिया है .पार्टी के खिलाफ तो कोई नेता नहीं बोलता, लेकिन जिस तरीके से पूर्व  केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान का गुस्सा फूटा है यह दिखाता है कि भाजपा के जाट वोट बैंक में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है.

पश्चिम यूपी 2027 का सियासी रणभूमि बना
पश्चिम यूपी 2027 के चुनाव का रणभूमि बनता जा रहा है. सपा ने अपने अभियान की शुरुआत की तो योगी-मोदी की जोड़ी ने जेवर एयरपोर्ट का आगाज करके सियासी संकेत दे दिया है. इसके अलावा जाट समुदाय के नेताओं का महाराजा सूरजमल की मूर्ती अनावरण के कार्यक्रम में शिरकत कर सियासी हुंकार भर दी. 

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अखिलेश यादव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर मुसलमान और दलित का समीकरण बनाकर चलना चाहते हैं, जिसकी पहली परीक्षा  2027 के विधानसभा चुनाव में ही होगी, लेकिन भाईचारा भागीदारी रैली में उमड़ी भीड़ ने बीजेपी के माथे पर पसीना तो ला ही दिया है.

मायावती क्यों बेचैन नजर आ रही हैं?

यूपी की सियासत में जिस नोएडा को कभी अखिलेश यादव सियासी अभिशाप की तरह दिखते थे, इस बार 2027 का बिगुल उन्होंने नोएडा के दादरी से ही फूंका. रैली कर कर अखिलेश यादव ने पश्चिम में सियासत को तो गरमा दिया है. इसके बाद मायावती भी बेहद सक्रिय दिखाई देने लगी हैं मायावती न अचानक पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की अपनी मांग भी शुरू करती है.

अखिलेश यादव भी पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं. मायावती को चिंता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अगर दलित गुर्जर और मुसलमान के वोट में अखिलेश यादव ने सेंध लगा दी तो बसपा के लिए यूपी की सियासत लगभग खत्म सी हो जाएगी. हालांकि, अखिलेश यादव की इस रैली के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत गरमाई है, एक तरफ बीजेपी की नजर अखिलेश की बड़ी रैली पर है तो मायावती भी डैमेज कंट्रोल में जुट गई हैं. 

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