ईरान और अमेरिका के बीच तनातनी कम नहीं हुई है. अमेरिका ने अपने युद्धपोत भी ईरान के नजदीक समुद्र में तैनात कर रखे हैं. रह-रहकर दोनों तरफ से ऐसी बयानबाजियां हो रही है, जिससे ऐसा लगता है कि कभी भी युद्ध भड़क सकता है. ईरान अमेरिका की खुफिया एजेंसियों पर अपने देश में अस्थिर हालात पैदा करने के आरोप लगाता रहा है. ऐसे में जानने हैं कि क्या सिर्फ अमेरिकी खुफिया एजेंसी ही ईरान के खिलाफ साजिश रचती रही है या ईरानी खुफिया एजेंसियां भी अमेरिका में सीक्रेट मिशनों को अंजाम दिया है.
अमेरिका के खिलाफ ईरान के खुफिया मिशन से जुड़ी कहानियों और घटनाओं की ओर रुख करने से पहले वहां के इंटेलिजेंस सिस्टम को समझना जरूरी है. 1979 की क्रांति के बाद से, ईरान में एक दर्जन से अधिक अलग-अलग खुफिया एजेंसियां बनाई गईं. इनमें से कुछ घरेलू को मामले देखने और कुछ को विदेशी गतिविधियों पर नजर रखने का काम सौंपा गया. ये एजेंसियां अलग-अलग सरकारी मंत्रालयों, सैन्य विभागों या पुलिस बलों को रिपोर्ट करती हैं.
ईरान की खुफिया सिस्टम की दो सबसे शक्तिशाली एजेंसियां हैं. एक वहां की सरकार के अधीन आने वाला खुफिया एवं सुरक्षा मंत्रालय (MOIS) और सेना का हिस्सा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर इंटेलिजेंस ऑर्गनाइजेशन (IRGC- IO). ये दोनों संगठन लंबे समय से सत्ता और वर्चस्व के लिए होड़ करते रहे हैं. इन दोनों ईरानी खुफिया एजेंसियों ने छह महाद्वीपों में व्यक्तिगत हत्याओं से लेकर सामूहिक बम विस्फोटों और साइबर हमलों तक के अभियान चलाए हैं.
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हाल ही में यूएस जस्टिस डिपार्टमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने आकलन किया है कि ईरान ने 2024 के चुनाव के दौरान कलह भड़काने की कोशिश की गई थी. आंशिक रूप से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के अभियान को निशाना बनाकर हैकिंग गतिविधियों के माध्यम से और आंशिक रूप से इजरायल के प्रति अमेरिकी नीति के विरोध प्रदर्शनों को प्रोत्साहित करके, अशांति फैलानी को कोशिश की गई थी.
1980 के दशक में, ईरान का संबंध लेबनान और कुवैत में अमेरिकी दूतावासों और बेरूत में अमेरिकी मरीन शांति सैनिकों के खिलाफ प्रॉक्सी द्वारा किए गए आत्मघाती बम विस्फोटों से था. लेबनान में शांति सैनिकों के कैंप में जिस आतंकी संगठन ने विस्फोट किया था, उसका संबंध ईरानी की खुफिया एजेंसी आईआरजीसी से था. अमेरिका के मुताबिक, आईआरजीसी उसकी फंडिंग करता था और उसी के निर्देश पर हमला किया गया, जिसमें 200 से अधिक अमेरिकी सैनिक मारे गए थे.
अमेरिका ने MOIS साजिश रचने के लगाए हैं ये आरोप
यूएस इंस्टीच्युट ऑफ पीस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2006 में, एक अमेरिकी फेडरल कोर्ट ने खुफिया और सुरक्षा मंत्रालय (MOIS)को सऊदी अरब में अमेरिकी वायु सेना कर्मियों के आवास खोबार टावर्स पर 1996 में अल कायदा द्वारा किए गए बम विस्फोटों के लिए फंडिंग और सहायता प्रदान करने का दोषी ठहराया था.
2011 में, अमेरिकी न्याय विभाग ने घोषणा की थी कि ईरान ने वाशिंगटन में सऊदी राजदूत आदेल अल जुबेर की हत्या की साजिश रची थी. 2020 में, इथियोपिया ने अदीस अबाबा में अमेरिकी, इजरायली और संयुक्त अरब अमीरात के दूतावासों के खिलाफ MOIS की कथित साजिश से जुड़े एक दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया था.
