ईरान में अशांति के बीच अमेरिका ने उस पर हमले की धमकी थी. फिलहाल, अमेरिका ने अपना कदम पीछे हटा लिया. वहीं ईरान ने भी सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को मौत की सजा नहीं देने की बात कही है. फिर भी, अमेरिका हमेशा इस ताक में रहता है कि कब उसे मौका मिले और ईरान के इस्लामिक शासन और सुप्रीम लीडर अली खामेनेई को उखाड़ फेंके.ऐसा पहली बार नहीं होगा, आज से 72 साल पहले भी अमेरिका ऐसा कर चुका है. जब अमेरिका और इंग्लैंड ने मिलकर ईरान में तख्तापलट करवा दिया था.
आज से करीब 72 साल पहले ईरान में एक तख्तापलट हुआ था और वहां की चुनी हुई सरकार को हटाकर पहलवी दोबारा सत्ता में आ गए थे. तब 1953 में संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम ने तत्कालीन ईरान साम्राज्य में तख्तापलट का समर्थन किया था. क्योंकि, अमेरिका और इंग्लैंड का पहलवी के शासन को बढ़ावा देने और तख्तापलट कराने में मदद करने का एक ही उद्देश्य था - ईरानी संसद द्वारा देश के लाभदायक तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के प्रयास को रोकना.
यही वजह है कि वहां के चुने हुए प्रधानमंत्री को हटा दिया गया. तब निरंकुश शासक मोहम्मद रजा पहलवी, जिन्हें शाह के नाम से जाना जाता था, उन्हें अपनी शक्ति बढ़ाने का मौका मिल गया और फिर से वो सत्ता के केंद्र में आ गए. पश्चिम परस्त माने जाने वाले रजा पहलवी के लौटने पर ईरान के साथ अमेरिका के संबंध भी कुछ सालों के बेहतर हो गए थे. 72 साल पहले अमेरिकी मदद से ईरान में सत्ता परिवर्तन की कहानी काफी दिलचस्प है. इन दिनों एक बार फिर से अमेरिका वही सबकुछ दोहराना चाहता है.
ईरान में अमेरिका की मदद से हुआ था तख्तापलट
अमेरिकी सरकार के समर्थन और वित्तीय सहायता से ईरानी सेना ने प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेक की सरकार को उखाड़ फेंका और ईरान के शाह को पुनः सत्ता में स्थापित किया. तख्तापलट की इस पूरी साजिश को ऑपरेशन एजेक्स कहा जाता है, जिसे अमेरिका की खुफिया एजेंसी ने अंजाम दिया था. ऐसे में समझते हैं आखिर क्यों अमेरिका को ऐस गुप्त ऑपरेशन चलाना पड़ा.
मोसादेक 1951 में ईरान में तब चर्चा में आए जब उन्हें प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया. वह एक कट्टर राष्ट्रवादी थे. मोसादेक ने तुरंत अपने देश में काम कर रही ब्रिटिश तेल कंपनियों पर हमले शुरू कर दिए. उन्होंने तेल क्षेत्रों के अधिग्रहण और राष्ट्रीयकरण की मांग की. मोसादेक के इन कार्रवाईयों की वजह से उनका ईरान के अभिजात वर्ग, खासकर शाह मोहम्मद रजा पहलवी के साथ टकराव हुआ.
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ईरान पर पहलवी का ही शासन था, लेकिन सत्ता चुने हुए प्रधानमंत्री के हाथ में थी. फिर भी शाह ने 1952 के मध्य में मोसादेक को पद से हटा दिया. इस कार्रवाई की निंदा करते हुए हुए देश में व्यापक दंगे शुरू हो गए. इस वजह से शाह को कुछ समय बाद मोसादेक को पुनः बहाल करने के लिए मजबूर होना पड़ा.
अमेरिकी अधिकारी ईरान में हो रही घटनाओं पर नजर रखे हुए थे. अमेरिकी केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) के साथ काम कर रहे ब्रिटिश खुफिया सूत्रों ने यह निष्कर्ष निकाला कि मोसादेक साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित था. यदि उन्हें सत्ता में बने रहने दिया गया तो वो ईरान को सोवियत संघ के प्रभाव क्षेत्र में लेकर चला जाएगा.
सीआईए ने रची थी ऑपरेशन अजाक्स की साजिश
तब शाह के साथ मिलकर, सीआईए और ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों ने मोसादेक को सत्ता से हटाने की साजिश रचनी शुरू की. हालांकि, ईरानी प्रधानमंत्री को इस योजना की भनक लग गई और उन्होंने अपने समर्थकों को विरोध प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतरने का आह्वान किया. इसी दौरान, शाह कुछ चिकित्सकीय वजहों से देश छोड़कर चले गए. अमेरिका ने इस बात का फायदा उठाया और शाह समर्थकों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से ईरानी सेना को अपने साथ करने में जुट गया.
उस वक्त ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां भी आने वाले समय में होने वाली गड़बड़ी की आशंका से पीछे हट गई थी, लेकिन सीआईए ने ईरान में अपने गुप्त अभियान जारी रखे. सीआईए ने वहां शास समर्थकों को बहला-फुसलाकर, कुछ को धमकाकर और कुछ को रिश्वत देकर अपनी तरफ कर लिया और मोसादेक के खिलाफ एक और तख्तापलट को अंजाम देने की कोशिश की. इसे ऑपरेशन एजेक्स के नाम से भी जाना जाता है.
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शाह के देश से बाहर चले जाने की वजह से उनके समर्थकों को भड़काया गया. इस तरह 19 अगस्त, 1953 को, सीआईए द्वारा आयोजित और वित्तपोषित सड़क प्रदर्शनों के समर्थन से सेना ने मोसादेक को सत्ता से हटा दिया. फिर, शाह ने तुरंत सत्ता में वापसी की और अमेरिकी मदद के लिए धन्यवाद के रूप में, ईरान के 40 प्रतिशत से अधिक तेल क्षेत्रों को अमेरिकी कंपनियों को सौंप दिया.मोसादेक को गिरफ्तार किया गया. उसने तीन साल जेल में बिताए और 1967 में नजरबंदी में उनकी मृत्यु हो गई. इस्लामिक क्रांति से पहले 25-26 साल तक शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और ईरान के रिश्ते बेहतर रहे.
सिद्धार्थ भदौरिया