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ये है वो मंदिर, स्वयं श्रीराम ने की थी जहां मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा!

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राम भक्तों को करीब 500 साल से जिन लम्हों का इंतजार था, वो लम्हा आज अवधनगरी में फलीभूत हो गया. करोड़ों राम भक्तों का सपना आज साकार हो गया है. शुभ मुहूर्त में राम मंदिर का भूमि पूजन संपन्न हुआ. साथ ही मंदिर निर्माण का शुभारंभ हो गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम जन्मभूमि मंदिर की नींव में नौ शिलाएं रखीं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में एक ऐसा मंदिर है जिसके बारे में माना जाता है कि उसमें प्राण प्रतिष्ठा स्वयं प्रभु श्रीराम ने की थी. आइए जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी खास बातें.

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ये है तम‍िलनाडु में स्थति रामेश्‍वरम मंदिर जो सनातन धर्म के चार धामों में से एक है. मंदिर से जुड़े पौराण‍िक इतिहास की बात करें तो कहा जाता है कि जब रावण ने माता सीता का हरण किया था तो भगवान राम बिना किसी युद्ध के ही सीता को वापस लाना चाहते थे लेकिन जब ऐसी कोई भी स्थिति नहीं बनी तो अंतत: भगवान ने युद्ध करने की ठानी.

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इस युद्ध के लिए राम को वानर सेना सहित सागर पार करना था, जो अत्यधिक कठिन कार्य था. भगवान श्रीराम ने युद्ध में सफलता के लिए अपने आराध्य भगवान शिव की आराधना के लिए समुद्र किनारे की रेत से शिवलिंग का अपने हाथों से निर्माण किया. तब भगवान शिव स्वयम् ज्योति स्वरूप में प्रकट हुए और उन्होंने इस शिवलिंग को श्री रामेश्वरम की उपमा दी.

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रामेश्वरम मंदिर अकेला ऐसा मंदिर माना जाता है जिसकी मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा स्वयं भगवान राम ने की. यही नहीं, बताते हैं कि शिवलिंग की स्थापना करने के बाद इस लिंंग को काशी विश्वनाथ के समान मान्यता देने के लिए भगवान राम ने हनुमानजी को काशी से एक शिवलिंग लाने कहा. पवन-सुत बड़े वेग से आकाश मार्ग से चल पड़े ओर शिवलिंग ले आए. छोटे आकार का यही शिवलिंग रामनाथ स्वामी भी कहलाता है. ये दोनों शिवलिंग इस तीर्थ के मुख्य मंदिर में आज भी पूजित हैं. यही मुख्य शिवलिंग ज्योतिर्लिंग है.

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रामेश्वरम का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा कहा जाता है. यह उत्तर-दक्षिणमें 197 मी. एवं पूर्व-पश्चिम 133 मी. है. इसके परकोटे की चौड़ाई 6 मी. और ऊंचाई 9 मी. है. मंदिर के प्रवेशद्वार का गोपुरम 38.4 मी. ऊंचा है. यह मंदिर लगभग 6 हेक्टेयर में बना हुआ है

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मंदिर में विशालाक्षी जी के गर्भ-गृह के निकट ही नौ ज्योतिर्लिंग हैं, जो लंकापति विभीषण द्वारा स्थापित बताए जाते हैं. इसके अलावा यहीं स्थित रामनाथ के मंदिर में जो ताम्रपट है, उनसे पता चलता है कि 1173 ईसवी में श्रीलंका के राजा पराक्रम बाहु ने मूल लिंग वाले गर्भगृह का निर्माण करवाया था

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उस मंदिर में अकेले शिवलिंग की स्थापना की गई थी, यहां देवी की मूर्ति नहीं रखी गई थी, इस कारण वह नि:संगेश्वर का मंदिर कहलाया. यही मूल मंदिर आगे चलकर वर्तमान दशा को पहुंचा है

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बता दें कि रामेश्वरम में स्थापित शिवलिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है. भारत के उत्तर मे काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है. रामेश्वरम चेन्नई से लगभग सवा चार सौ मील दक्षिण-पूर्व में है. यह हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुंदर शंख आकार का द्वीप है.

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जिस स्थान पर यह टापू मुख्य भूमि से जुड़ा हुआ था, बताया जाता है कि वहां इस समय ढाई मील चौड़ी एक खाड़ी है. शुरू में इस खाड़ी को नावों से पार किया जाता था. ये भी कहा जाता है कि बहुत पहले धनुष्कोटि से मन्नार द्वीप तक पैदल चलकर भी लोग जाते थे. लेकिन 1480 ई में एक चक्रवाती तूफान ने इसे तोड़ दिया. बाद में आज से लगभग 400 साल पहले कृष्णप्पनायकन नाम के एक राजा ने उस पर पत्थर का बहुत बड़ा पुल बनवाया.

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फिर अंग्रेजों के आने के बाद उस पुल की जगह पर रेल का पुल बनाने का विचार हुआ. उस समय तक पुराना पत्थर का पुल लहरों की टक्कर से हिलकर टूट चुका था. एक जर्मन इंजीनियर की मदद से उस टूटे पुल का रेल का एक सुंदर पुल बनवाया गया. इस समय यही पुल रामेश्वरम् को भारत से रेल सेवा द्वारा जोड़ता है. यह पुल पहले बीच में से जहाजों के निकलने के लिए खुला करता था.

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बता दें कि पांच अगस्त यानी आज राम मंदिर निर्माण की नींव रखी गई. इससे पहले ही रामेश्वरम से नींव के लिए मिट्टी आई थी. ये मिट्टी भगवान राम के इस मंदिर से गहरे रिश्ते को दर्शाती है. भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित ज्योर्तिलिंग के दर्शन के लिए हर साल लाखों भक्त यहां पहुंचते हैं.

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