2022 में, माइक्रोसॉफ्ट ने आरोप लगाया कि एमओआईएस अल्बानिया पर हुए एक बड़े साइबर हमले के लिए जिम्मेदार था, जहां एक ईरानी विपक्षी समूह मौजूद था. इस हमले के कारण कई अमेरिकी सरकारी वेबसाइटें ठप हो गई थीं.
अमेरिकी और इजरायली एजेंसियों को बनाया निशाना
ईरानी एजेंसियों ने ईरान में कथित पश्चिमी और इजरायली जासूसी नेटवर्क को निशाना बनाया है. 2009 से 2022 के बीच, ईरान ने खुफिया जांच में दर्जनों सीआईए मुखबिरों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया था. हालांकि, उसने शायद ही कभी कथित जासूसों के नाम या उनके अभियानों के सबूत दिए हों.
2011 में , MOIS ने सीआईए के एक जासूसी नेटवर्क को खत्म करने की घोषणा की. उसने 30 कथित गुर्गों को गिरफ्तार किया और अमेरिकी नेटवर्क से जुड़े 42 अन्य लोगों की पहचान की. एक ईरानी जांच में सीआईए द्वारा मुखबिरों से संवाद करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले एक मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का पता चला.
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2019 में MOIS के प्रमुख ने घोषणा की कि एजेंसी ने हाल के महीनों में सीआईए के 17 कथित जासूसों को गिरफ्तार किया. अधिकारी ने स्थानीय मीडिया को बताया कि देश के साथ जानबूझकर विश्वासघात करने वालों को न्यायपालिका के हवाले कर दिया गया है. कुछ को मौत की सजा और कुछ को लंबी अवधि के लिए जेल की सजा सुनाई गई है.
ईरान ने दावा किया कि यह जासूसी का सबसे बड़ा भंडाफोड़ था. 2020 में ईरान ने अमेरिका के लिए जासूसी करने के आरोप में रक्षा मंत्रालय के दो पूर्व कर्मचारियों को फांसी दे दी. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में, सीआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी ने वाशिंगटन को भेजे गए एक संदेश में चेतावनी दी कि ईरान ने अपने देश के भीतर अमेरिकी खुफिया नेटवर्क को पूरी तरह से नष्ट कर दिया है, जिससे सूचना के सोर्स बहुत कम रह गए हैं.
IRGC का अमेरिका के खिलाफ मिशन
यूएस जस्टिस विभाग के मुताबिक, 2024 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य से किए गए 'हैक-एंड-लीक' ऑपरेशन के लिए आईआरजीसी के तीन साइबर अपराधियों पर आरोप लगाया गया. अभियोग में आरोप लगाया गया है कि यह गतिविधि ईरान द्वारा वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों को निशाना बनाने के समर्थन में रची गई एक व्यापक हैकिंग साजिश का हालिया चरण था.
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माइक्रोसॉफ्ट के विश्लेषकों का माना था कि आईआरजीसी का ईरानी हैकिंग समूह चुनाव नजदीक आने के साथ अपनी गतिविधि बढ़ा देगा, क्योंकि समूह का ऑपरेशनल पैटर्न और चुनाव में हस्तक्षेप का इतिहास रहा है. वहीं बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने पुष्टि की थी कि ईरान ने ट्रंप के चुनाव अभियान को हैक किया था. एफबीआई और अन्य संघीय एजेंसियों ने एक संयुक्त बयान में कहा कि ईरान ने अशांति फैलाने और हमारे लोकतांत्रिक संस्थानों में विश्वास को कमजोर करने के लिए अमेरिकी चुनाव में हस्तक्षेप करने का विकल्प चुना था.
न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्जीनिया के ग्रेट फॉल्स में रहने वाले एक अमेरिकी नागरिक ने बुधवार को यह स्वीकार किया कि उसने 2017 से 2024 के बीच फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन (एफएए) के ठेकेदार के रूप में अमेरिका में ईरानी सरकार और खुफिया अधिकारियों के साथ उनकी ओर से काम किया था.
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अमेरिका के न्याय विभाग ने कहा था कि 42 वर्षीय अबूजर रहमती ने अटॉर्नी जनरल को पूर्व सूचना दिए बिना अमेरिकी अदालत में ईरानी सरकार के एजेंट के रूप में कार्य करने और साजिश रचने का अपराध स्वीकार किया था. रहमती इससे पहले जून 2009 से मई 2010 तक ईरानी सशस्त्र बलों की एक शाखा, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) में प्रथम लेफ्टिनेंट थे. वह आईआरजीसी की खुफिया कमांड के सदस्य के तौर पर काम कर रहे थे.
सिद्धार्थ भदौरिया