इस समय देशभर में बोर्ड परीक्षाएं चल रही हैं और लाखों छात्र अपने भविष्य को लेकर मेहनत के साथ परीक्षा दे रहे हैं. लेकिन परीक्षा के बाद सबसे ज्यादा चिंता रिजल्ट और नंबरों को लेकर होती है. कई बार छात्रों को लगता है कि उनकी मेहनत के अनुसार अंक नहीं मिले हैं.
इसके लिए वे री-चेकिंग और री-इवैल्यूएशन जैसे ऑप्शन का सहारा लेते हैं. लेकिन इन दोनों के प्रोसेस में क्या अंतर होता है? इसे लेकर सही जानकारी होना बहुत जरूरी है, ताकि सही टाइम पर सही फैसला लिया जा सके.
री-चेकिंग का साफ मतलब है कि आंसर कॉपियों के नंबरों को दोबारा से चेक करना. इसमें देखा जाता है कि कहीं किसी प्रश्न के अंक जोड़ने में गलती तो नहीं हुई, कोई उत्तर बिना जांचे तो नहीं रह गया या किसी पेज के अंक टोटल में छूट तो नहीं गए. यानी इसमें केवल जोड़-घटाव की गलतियों को देखकर सुधारा जाता है.
इसके लिए छात्रों को बोर्ड की ऑफिशियल वेबसाइट पर सबसे पहले आवेदन करना होता है. इसके लिए उन्हें निर्धारित शुल्क का भुगतान करना होता है. इसके बाद बोर्ड की टीम यह सुनिश्चित करती है कि सभी प्रश्वों के नंबर सही से एड किए गए हों.
इस दौरान अगर कोई गलती मिलती है, तो उसे सही कर दिया जाता है. इसके बाद बोर्ड छात्रों को इसे लेकर अपडेट देता है. गौर करने वाली बात यह है कि री-चेकिंग में केवल नंबरों को सही किया जाता है, इसलिए अंक बढ़ने या घटने की संभावना बहुत कम होती है.
वहीं, अगर री-इवैल्यूएशन की बात करें तो, इसमें उत्तर पुस्तिका को फिर से चेक किया जाता है. इसमें परीक्षक उत्तरों को दोबारा पढ़कर नए सिरे से नंबर देते हैं. इस प्रक्रिया में अंक बढ़ भी सकते हैं, घट भी सकते हैं या सेम भी रह सकते हैं.
बोर्ड में री-इवैल्यूएशन की प्रक्रिया री-चेकिंग से अलग होती है. इसके लिए भी छात्रों को बोर्ड की ऑफिशियल साइट पर जाकर आवेदन करना होगा. निर्धारित शुल्क का आवेदन करें. बता दें कि री-चेकिंग के मुकाबले इसमें थोड़ा अधिक शुल्क जमा करना होता है.
बोर्ड की टीम उत्तर पुस्तिका को एक अलग परीक्षक के पास भेजती है. उनकी ओर से सभी उत्तरों को दोबारा पढ़कर मूल्यांकन किया जाता है. नए इवैल्यूएशन के मुताबिक, अंक बढ़ सकते हैं, घट सकते हैं या समान रह सकते हैं.