क्या भारत में आने वाला समय पूरी तरह से प्राइवेट यूनिवर्सिटीज का होने वाला है? क्या सरकारी कॉलेजों की तुलना में निजी शिक्षण संस्थानों की चमक युवाओं को ज्यादा लुभा रही है? ये सवाल इसलिए खड़े हुए हैं क्योंकि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के 'ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन' (AISHE) के पिछले 10 सालों के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर एक बेहद चौंकाने वाला ट्रेंड सामने आया है.
आंकड़े बताते हैं कि भारत में पिछले एक दशक (2013-14 से 2023-24) में 550 से अधिक नई यूनिवर्सिटीज खोली गई हैं, जिनमें से ज्यादातर निजी यानी प्राइवेट मैनेजमेंट द्वारा शुरू की गई हैं. स्थिति यह है कि देश में प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के बढ़ने की रफ्तार सरकारी यूनिवर्सिटीज की तुलना में तीन गुना से भी ज्यादा है.
आइए इस पूरे बदलाव को आसान आंकड़ों के साथ डिकोड करते हैं और समझते हैं कि इससे छात्रों को फायदा होगा या उनकी जेब पर बोझ बढ़ेगा.
देखें 10 साल का रिपोर्ट कार्ड
| यूनिवर्सिटी का प्रकार | साल 2013-14 | साल 2023-24 | विकास दर |
| सरकारी यूनिवर्सिटी | 504 | 733 | +45.4% |
| प्राइवेट यूनिवर्सिटी | 219 | 546 | +149.3% |
|
कुल यूनिवर्सिटी |
723 | 1,279 | +76.9% |
गुजरात बना नंबर-1 गढ़
सत्र 2013-14 में राजस्थान 39 प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के साथ देश में सबसे आगे था. लेकिन 2023-24 तक आते-आते बाजी पलट गई और गुजरात 67 प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के साथ नंबर वन पर आ गया है. गुजरात ने पिछले 10 साल में सबसे ज्यादा यानी 51 नई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज जोड़ी हैं, जबकि मध्य प्रदेश 41 नई यूनिवर्सिटीज के साथ दूसरे नंबर पर रहा. दूसरी तरफ, सरकारी यूनिवर्सिटीज के मामले में उत्तर प्रदेश (58) और कर्नाटक (51) आज भी टॉप पर बने हुए हैं.
यूनिवर्सिटीज बढ़ीं, पर छात्र आज भी 'सरकारी' के भरोसे
निजी विश्वविद्यालयों की संख्या भले ही रॉकेट की रफ्तार से बढ़ी हो, लेकिन जब बात बच्चों के एडमिशन (Enrolment) की आती है, तो कहानी थोड़ी बदल जाती है. आज भी देश का बहुसंख्यक छात्र सरकारी कॉलेजों पर ही भरोसा कर रहा है:
सरकारी का दबदबा: साल 2013-14 में कुल छात्रों के 81.3% (51.9 लाख) बच्चे सरकारी यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे. आज यह संख्या बढ़कर 73.9 लाख जरूर हो गई है, लेकिन कुल हिस्सेदारी घटकर 68.1% रह गई है. यानी आज भी हर तीन में से दो छात्र सरकारी संस्थान में ही पढ़ रहे हैं.
प्राइवेट की लंबी छलांग: दूसरी तरफ, प्राइवेट यूनिवर्सिटीज में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या पिछले 10 साल में लगभग तीन गुना बढ़ गई है. साल 2013-14 में जहां सिर्फ 11.9 लाख (18.6%) बच्चे प्राइवेट यूनिवर्सिटी में थे, वहीं 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 34.6 लाख (31.9%) हो गया है.
नफा या नुकसान: छात्रों के लिए इसका क्या मतलब है?
फायदे: नए मौके और लड़कियों की बढ़ती भागीदारी
सीटों की कमी होगी दूर: भारत में उच्च शिक्षा में भाग लेने वाले युवाओं की दर (Gross Enrolment Ratio - GER) 23.0 से बढ़कर 30.0 पर पहुंच गई है. यानी कॉलेज जाने वाले बच्चे बढ़ रहे हैं, ऐसे में नई प्राइवेट यूनिवर्सिटीज इन छात्रों को एडमिशन के नए मौके दे रही हैं.
बेटियां सबसे आगे: इस पूरे ट्रेंड में सबसे सुखद बात यह है कि उच्च शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी (Female GER: 31.2) लगातार सातवें साल लड़कों (Male GER: 28.9) से अधिक रही है. प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के आने से स्थानीय स्तर पर विकल्प बढ़े हैं, जिससे लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा पाना आसान हुआ है.
न्यू-एज कोर्सेज: प्राइवेट संस्थान अक्सर मार्केट की मांग के हिसाब से एआई, डेटा साइंस जैसे आधुनिक कोर्सेज सरकारी कॉलेजों के मुकाबले जल्दी शुरू कर देते हैं.
नुकसान: जेब पर भारी बोझ और गुणवत्ता का सवाल
पढ़ाई का बढ़ता खर्च: सरकारी कॉलेजों के मुकाबले प्राइवेट यूनिवर्सिटीज की फीस कई गुना अधिक होती है. ऐसे में मध्यम और गरीब वर्ग के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा पाना एक बड़ा वित्तीय बोझ बनता जा रहा है.
क्वालिटी पर सवाल: 10 साल में 550 से ज्यादा यूनिवर्सिटीज खुल तो गईं, लेकिन क्या उन सभी में योग्य प्रोफेसर, इंफ्रास्ट्रक्चर और सही प्लेसमेंट की सुविधा है? कई बार ये संस्थान सिर्फ 'डिग्री बांटने वाली दुकानें' बनकर रह जाते हैं, जिससे डिग्री मिलने के बाद भी युवाओं को नौकरियां नहीं मिल पातीं.
आजतक एजुकेशन डेस्क